‘शिक्षक’ और स्वयंसेवक ही हो सकता है ‘नीलकंठ’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। महज छह दशक की उम्र में बड़ी शोहरत और लम्बी जेल यात्रा के बाद पूर्व मंत्री पंडित लक्ष्मीकान्त शर्मा

(सुरेश शर्मा)

अनन्त यात्रा पर रवाना हो गये। उनके हाथ में जप करने वाली माला और ह्दय में सेवा की भावना हरदम चाहने वालों को आकर्षित करती थी। अपने ही निवास में सिरोंज हाउस बनाकर अपने चुनाव क्षेत्र से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भोजन और रूकने की व्यवस्था हर रोज होती थी। ईलाज की जरूरत वालों को कर्मचारी ही भर्ती कराने जाते थे या फिर अन्य कोई परेशानी की बात हो लक्ष्मीकान्त शर्मा ने कभी हाथ पीछे नहीं किए। वे सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षक थे और संघ के स्वयंसेवक। यही उनकी प्रमाणिकता थी। जब जनसंपर्क मंत्री बने तो पत्रकारों के बहुत प्रिय हो गये थे। बहुत सुविधाएं दीं और कोई भी खाली हाथ नहीं गया। वे सबमें लोकप्रिय थे। क्षद्धानिधि की नींव उन्हीं के हाथों इंदौर में हमारे ज्ञापन पर रखी गई थी। मतलब लक्ष्तीकान्त शर्मा गुणों की खान थे और जनहित में काम करने वाले राजनेता भी। संभवतया यही लोकप्रियता उनका मायनस प्वांइट भी बनती जा रही थी। कोई भी स्थापित नेता किसी अन्य को अपने कंधे से ऊपर कहां देखने देता है। संघ प्रमुख अन्य कोई संघ के अधिकारी अपने स्वयंसेवक के घर भोजन करने आने का सुख ले रहे थे। लेकिन सरकार को लगता था उनका मंत्री अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ा रहा है। यही राजनीति है।

शिक्षामंत्री के रूप में लक्ष्मीकान्त शर्मा ने खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी। वे सेवाभावी थे तो अनुसंशा उसका हिस्सा होता है। यहीं से वह विष निकला जिसको उन्होंने पी लिया। व्यापमं मामला निकला कहीं ओर से था और उनके गले की शोभा बढ़ाने लग गया, जिस प्रकार से समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शिव के गले की शोभा बढ़ा रहा है। वे वर्षों जेल में रहे लेकिन वह नहीं बोला जिसकी अपेक्षा मीडिया को तो थी ही और जांच एजेंसियों को भी थी। वे जब कोरोना से प्रभावित हुए और स्वर्ग सिधार गये तब भी वो ही पक्ष निकालने का प्रयास किया गया। लेकिन लक्ष्मीकान्त शर्मा सभी रहस्यों को अपने साथ लेकर इस दुनियां को अलविदा कह गये। ऐसा कोई स्वयंसेवक ही कर सकता है। जिसमें शिशु मंदिर का शिक्षक होने का गौरव हासिल हो तब गुणों का विस्तार हो जाता है। कुछ लोग इसे उनकी बदनामी के रूप में पेश कर रहे हैं। वे संस्कृति के जानकार नही हैं। कैकेई ने भगवान के अवतार की सार्थकता के वनवास देने का अभिशाप स्वीकार किया था। सुदामा ने कृष्ण का हिस्सा खाकर दरिद्र होना स्वीकारा था।

लक्ष्मीकान्त शर्मा प्रदेश की राजनीति के वह राजनेता थे जिनका अन्तिम संस्कार भी कोविड प्रोटोकाल की सीमाएं तोड़ गया। पूरे प्रतिबंधों के बाद भी हजारों लोग कहीं से भी पहुंच ही गये। यह उनके प्रति जन आस्था का प्रतीक है। जिन भाजपाईयों को अपने जीते जी साथी कहने में संकोच हो रहा था वे रात के अंधेरे में और दिन के उजियारे में अपनी कृज्ञता ज्ञापित कर आये हैं। केवल भगवतशरण माथुर ही ऐसे दिल वाले नेता हैं जिन्होंने उन्हें वरिष्ठ भाजपा नेता कहा। शिव का हलाहल तो सदियों बाद भी दिख जाता है लेकिन अपना विष लक्ष्मीकान्त जी अपने साथ ही लेते चले हैं।

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