‘रिहाई’ एक की 23 की शहादत को न ‘भुलवा’ दे

भोपाल (सुरेश शर्मा)। हमने कल अपने कालम में लिखा था कि जब पाकिस्तान से अभिनंदन को लाया जा सकता है तब नक्सलियों से राकेश्वर को क्यों नहीं छुड़ाया जा सकता है? सरकारों को धन्यवाद कि हमारा जांबाज कमांडों सकुशल वापस आ गया है। एक बात और सामने आई कि इस बार नक्सलियों ने अपनी तरफ से जल्दबाजी दिखाई है कि हम छोडऩे के लिए तैयार हैं मध्यस्थों के नाम दिये जायें। अगले दिन ही राकेश्वर सीआरपीएफ के कैम्प में आ गया। इसके दो अर्थ निकाले जा सकते हैं पहला भूपेश सरकार ने समझदारी से काम किया होगा? दूसरा अमित शाह खुद श्रद्धाजंलि देने के लिए बस्तर पहुंचे थे। उन्होंने उच्चस्तरीय बैठक ली और अपनी शैली में मीडिया से कह दिया कि अब अन्तिम परिणाम की प्रतीक्षा करिये। नक्सलियों को लग गया होगा कि जब कश्मीर का आतंकवाद और पत्थरबाजी को समाप्त किया जा सकता है तब नक्सल को समाप्त करने में कितना समय लगेगा। यह अमित शाह है। लेकिन जो हुआ उसके लिए सभी पक्षों को धन्यवाद। सवाल यह है कि एक की रिहाई के चक्कर में 23 जवानों के बलिदान को नहीं भूलना चाहिए। जो मुहिम है वह जारी रहना चाहिए। कहीं अति उत्साह हमें शहादत को भुलाने की दिशा में दो-चार कदम ही न चलवा दे।

एक जांबाज सकुशल आ गया इसके लिए सभी प्रबंध करने वालों का साधुवाद। लेकिन सवाल यह है कि अब क्या नक्सलवाद का कोई मकसद रह गया है? एक समय था जब शोषण होता होगा। यह तरीका भी मान लिया गया होगा। लेकिन उस समय शोषण करने वालों के विरूद्ध हथियार उठाये गये थे। जो आदिवासियों के अधिकारों और संसाधनों को लूट रहे थे। विकास की असमानता थी। जीवन में कोई प्रकाश दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता था। ऐसे में इस प्रकार के प्रयासों की अधिक नकारात्मकता नहीं थी। आजादी की लड़ाई में भी अहिंसा और हथियार दो समान धाराएं चलीं थीं। लेकिन अब वह मानसिकता भी नहीं रही और वह उद्देश्य भी नहीं रहा। इसलिए नक्सलवाद को आतंकवाद की भांति देखा जाने लग गया। यह सुधार के लिए नहीं बल्कि खून-खराबे के लिए होने लग गया। अब मुकाबला सुरक्षा बलों से हो गया न कि जिनके माध्यम से विकास होना है उनसे? विकास के कार्यों तो खुद नक्सली ही रोकते हैं। इसलिए अब आतंकवादियों की भांति नक्सलियों को खत्म करने की योजना सरकारें बनाने लगी हैं। आने वाले समय में जिस प्रकार वामपंथ खत्म हुआ है नक्सलवाद भी समाप्त हो जायेगा।

इसलिए वही सवाल फिर सामने आकर खड़ा हो रहा है कि राकेश्वर सिंह की रिहाई हमारी उपलब्धि है या सौदा? जो भी हो हमने एक योद्धा को सुरक्षित कर लिया है। यह रणनीति है। लेकिन यह रणनीति ठहराव नहीं बनना चाहिए। जो सर्च अभियान था वह चलना चाहिए और आतंक समाप्त करने के लिए उठाये जाने वाले कदम भी उठना चाहिए। एक रिहाई का मतलब 23 की शहादत को भुलाना नहीं हो सकता? भूपेश सरकार हो या मोदी सरकार व अमित शाह का पक्का इरादा हो नक्सलवादियों के सामने अब बचने का रास्ता नहीं होना चाहिए। अपराध और हिंसा का कोई स्थान भारतीय मानव जीवन में नहीं होना चाहिए। हिंसा का जवाब तो गोली ही होता है?

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