विरोध की राजनीति करता दिख रहा है विपक्ष : राष्ट्रपति चुनाव में लाइन से हटे सिन्हा

(सुरेश शर्मा) राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। भाजपा की अगुवाई वाले राजग ने आदिवासी नेता जो महिला भी हैं श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को मैदान में उतार कर विपक्ष की एक जुट होने की राजनीति की हवा निकाल दी। वहीं किसान और आक्रोश और ग्रामीण व्यवस्था को ध्यान में रखकर जगदीप धनकड़ को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया है। विपक्ष ने भी राष्ट्रपति पद के लिए पुराने ब्यूरोक्रेट और मोदी विरोध यशवंत सिन्हा को अपना समर्थन दिया जबकि उप राष्ट्रपति के लिए मार्गरेट अल्वा के नाम की घोषणा की। सिन्हां अटल जी की सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे और मोदी विरोध करने से पहले वे भाजपा के नेता ही हुआ करते थे जबकि अल्वा सोनिया गांधी की करीबी रही हैं। राजग के पास अपने दम पर राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के लिए कुछ सहयोग की जरूरत थी जिसे उसने बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस के सहारे पा लिया। इसके बाद सिन्हा के सामने अपने प्रचार दम से कुछ दलों का अतिरिक्त समर्थन पाने की उ मीद करना थी। वे प्रचार की लाइन नहीं पकड़ पाये। जिस बड़बोलेपन से वे मोदी का विरोध करते हैं वह सलीका वे अपने चुनाव प्रचार के लिए नहीं दिखा पाये। कभी उन्हें कश्मीर के नेता सबसे बड़े राष्ट्रभक्त लगते हैं तो कभी वे सीएए और धारा 370 को लेकर विवाद की पहल करते दिख रहे हैं। वे बता नहीं पाये कि उनका मकसद क्या है या फिर से विपक्ष का टूलकिट बन गये। हुआ यह कि सिन्हां से उनके राज्य की वह सरकार भी अलग हो गई जो पहले उन्हें समर्थन दे रही थी। हार की संभावना नहीं अब तो उनकी बुरी हार की चर्चा शुरू हो गई है।
राष्ट्रपति के लिए विपक्ष का संयुक्त प्रत्याशी खड़ा हो इसकी सबसे पहले पहल बंगाल कीर मु यमंत्री ममता बनर्जी ने की। उन्होंने पहले शरद पवार का नाम सामने किया। लेकिन पवार ने अपना नाम आगे आने से पहले ही रोक लिया। उसके बाद महात्मागांधी के परिवार को मनाने का प्रयास हुआ। शयद वे समझ गये कि विपक्ष उनके गांधी होने का लाभ लेना चाहता है जबकि वह केवल अपनी राजनीति के लिए और मोदी सरकार का अंधा विरोध करने के लिए। इसलिए वे भी पीछे हो गये। कश्मीर के सबसे बड़े नेता जिनका विवादों से बड़ा नाता रहा है फारूख अब्दुल्ला को विपक्ष मनाने पहुंचा लेकिन वे भी राजी नहीं हुए। तब मोदी विरोध में चर्चित पूर्व ब्यूरोक्रेट और नेता यशवंत सिन्हा को चुनाव लडऩे के लिलए तैयार किया गया। वे मान गये और अब वे हार का स्वाद चखने जा रहे हैं। यह हार बड़ी हार होगी।
राजग की प्रत्याशी श्रीमती द्रोपदी मुर्मू का नाम सामने आने पर विपक्ष की किलेबंदी में दरार पड़ गई। पहली बात तो वे आदिवासी हैं। दूसरी वे महिला हैं। इसलिए विपक्षी दल भी यह संदेश तो नहीं दे सकते कि वे एक आदिवासी महिला का विरोध कर रहे हैं। जिस ममता बनर्जी ने जी तोड़ मेहनत करके अपने दल के व्यक्ति को प्रत्याशी बनाया और प्रचार शुरू किया वे ही सिन्हा के नाम पर पछता रही हैं। क्योंकि उनके प्रदेश में मुर्मू की जाति के आदिवासियों की संख्या काफी है। इसलिए कोई भी विपक्षी दल जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। सिंहा प्रचार के लिए तो गये लेकिन वह उत्साह दिखाई नहीं दिया, जो झारखंड में राजग की प्रत्याशी के लिए हेमंत सोरेन ने दिखाया। बिहार में उन्हें कोई समर्थन नहीं मिला। शिवसेना ने नाम के लिए सहमति दी लेकिन अब वोट मुर्मू को दे रही है। अकाली दल ने जिस दम से राजग छोड़ा था उसी उत्साह से वोट के लिए राजी हो रही है। कुल जमा बात यह है कि मुर्मू मैडम बड़े अन्तर से देश की राष्ट्रपति बनने जा रही हैं और सिन्हा का समर्थन दिनों दिन कम होता जा रहा है। यह भी हो सकता है कि मतदान में यह समर्थन और कम हो जाये।
