राहुल गांधी के अध्यक्ष पद त्यागने के बाद नया प्रयोग, सीएए की आड़ में प्रियंका की लांचिंग

सुरेश शर्मा
नागरिकता संशोधन कानून का विरोध वामपंथियों ने छात्रों के माध्यम से जेएनयू में कराना शुरू किया। इसके बाद कांग्रेस भयभीत हो गई और उसे भी लगा कि सहभागिता का रास्ता निकाला जाये। जामिया और अलीगढ़ विवि में मुस्लिम बहुल होने से कांग्रेस ने यहां से आन्दोलन में शामिल होने का रास्ता खोजा। एक भ्रम पैदा किया गया और यहां से भी छात्र आन्दोलन शुरू हो गया। कांग्रेस मुख्य किरदार में आ गई। आज देश भर में विरोध के स्वर एक सीमित शिक्षण संस्थानों और राजनीतिक दलों की ओर से आ रहे हैं जबकि समर्थन में देश का बड़ा तबका आगे आ गया है। दिल्ली में सीएएए के विरोध के धरने का विरोध ही नागरिकों ने असुविधा के नाम पर कर दिया जिससे आन्दोलन की हवा निकलना शुरू हो गई। विरोध और समर्थन की राजनीति के बीच अब सीएए देश में लागू हो गया क्योंकि सरकार ने इसे नोटिफाई कर दिया है। विरोध करने वाले राजनीतिक दलों में पड़ी फूट के बीच कांग्रेस ने इस सारे मामले को प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति में बड़ी लांचिंग के रूप में भी भुनाया है। राहुल गांधी के फ्लाप हो जाने और अध्यक्ष पद से पलायन करने के बाद से यह उम्मीद की जा रही थी कि सोनिया गांधी को कितने दिन तब अध्यक्ष रखा लायेगा? या तो राहुल की वापसी होगी या प्रियंका को लांच किया जायेगा। इसलिए कांग्रेस इस मामले में सहानुभूति कार्ड खेलते हुये प्रियंका को कांग्रेस की खेवनहार के रूप में पेश कर दिया है। वे जब राजनीति के समर में प्रचार करते हुये उतरेंगी तब समझ में आयेगा कि उनमें इंदिरा गांधी का अश्क है या राहुल गांधी की छोटी बहिन उनके कदमों पर ही चलती हैं।
राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में पार्टी को दूसरी बार भी विपक्ष का नेता लायक सीट नहीं दिलवा पाने की असफलता के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया था। उन्हें मनाने का प्रयास खूब हुआ लेकिन वे मानने को राजी ही नहीं हुये। उन्हें अपेक्षा थी कि कुछ सहयोगी पदाधिकारी और अन्य जिम्मेदार नेता पदों को छोड़ देंगे और नैतिक समर्थन पाकर वे पार्टी कमान फिर से संभाल लेंगे। संगठन में बदलाव भी कर लेंगे। लेकिन कोई भी समर्थन में नहीं आया। उलटे यह संभावना देखी जाने लगी कि कांग्रेस किसी गैर गांधी व्यक्ति को कांग्रेस की कमान मिल जायेगी। जब यह बात खुलकर सामने आने लग गई तब सोनिया गांधी सक्रिय हुई और तब तक के लिए कमान अपने हाथों में ले लीं। उन्हें यह पता था कि अब उन्हें संगठन में कोई मनमोहन मिलने वाला नहीं है। राहुल को मनाने के प्रयास होते रहे लेकिन उन्होंने मोदी विरोध में अपनी छवि ऐसी बना ली कि देश में उनकी स्वीकार्यता काफी कम हो गई। उन्होंने गांधी-नेहरू परिवार जैसा राजनीतिक कौशल भी प्रदर्शित नहीं किया तथा दिग्गज कांग्रेसी भी उनको कंधे पर लेकर चलने को तैयार नहीं हुये। इसलिए उन किया गया ही प्रयोग फेल होता चला गया। अब जब सीएए का विरोध चल रहा है प्रियंका गांधी वाड्रा को लांच करने की कांग्रेसी कौशिश शुरू हो चुकी हैं। उनके साथ सहानुभूति कार्ड खेला जा रहा है। वे इंदिरा गांधी का अश्क लेकर पैदा हुई हैं। उनको हर पीडि़त के घर सहानुभूति दर्शाने के लिए भेज दिया जाता है। वहां से प्रभाव भी वे लेकर लौट रही हैं। वे राजनीतिक बयान भी संभलकर दे रही हैं ताकि कोई ऐसी भूल न हो जाये जो उन्हें खड़ा होने से पहले ही गिरा दे। राहुल गांधी की भांति उन्हें बौद्धिक स्तर पर उतारने की बजाये सहानुभूति प्वाइंट पर खड़ा किया जाता है।
