वजूद के संघर्ष में विपक्ष का मोदी विरोध

ममता बनर्जी बन रही संघीय व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती
सुरेश शर्मा 
कोरोना की दूसरी लहर लगभग बीत सी गई है। यह लहर इतना अधिक नुकशान करके गई है कि इसके घाव भरने में काफी समय लगेगा। राज्य सरकार के प्रबंधन पर जब सवाल उठने लगे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र सरकार की पूरी ताकत को लगाया। सेना और उसके संसाधन के साथ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह उतरे। विदेशों से समन्वय बनाकर आक्सीजन का आयात किया गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैक्सीन को लेकर सभी पक्षों को समझाने का प्रयास किया। उत्पादक स्थलों से रेल मार्ग से टेंकर आये जिससे यात्रा मार्ग छोटा हो गया और जल्द व्यवस्था करने में पीयूष गोयल का सहयोग मिला। गरीबों को खाद्यान्न की व्यवस्था से लगाकर अन्य राहत की घोषणाओं ने भरपाई की बजाये राहत की मरहम लगाने का प्रयास किया गया। आज जब कोरोना पॉटिविटी रेट कम से कम आ गया है तब यह कहने में आता है कि विपक्षी नेता इस दौरान भ्रम पैदा करते रहे और जनमानस को ईलाज की सुविधा उपलब्ध कराने में सहयोग देने की बजाए सरकार के विरोध में जनमानस को तैयार करने में लगे रहे। कोरोना के संसाधनों पर भ्रम पैदा किया गया, आक्सीजन की कमी को प्रचारित करवाने मेंं भूमिका निभाई गई, मौतों के आंकड़ों से भय उत्पन्न करने का प्रयास किया गया जिससे मौतों का वातावरण भी बन गया। वैक्सीन को लेकर भ्रम पैदा किया गया जिससे वैक्सीनेशन की गति नहीं बन पाई। विपक्षी राज्यों में वैक्सीन कचरे में मिलने से इसकी पुष्टि भी हुई। अब कांग्रेस सहित कुछ अन्य दलों के नेता तीसरी लहर बच्चों के लिए होगी इसके इंतजाम को लेकर भ्रम पैदा करने में लग गये। यह एक विषय है दूसरा विषय यह है कि ममता बनर्जी सहित कुछ नेता ऐसे हैं जो संघीय व्यवस्था के लिए लगातार चुनौती बने हुए हैं। विदेशों से भी भारत विरोधी वातावरण बनाने का दौर-दौरा है।

ममता बनर्जी ने जिस प्रकार से 'यासÓ चक्रवात को लेकर राजनीति की उससे संघीय व्यवस्था को बड़ा आघात लगा। स्वयं प्रधानमंत्री ओडीसा और बंगाल के दौरे पर गये थे। ओडीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने न केवल प्रधानमंत्री के साथ समन्वय बनाकर प्रदेश हित कीरक्षा के लिए सहयोग दिया अपितु उनका सम्मान करने में कोई दलीय भेदभाव नहीं दिखाया। दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने बंगाल में ऐसा नहीं किया। ममता का कहना है कि विपक्ष के नेता को बैठक में आमंत्रित किया गया इसलिए वे प्रधानमंत्री की बैठक में नहीं आई। यह प्रोटोकाल का क्यों उल्लंघन है इसके बारे में ममता की ओर से नहीं बताया गया। विपक्ष के नेता का आमंत्रण गोपनीय नहीं था बल्कि पहले से जानकारी में था इसलिए प्रोटेस्ट पहले ही दर्ज कराना चाहिए था। लेकिन प्रधानमंत्री बंगाल में हैं उस समय अधिक जिम्मेदारी सरकार और मुख्यमंत्री की बनती है। ममता ने अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेते समय न तो राज्य के हितों का ध्यान रखा और न ही संघीय व्यवस्था की ही चिंता की। इससे देश की किरकिरी कराने का आरोप भी ममता पर लग रहा है।

ममता बनर्जी का केन्द्र सरकार के साथ टकराव पुराना है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विपक्षी नेताओं का विरोध भी कोई नया नहीं है। जिन राज्यों के प्रमुख नेताओं और खासकर मुख्यमंत्रियों ने मोदी विरोध का झंडा उठाया उन्हीं के राज्यों ने मोदी के समर्थन में अधिक सांसद भेजे। बंगाल का उदाहरण भी इसमें दिया जा सकता है। पहले 18 सांसद संसद में भेजे और 77 विधायकों के साथ विपक्ष के नेता की हैसियत भी उपलब्ध करा दी। इसके बाद भी ममता का विरोध चरम पर है। विपक्ष की मोदी विरोध में एकजुटता का प्रमाण यह है कि कांग्रेस और वाम दलों ने भाजपा की सरकार बनने से रोकने के लिए अपने सभी विधायकों को दांव पर लगाकर शून्य स्कोर स्वीकार कर लिया। यह राजनीति का नया संस्करण है। यदि ऐसा ही है तब संयुक्त विपक्ष को जनता पार्टी की भांति एक ही पार्टी बना लेना चाहिए। केन्द्र सरकार की योजनाओं को बंगाल में लागू न करना। केन्द्र सरकार के आदेश को नहीं मानना। और तो और अपने मुख्यसचिव को भी प्रधानमंत्री की बैठक में जाने से रोकने की घटना ने संघीय व्यवस्था के प्रति अविश्वास का बड़ा उदाहरण पेश किया है।