यशवंत सिन्हा से नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही अपना राग शुरू किया था। पहले तो यह लगता था कि सिन्हा अपने अनुभव के कारण सही कराने के लिए प्रयास कर रहे हैं। बाद में लगने लगा कि वे तो मोदी विरोध की ढफली लेकर बैठ गये हैं और बिना किसी खास तर्क के वे विरोध ही करेंगे। भाजपा से परे हो गये। एक मंच बनाया लेकिन वह जनस्वीकार्यता नहीं पा सका। दूसरी तरफ मोदी का जनसमर्थन बढ़ता गया। मोदी की सबसे बड़ा विरोधी ममता बनर्जी दिखने लगी तो सिन्हा उनके साथ मिल गये और राष्ट्रपति प्रत्याशी बनने तक पहुंच गये। उनके बारे में यह तो माना जाता है कि वे अपने चुनाव प्रचार को तार्किक शक्ति से ऊंचाईयों तक ले जायेंगे। राजग के सामने ऐसी स्थिति बनेगी कि उनके सवालों का जवाब भी देंगे और असहज भी होंगे। लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। उल्टे सिन्हा की मानसिकता ने देश में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने मेहबूबा मुफ्ती और फारूख अब्दुल्ला को सबसे बड़ा देशभक्त बोल दिया। सवाल यह नहीं है कि इन दोनों नेताओं की देशभक्ति पर सवाल है लेकिन सवाल यह है कि समूचा विपक्ष भाजपा को इसलिए कटघरे में खड़ा करता रहा है कि अलगाववादियों का साथ देने वाली मेहबूबा के साथ मिलकर सरकार क्यों बनाई? ऐसे में सिन्हा का बयान उनको देश भर में विवाद के रूप में पेश करने वाला है। विवाद हुआ भी। इसके बाद असम में उन्होंने सीएए को लागू नहीं करने की बात कह कर अपने विचार बता दिये। कुछ कानूनों को राष्ट्रपति बनने पर मंजूरी नहीं देने की बात कह कर विपक्ष को भी असहज कर दिया। परिणाम यह हुआ कि उनका समर्थन देने वाले दलों में कमी आती गई।
देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया हुआ है। एक समय था कि मुस्लिम ओरयेंटिड राजनीति होती थी। जिसे इस समुदाय का जितना समर्थन मिलता था वह सरकार बना लेता था। इसलिए समर्थन देने और वोट पाने की होड़ लगी मची रहती थी। 2014 के बाद से हिन्दू ओरियेंटिड राजनीति शुरू हो गई है। लेकिन यह अभी मीडिया और राजनेताओं के मानस पटल पर नहीं छाई है। समय लग रहा है। शुरूआत हो चुकी है। हिन्दू मतदाताओं ने वोट की ताकत को पहचान कर सरकार बनाने की मंशा से मतदान करना शुरू कर दिया। इसके प्रमाण हर चुनाव में दिखाई दे रहे हैं। इसलिए सिन्हा प्रचार की लाइन नहीं पकड पाये और प्रचार के दौरान एक्सपोज हो गये। कुछ तो आदिवासी नेता के सामने खड़े होने के कारण शक्तिविहिन हो गये कुछ अपने प्रचार की लय तय नहीं कर पाने के कारण कमजोर और एक्सपोज हो गये। इसलिए विपक्ष भी बिदक रहा है। वोट भी दे रहा है और एक्सप्रोज होने से भी डर रहा है। यह संदेश जा रहा है कि विपक्षी दल एकता का प्रदर्शन करने के लिए महत्वपूर्ण पदों पर प्रत्याशी उतार कर विरोध की रस्म अदायगी करना चाहते हैं।
अब उप राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की नेता, मिशनरी समर्थक और श्रीमती सोनिया गांधी की करीबी मार्गरेट अल्वा को विपक्ष का संयुक्त प्रत्याशी घोषित किया है। सर्वविदित है कि राजग के पास उप राष्ट्रपति जिताने के लिए उनके पास पर्याप्त समर्थन है। ऐसे में विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है। सरकार की ओर से भी विपक्ष को पर्याप्त स मान न देने के आरोप भी लग रहे हैं। ममता बनर्जी का यह बयान मायने रखता है कि यदि उन्हें मतलब विपक्ष को यह बता दिया जाता कि मुर्मू जी को मैदान में उतारा जा रहा है तो वे प्रत्याशी उतारने की पहल ही नहीं करती। इसका अर्थ यह है कि विपक्ष के साथ समुचित विचार विमर्श करके सर्वानुमति बनाने का सलीके से प्रयास नहीं हुआ। राष्ट्रपति का पद देश की गरिमा के साथ जुड़ा हुआ है उसके लिए सर्वमान्य नाम सामने लाने का प्रयास लोकतंत्र के लिए हितकर हो सकता हे। वैसे चुनाव का अधिकार संविधान ने दिया है। विपक्ष विरोध का प्रदर्शन करने के लिए चुनाव कराने का प्रयास कर रहा है। उसे यह पता है कि उसके पास जितने जितने न बर नहीं हैं। फिर भी वह देश के करोड़ों रूपये संविधान में मिले अधिकार के कारण खर्च करवा रहा है। लोकतंत्र असहमति को भी स्थान देता है और समन्वय को भी महत्व देता है। इसलिए राष्ट्रपति चुनाव में यदि समन्वय को परखा जाता तो संभवतया आम सहमति बन सकती थी। फिर भी देश को एक ऐसा राष्ट्रपति ििमलने जा रहा है जो कुछ अवधारणाओं का निर्माण करेगा कुछ को तोड़ेगा।

संवाद इंडिया

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