प्रियंका के साथ भी राहुल गांधी जैसी ही टीम है। जिसका अपना कोई अणिक प्रभाव नहीं है। जिन नेताओं को रणनीति का माहिर माना जाता है वे भी पीछे या परदे के पीछे हों तब अलग बात है लेकिन सामने ऐसा दमदार प्रदर्शन नहीं दिख रहा है। अभी किसी भी चुनाव में प्रचार की कमान प्रियंका ने नहीं संभाली है जिससे यह पता चल सके कि वे इंदिरा गांधी की भांति हैं और राहुल गांधी की छोटी बहिन नहीं हैं। सीएए पर कांग्रेस का स्टेंड प्रियंका को लांच करने के अलावा कोई और प्रभाव नहीं डाल पाया है। उसकी गतिविधियों का विरोध शुरू हो गया है। यूपी में मायावती ने प्रियंका पर सीधे निशाना साधना शुरू कर दिया है तो बंगाल में ममता बनर्जी ने कांग्रेस को हडकाना शुरू कर दिया है। वे वाम दलों को भी इस आन्दोलन में साथ लेने की पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में प्रियंका वाड्रा को इस लांचिंग का कितना फायदा होगा यह आन्दोलन के परिणाम तक पहुंचने के बाद ही पता चलेगा। मोदी सरकार की सेहत को प्रभावित करने की क्षमता अभी प्रियंका गांधी और उनकी पार्टी नहीं दिखा पा रही है। जब तक कांग्रेस उन्हें सोनिया राहुल के बाद अपना अध्यक्ष मानने की स्थिति में नहीं होगी तब तक वे अपना जौहर दिखा भी नहीं पायेंगी।
सीएए से विपक्ष को अपेक्षा थी कि सरकार परेशान होगी। छात्रों के आन्दोलन के बाद उसे दहशत होगी कि कहीं सरकार को खतरा तो नहीं हो जायेगा? लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी ने बिना विचलित हुये इस सारे मामले का सामना करने की रणनीति पर काम किया। छात्रों के आन्दोलन को धार्मिक बनने दिया गया। जामिया औी अलीगढ़ के छात्रों के मायने देश समझता ही था लेकिन जेएनयू के तर्क भी इस आन्दोलन को प्रभावशाली नहीं बना पाये। वाम नेता छात्रों के आन्दोलन में जल्दी अपनाने के चक्कर में चूक कर गये जिसका लाभ मोदी सरकार को मिला। यह छात्र आन्दोलन न होकर वाम दलों का आन्दोलन है यह साफ हो गया। मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए सभी कथित सेक्युलर दल भी कूद गये और आपसी फूट पड़ गई। विपक्ष चाहता था कि आन्दोलन में हिन्दू समाज में फूट पड़े और मुस्लिम वोट बैंक मोदीर विरोध के कारण एकजुट हो जाये। कुछ दिन तक तो वह एकजुट भी दिखा लेकिन सरकार का विचलित न होना और उन्हें अपनाते हुये यह समझाने का प्रयास करना कि इस कानून से किसी की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह नागरिकता देने का कानून है लेने का नहीं।
छात्रों को प्रवेश रोकना और और जेएनयू में छात्र नेताओं का सरवर से छेड़छाड़ करना उनकी राजनीतिक जल्दबाजी हो गई। जेएनयू के छात्र हमले को मोदी सरकार से जोडऩा भी एक ऐसा कदम हुबआ जिसका राजनीतिक परिणाम आपेक्षित नहीं रहा। मीडिया ने भी इस आन्दोलन को भरमाने का प्रयास किया जिसे बाद में समझ में आ गया कि उसका खेल उसी के लिए घाटे का सौदा हो रहा है। इसलिए अब वे स्थिति को साफ करने में लग गये हैं। जेएनयू का चरित्र एक बार फिर से सामने आ गया। मोदी सरकार को मकसद साम्प्रदायिक सिद्ध करने की बजाये विपक्षी दलों ने इसे छात्रों के साथ ज्यादती पर अधिक केन्द्रीत कर दिया जिससे उन्हें अधिक लाभ नहीं हुआ। प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक समाज को लगा कि उनकी सरकार को परेशान करने के लिए विपक्ष अल्पसंख्यकों को उकसा रहा है। यही कारण है कि सीएए के समर्थन में अधिक से अधिक लोग शामिल होने लगे। शहर दर शहर भीड़ अधिक हो रही है। भाजपा ने घर-घर जाने का निर्णय लिया और समर्थन का आन्दोलन विरोध के आन्दोलन से बड़ा हो गया। कांग्रेस राजनीतिक आकंलन करने में गच्चा खा गई। यही वह बात है जो समीक्षक बराबर लिख रहे हैं। राहुल हो या प्रियंका अनुभवी नेताओं से किनारा कर रही हैं जिससे उनकी नेतृत्व क्षमता समय से पहले मात खा जाती है। अभी भी कांग्रेस ने साफ्ट हिन्दूत्व के अपने नये रास्ते से भटक कर अपना आधार कमजोर किया है। मुस्लिम वोटों में कांग्रेस कितनी सेंधमारी कर पाती है यह दिल्ली के चुनाव से उसे पता चलेगा लेकिन उसने हिन्दूओं की सहानुभूति खोई है यह उसको अभी से लगने लग गया होगा। इसलिए प्रियंका गांधी की लांचिंग का जो रास्ता अपनाया गया है वह भी आने वाले दिनों में सवालिया दायरे में आ जायेगा। प्रियंका वाड्रा को गंभी राजनीति की ओर आना होगा जो कहीं भी दिखाई नहीं दे रही है।
संवाद इंडिया

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