‘शराब’ मामले में सरकार के विरूद्ध क्यों है ‘उमा’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। राजनीति के चेहरे कितने हैं यह पढऩे वाला कोई हो भी कुछ न कुछ छोड़़ ही देता है। जब उमा भारती 2003 में दिग्विजय सिंह की सरकार को बदलने के लिए संकल्प यात्रा निकाल रही थीं उस समय का एक किस्सा ताजा हो आया है। तेंदुखेड़ा से कौन चुनाव लड़े यह विषय था? क्षेत्र के शराब विक्रता संजय शर्मा ने समाचार पत्रों में उमा के आगमन के खूब विज्ञापन और समाचार छपवाये। वे अखबार उमा तक किस तरह पहुंचे इसका उनका प्रयास था। दूसरी तरफ एक नेता इस प्रयास में थे कि ये अखबार उमा के पास न पहुंचे क्योंकि एक शराब व्यापारी टिकिट की चाहत में ऐसा कर रहा है। मुझे तो यह भी कहा गया था कि शराब के साथ इस क्षेत्र में सुखा नशा भी व्यापक चलन में है। जो भी हो संजय शर्मा को दूर रखने का पूरा प्रयास हुआ। अचरज इस बात पर हुआ कि जब भाजपा ने टिकिट वितरित किये तो संजय शर्मा को ही तेंदूखेड़ा से भाजपा का टिकिट मिला और वे भाजपा के विधायक बने। इस बार उन्होंने कांग्रेस से चुनाव लड़ा है और विजयी हुए हैं। यह शराब मामले में दोहरा चरित्र ही तो कहा जायेगा। खैर! यह तो राजनीतिक चरित्र की बात हुई लेकिन यदि कोई सामाजिक सुधार के लिए शराब बंदी की बात करता है तब उसका समर्थन करने के लिए आगे आना चाहिए।

उमा का कहना है कि शराब बदी होना चाहिए जबकि सरकार का कहना है कि शराब का सेवन जनता कम कर दे तो शराब अपने आप बंद हो जायेगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि उन्हें यह लग जायेगा कि जनता पीना नहीं चाहती है तब वे बिना देरी के शराब का व्यापार मध्यप्रदेश से बंद कर देंगे। लेकिन धन और जरूरत की पूर्ति के लिए अन्य राज्यों से शराब की तसकरी की संभावनाएं शराब बंदी नहीं करने दे रही है। अब उमा और शिव के बीच तकरार हो तो हो लेकिन सच यह है कि शराब बंदी के बाद लोग शराब पीना बंद कर देंगे इसकी कोई संभावना नहीं है। गुजराज में मध्यप्रदेश से लगे क्षेत्र में ज्यादा बिक्री होना इसका प्रमाण है। बिहार से लगे क्षेत्रों का सर्वे कराया गया था तब पता चला कि बिहार में बंदी से पहले शराब जितनी बिकती थी उसमें जबरदस्त उछाल आया है। इसलिए सरकार शराब की बिक्री संभावनाओं के आधार पर रोक देगी यह लगता नहीं है। वैसे भी राज्य सरकारों के पास राजस्व पाने के विकल्प कम ही बचे हैं उनको कोई क्यों खोना चाहेगा? ऐसे में विकल्प यह बचा है कि लोगों को शराब छोडऩे के लिए कहा जाये।

ऐसी कोई सामाजिक मुहिम चलाने की बजाए राजनीतिक आयोजन करने से लोग शराब पीना बंद करेंगे और न ही सरकार ही इस बारे में संज्ञान लेगी। पीने वालों को दूसरी तरफ मोडक़र इस बुरी आदत से छुटकारा पाने की प्ररेणा देना चाहिए। दुखद बात यह है कि समाज सुधारक भी इस मामले में चुप हैं और धार्मिक गुरू भी। राजनेता जब इस प्रकार की आवाज उठता है तब शराब लॉबी के लोग उससे अप्रोच करने जरूर लग जाते हैं। उमा के पास कोई पहुंचा या नहीं इसकी कोई सूचना हमें तो नहीं है। इसमें उमा और शिव का अनबोला जरूर हो गया। सवाल यह भी उठाया जा रहा है राजनीतिक वनवास भोग रही उमा क्या फिर से भाजपा से बिदाई लेने की धारणा पाल रही हैं या कोई और बात है?

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