‘शब्द’ चयन छोड़ दें तो बात सही कहीं है ‘राव’ ने

भोपाल (सुरेश शर्मा)। मध्यप्रदेश भाजपा के प्रभारी मुरलीधर राव ने दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं और मीडिया ने उसे हाथों-हाथ लपक लिया। इसका कारण यह है कि मीडिया आजकल खबरों के सहारे नहीं टिप्पणियों के सहारे  लोकप्रियता और टीआरपी पाने में अधिक विश्वास करता है। यह तर्क भी ठीक है जब नेताओं के पास शब्द चयन का टोटा हो गया है तब हम तो जनता को बताएं ही कि नेताओं की भाषा में या तो अज्ञानता है या इन्हें सत्ता का नशा हो गया है। लेकिन मुरलीधर राव यदि शब्दों का सलीके चयन करके यह बात कहते तो यह बात राजनीति की आदर्श बात है। भाजपा का नेतृत्व यदि इस प्रकार की बात कहने का सहास दिखाता है तब यह राजनीति में सुधारवाद की अनोखी घटना हो सकती है। यह सच है कि पार्टी के नीति नियंता और देश की जरूरत को अधिक बार जनप्रतिनिधि बनना चाहिए। जो अधिक बार जनप्रतिनिधि बन रहे हैं इसका मतलब यह है कि जनता का विश्वास उनके काम पर है, तौर तरीकों पर है इसलिए उन्हें मंत्री बनाकर उनकी कार्यशैली का लाभ देश-प्रदेश को देना चाहिए। यहां विवादित वाक्य की भांति आदर्श स्थापित करना चाहिए। लेकिन नेतृत्व करने वाले लोग गणेश परिक्रिमा को  अधिक स्थान देते हैं जिससे भी अगली बार की मानसिकता बनती है। शायद मुरली धर ने यह विचार नहीं किया होगा।

वैसे भी भाजपा एक ऐसा राजनीतिक दल है जिसमें देश का भविष्य देखने वाले मतदाताओं की संख्या अधिक है। एक सर्वे ने बताया है कि कांग्रेस में से सबसे अधिक जनप्रतिनिधि भाजपा में गए हैं। अन्य दलों के दलबदलुओं में भी भाजपा में आने की प्राथमिकता है। इसलिए भाजपा के पास जनप्रतिनिधियों की संख्या अधिक होने के कारण नेताओं की संख्या भी अधिक है। ऐसे में यदि एक ही व्यक्ति हर बार का दावा करेगा तो कई नेता जनप्रतिनिधि बनने से वंचित हो जाऐंगे। हम इंदौर का उदाहरण ले सकते हैं। ताई आज भी यदि चुनाव लड़ती हैं तो वे चुनाव जीत जाएंगी। लेकिन शंकर ललवानी को मौका दिया तो इंदौर ने उसे भी अपना जनप्रतिनिति बनाया। यहां मुरलीधर राव का संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है। अधिक बार जनप्रतिनिधि होना रिकार्ड बनाना तो हो सकता है लेकिन उससे क्षेत्र को, प्रदेश को और देश को क्या मिलेगा यह समझना होगा? कई बार प्रतिभाएं वंचित हो जाती हैं। कई बार देश को कुछ दे देने की क्षमताओं वाले लोग सिनियर की आड़ में बौनसाई ही बने रह जाते हैं। इसलिए मुरलीधर राव यदि शब्द चयन सही से कर लेते तो उनकी बात अधिक वजनदार हो जाती।

उन्होंने सुप्रसिद्ध गीत कार जावेद अख्तर को लेकर बोला गया शब्द भी उसी शैली का है लेकिन उस पर आपत्ति अधिक लोग नहीं उठा पाएंगे। यह अक्ल के अजीर्ण का मामला है। जावेद भाई मानसिक रूप से साम्प्रदायिक हैं। उनकी पत्नी की भी यही हाल है। इसलिए वे तालिबान और संघ की तुलना करते हैं। संघ से वैचारिक भिन्नता एक विषय हो सकता है लेकिन वह तालिबान हो जाएगा ऐसा कहना अक्ल का अजीर्ण ही तो है। ऐसे लोगों को बौद्धिक पागल भी कहा जा सकता है जिसका ईलाज कराने की जरूरत तो है ही। इसलिए राव की इस सलाह पर उन्हें गौर करना चाहिए। फिर भी राव साहब बड़े पद पर शब्दों का बड़ा महत्व होता है?

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