‘शबाना’ भी शामिल हो गई जिस लाइन में थी ‘जायरा’

भोपाल। एक शब्द प्रचलन में है गंगा जमुनी तहजीब। बहुत सुन्दर और स्वीकार्य शब्द है। भारत की मूल संस्कृति और उसको मानने वाले इस तहजीब को अपने जीवन में उतारते हैं जीते हैं। पांच साल के बाद मोदी सरकार को एक और मौका मिला है। पिछले पांच साल में ये तथाकथित लोग कोई ऐसी गलती नहीं निकाल पाये जिससे मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सके। धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव कीएक भी घटना सामने नहीं आई। इसलिए इनका विषय मॉब लिंचिग की घटनाओं पर निशाना रहा। यहां पर भी पक्षपात रहा कि किसी घटना में शिकार यदि गैर हिन्दू है तो इनके लिए वह खबर है और यदि वह दलित है तब भी वह खबर है लेकिन वह हिन्दू है तब कोई खबर नहीं। कोई मोमबत्ती लेकर सामने नहीं आता। पिछले पांच साल में शबाना आजमी को ऐसा कुछ नहीं दिखा। पन्द्रह साल में वे मध्यप्रदेश की सरकार की मेहमान नहीं बन पाई क्योंकि वह एक विचारधारा के कारण देश के बहुसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने का काम करती हैं। कोई यह बताये कि यह गंगा जमुनी तहजीब का उल्लंघन किसने किया है? मोदी सरकार से पहले तक धार्मिक समानता के लिए भी तरसा जाता था अब समानता है। लेकिन धार्मिक रूप से कट्टर इन लोगों के लिए किसी और का बराबर बैठना कैसे स्वीकार है? जब इनकी शैली पर सवाल उठता है तब इन्हें यह देश रहने के लायक नहीं लगता।
इंदौर के आयोजन में उनके साथ दिग्विजय सिंह भी थे। उन्होंने भोपाल की सांसद को निशाने पर लिया। स्वभाविक है वे चुनाव हारे हैं तब उनका मिशन तो रहेगा ही। फिर भी आरवीएस मणि की किताब में साफ लिखा है कि हेमंत कटारे और दिग्विजय सिंह की रणनीति के तहत साध्वी को हिन्दू आतंकवाद में फंसाया गया। इससे पहले के कई प्रयास विफल हुये। यह किताब बाजार में उपलब्ध है। इसकी प्रमाणिकता पर किसी ने अभी तक सवाल भी नहीं उठाये हैं। फिर भी शबाना आजमी का इतिहास सबको पता है। वे एक विशेष दायरे में रहकर सोचती हैं। एक विचार के कारण भारतीय विचार उनके लिए आलोचना का विषय रहा है। आलोचना स्वस्थ्य लोकतंत्र का आधार रहता है लेकिन आलोचना भी स्वस्थ्य होना चाहिए।शबाना के इस प्रकार के विवाद में पहुंचने का मतलब यह निकाला जा रहा है कि वे भी जायरा वसीम के रास्ते पर निकल आने का प्रयास कर रही हैं। वे नूसरत जहां के रास्ते पर निकलने का सहास नहीं दिखा पा रही हैं जिन्होंने सच में गंगा जमुनी तहजीब का परिचय दिया था।
यह पहला अवसर है जब लुटियंस का पाला महिलाओं ने संभाला है। जायरा ने कहा था कि ईमान को नहीं बचा पा रही हैं। फिल्मों में काम करना हराम है। उन्होंने यह इंडस्ट्री को छोड़ दिया। लेकिन हराम की कमाई को कहीं भी दान किये जाने की खबर नहीं आई है। दूसरी हीरोइन हैं नुसरत जहां जिन्होंने खुद को मुसलमान तो बताया लेकिन जैन से शादी करने के बाद हिन्दू परिधान में आकर सबको एक संदेश भी दे दिया। यह वह तहजीब है जिसे भारत स्वीकारता है। अब शबाना ने सामने आकर यह सिद्ध कर दिया कि वे फतवा संस्कृति को स्वीकार करती हैं और सरकार की आलोचना करती हैं। यह भावना विवाद क साथ बहस का विषय भी हो सकती हैं। प्रदेश में सरकार बदली तो उसी भाषा के साथ आ गई शबाना।

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