चुनाव में हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा होती है। उसे स्वीकार करने की परम्परा सभी राजनीतिक दलों ने अपनाई है। सत्ता का हस्तांतरण बड़ी ही आसानी से हो जाता है। कांग्रेस को फूटी आंख न सुहाने वाले नरेन्द्र मोदी को आखिरकार मनमोहन सिंह ने सरकार की चाबी दी ही थी। लेकिन चुनाव में हार-जीत के बाद कभी हिंसा का खेल नहीं खेला गया। लेकिन ममता बनर्जी की तीसरी बार सरकार बनने के बाद भाजपा को वोट देने वाले क्षेत्रों में हुई व्यापक हिंसा शर्मनाक इतिहास का अंग है। राजनीति का खूनी संस्करण एक महिला ने लिखा है। राज्यपाल, केन्द्र सरकार और भाजपा के बड़े नेताओं ने इस हिंसा का विरोध किया लेकिन विपक्षी नेताओं, अवार्ड वापसी गेंग और असहिष्णुता के लिए झंडा उठाने वाले सभी पक्षों के मूंह में दही जमा रहा। वे लेखक भी मौन साध गये जिनके प्रत्येक कालम प्रधानमंत्री मोदी की आलोचनाओं के नये रास्ते तलाशते रहते हैं। ममता की हिंसागिरी पर किसी की कलम नहीं चली। यह शर्मनाक पक्ष है।

सवाल यह उठता है कि अपने वजूद को संभालने के लिए विपक्षी दल हिंसा या अराजकता का सहारा लेंगे? जब बंगाल में हिंसा हो रही थी तब मौन और जब देश में कोरोना महामारी का तांडव चल रहा था तब भ्रम और बगावत पैदा करने का प्रयास विपक्ष की राजनीति का भौंडा संस्करण दिखाई दे रहा है। जब आक्सीजन की कमी से देश में हाहाकार था तब विपक्षी नेता और मीडिया मरीजों को भयाग्रस्त करने में लग गया था। जिससे अस्पतालों की  ओर लोगों के जाने का फ्लो तेज हो गया। बाद में यह जानकारी मिली है कि 85 प्रतिशत लोग घर में आइसोलेट होकर ठीक हो गये। जो अस्पताल में गये उनकी मौत का प्रतिशत घर में मरने वालों की तुलना में कई गुणा है। इस प्रकार विपक्ष की राजनीति करने का तरीका आम व्यक्ति की सुरक्षा से विपरीत रहा। वैक्सीन को लेकर भी विपक्षी की राजनीति दोगली रही। पहले वैक्सीन को लेकर भ्रम पैदा किये गये। इसको लगवाने से व्यक्ति नपुंसक हो जायेगा? इसमें तो सुअर की चर्बी मिली हुई है? यह तो भाजपा की वैक्सीन है मैं नहीं लगवाऊंगा आदि-आदि। ऐसे बयानों से लोग भ्रम में आ गये। इससे उत्पादन भी प्रभावित हुआ और तैयार वैक्सीन विदेशों को सौजन्य रूप में देनी पड़ी। अब विपक्ष सवाल पूछ रहा है कि विदेशों को देने की क्या जरूरत थी? यह राजनीति जनविश्वास अर्जित करने का अजीब तरीका है। क्या मोदी के रचनात्मक कार्यों को भ्रम और नकारात्मकता से जनता में कम किया जा सकता है?

देश का विपक्ष वजूद के लिए संघर्ष कर रहा है। सबसे पुरानी और सबसे अधिक समय तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी देश के सभी बड़े राज्यों से नदारत हो चुकी है। तमिलनाडु में सहयोगी के कंधों पर सवार होकर सरकार में आई है। पश्चिमी बंगाल में तो शून्य के स्कोर पर आ टिकी है। जितने भी चुनाव हुए हैं वहां कांग्रेस पहले की अपेक्षा कमजोर स्कोर पर ही रही है। स्थिति तो यहां तक पहुंच गई है कि अध्यक्ष बनाने को लेकर मारामारी हो रही है। जी-23 के नेताओं ने तो गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया था लेकिन गांधी परिवार में आन्तरिक लड़ाई चल रही है। राहुल को अध्यक्ष बनाया जाये या प्रियंका को। अन्य विपक्षी दलों में अपना अस्तित्व बचाने की होड़ है। महाराष्ट्र में शिवसेना के लिए चुनाव का सामना करना कठिन होगा तो अकाली दल के सामने कांग्रेस को अकेले फेस करने की चुनौती होगी। जिस किसानों की पूंछ पकड़कर बेहतनी पार करने का मानस बनाया था उन्होंने स्थानीय निकाय में ही अकालियों की हवा निकाल दी। ऐसे में मोदी का मुकाबला करने से पहले आपसी संघर्ष तो करना ही होगा?
                                                      संवाद इंडिया

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