‘व्यवस्था’ नहीं थी तो फिर काहे उछाला ‘पत्थर’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित पूरी पार्टी कह रही है कि सोशल डिस्टेंस रखो। लेकिन मध्यप्रदेश में पार्टी के

सुरेश शर्मा

नेता मेल मिलाप कुछ अधिक ही कर रहे हैं। मेल मिलाप का कारण जो भी हो लेकिन मीडिया में उछला और उछाला भी गया कि सरकार डावांडोल हो रही है। अब बिना योग्यता के वाइस चांसलर बनने की स्थिति वाली वाट्सएप यूनिवर्सिटी ने इसे ऐसा पेश किया कि मीडिया की साख ही दांव पर लग गई। कोई कहने लगा कि शपथ ग्रहण अमुक तारीख को है केन्द्र सरकार में मंत्री बनने वालों के नाम भी बता दिये गये। लेकिन सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम्र-लट्ठा वाली स्थिति हो गई। न शिवराज सरकार को कोई खतरा था और न ही ऐसी कोई मुहिम ही चलाने का संदेश मिला था। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब व्यवस्था नहीं थी खाने की तो अम्मा को पिसाने क्यों भेज दिया गया? जिन नेताओं के नाम चर्चा में आये उनसे बात हुई तो पता चला कोई भी इस प्रकार की मुहिम का हिस्सा नहीं था। अपना नाम आने से खफा जरूर हो रहे थे। एक बड़े नेता ने मुझे बताया कि कैलाश विजयवर्गीय बंगाल मिशन के बाद तफरी के दिनों में भोपाल आये और सबसे कुशल क्षेम पूछने चले गये। इसका मतलब मीडिया में यह निकाल लिया गया कि सरकार के साथ शह मात का खेल खेला जा रहा है।

समाचार पत्रों में खबरों से खेलने का सिलसिला शुरू हुआ। बात का बतंगड़ बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया को टीआरपी बटोरने का मौका मिल गया। कोरोनों की अतिरेक खबरों के कारण इलेक्ट्रानिक मीडिया को लोगों ने देखना वैसे ही कम कर दिया था। अब वह उस डैमेज को कंट्रोल को ठीक उसी प्रकार से कर रहा है जिस प्रकार से भाजपा का प्रदेश नेतृत्व अपने मजे के लिए उछाली गई शिव सरकार के सामने चुनौती वाली खबर से हुई डैमेज को सुधरने में लगा है। यह पहली बार अहसास हुआ कि संघ के तीन-तीन नेता जिसमें खुद अध्यक्ष वीडी शर्मा, सुहास भगत और हितानंद शर्मा समस्या की विकरालता को समझ नहीं पाये। वीडी शर्मा का डा. मिश्रा से मिलना तो और गजब ढ़ा गया। संगठन अपने किसी मंत्री के यहां मुलाकात के लिए खुद गया होगा ऐसा याद नहीं है। यह पहली बार हुआ है। खैर! भाजपा है यहां कुछ भी हो सकता है। इसीलिए यह सवाल ताजा हो उठा कि जब संघ का समर्थन नहीं था। केन्द्रीय नेतृत्व का पीठ पर हाथ नहीं था और प्रदेश में विधायकों को लामबंद नहीं किया गया तब ठहरे पानी में पत्थर फैंकने का क्या मतलब?

पूरी भाजपा विजयवर्गीय के खेल का शिकार हो गई। उनसे मिलने वाले अब सफाई दे रहे हैं कि हमारा मकसद यह नहीं था। लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने यह सिद्ध कर दिया कि अभी पुराने चावलों का स्वाद बरकरार है। फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि यह आग चाहे बिना मतलब लगाई गई हो लेकिन आग लगाने की घटना तो हो ही गई ना। अब प्रदेश की सरकार को भी सजग रहना होगा और संगठन को भी। क्योंकि पहला प्रयास हर जगह फेल ही होता है। राजस्थान का पायलट प्रकरण उदाहरण तो हो सकता है। तब आप खुश थे कल कोई और खुश हो सकता है। यही तो राजनीति है बाबू।

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