‘राहुल’ के 44 स्कोर को 52 तक पहुंचाया ‘प्रियंका’ ने

भोपाल। 2014 लोकसभा चुनाव के परिणाम देख रहा था। भाजपा को 282 और कांग्रेस को 44। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को अपने दम पर सरकार बनाने के योग्य बना दिया। राहुल गांधी अकेले थे युवा थे इसलिए स्कोर 44 तक ही पहुंच पाया। इसलिए कांग्रेस ने 2019 के आम चुनाव के लिए मोदी-शाह की भांति अपने यहां भी जोड़ बनाकर राजनीतिक चमक बनाने का प्रयास किया। राहुल के जोड़ीदार के रूप में बहिन प्रियंका वाड्रा को चुना। तब यह उम्मीद की जा रही थी कि प्रियंका राजनीति में श्रीमती इंदिरा गांधी की कमी को पूरा करेंगी। जिस प्रकार की भीड़ उनके लिए उमड़ रही थी तब लग भी रहा था कि इस जोड़ी में दम है। बनारस से चुनाव लडऩे के कयासों ने और प्रियंका द्वारा दिये जा रहे संकेतों ने भाजपा के नेताओं की धड़कनों को बढ़ा दिया था। मीडिया समीक्षकों की नजरे भी टिक गईं थीं कि आखिर प्रियंका वाड्रा क्या करने जा रही हैं? वैसा तो कुछ नहीं हुआ लेकिन यह उम्मीद सबको थी कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में जरूर कुछ ऐसा होगा जिससे बहिन-भाई का राजनीतिक परचम लहरायेगा। भाषणों को तुलनात्मक रूप से देखें तो राहुल गांधी चौकीदार चोर पर अधिक जोर लगाये थे लेकिन प्रियंका ने अपने भाषण का खासा सन्तुलित रखा। यदि दुर्योधन और दुस्साशन जैसे कुछ अवसरों को छोड़ दिया जाये तो उन्होंने दिशा बनाये रखी।
प्रचार की भीड़, भाषण की क्षमता और परिवार का स्टेटस प्रियंका गांधी के साथ था। ऐसे में अब जब चुनाव परिणाम आ गये तब पूर्वोत्तर की समीक्षा करें तो गांठ का ही कुछ चला गया। गांठ में कुछ ऐसा वैसा नहीं था। दो नायब हीरे ही बचे थे जो लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते थे। खुद राहुल गांधी और मां श्रीमती सोनिया गांधी। राहुल गांधी अमेठी में हार गये। इस हार ने कई सवाल उठा दिये। आप मोदी को हराने खुद दांव पर लगने की योजना बना रहे थे लेकिन भाई ही हार गये। कांग्रेस के प्रमुख का अपने परम्परागत गढ़ से यूं हार जाना बड़ा ही नहीं गंभीर सवाल है। सब पर है यी सवाल। आखिर किला कैसे मोदी फतह कर ले गया? यूपी में कुछ ज्यादा जीतने की संभावना लेकर मैदान में चले थे घर को ही लुटा आये। अब पूरे देश की समीक्षा करें। पिछले चुनाव में 44 सीटें जीते थे। उपचुनाव में 4 और बढ़ गई। कुल जमा 48 सीटें हो गई थी। इस बार के चुनाव परिणाम इस टैली को 52 तक ले गये। मतलब आम चुनाव से आम चुनाव में 8 का अन्तर और चुनाव में जाने से पहले  और अब 4।
मोदी शाह की जोड़ी 2014 में जीती थी 282 लेकिन उपचुनावों में हार के बाद स्थिति 273। अब जब चुनाव परिणाम आ चुके हैं तब सीटें मिली 303 याने कि  2014 की तुलना में 21 और अन्तिम स्थिति से 30 अधिक। जोडिय़ों की तुलना का अधिकार अब पाठकों को। अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस तो देश को आजाद कराने वाली पार्टी है। महात्मा गांधी और पंडित नेहरू की पार्टी है। गांधीवाद को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है। फिर यह हालात क्यों बन गये? क्या सचमुच में गांधीवाद बचा है कांग्रेस में या केवल लबादा ही ओढ़ा हुआ है? क्या गांधी सरनेम अपनी महिमा को खुद ही खा रहा है? इन्हीं सवालों के बीच पूरा गणित उलझा हुआ है। उत्तर कांग्रेस को खोजना है।

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