‘राहुल’ की तुलना में थरूर नेे दिखाई ज्यादा ‘समझ’

भोपाल। अमेरिका भी मान कर चल रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप उसके लिए कोई लाभ का सौदा नहीं है। यह वहां के विदेश मंत्रालय के बयान के बाद तो माना ही जा सकता है। विदेश मंत्रालय ने बिना देरी किये कह दिया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच कश्मीर को लेकर कोई बात ही नहीं हुई। उसने यह कहने से परहेज किया गया ट्रंप झूठे हैं। लेकिन मतलब यही था। भारत की राजनीति को देखिये। यहां पर भी गजब हो रहा है। पुराने विदेश मंत्री नटवर सिंह कहते हैं कि मोदी ऐसा नहीं बोल सकते क्योंकि भारत की विदेश नीति में कोई बदलाव किया ही नहीं गया है। यही बात कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने भी व्यक्त किये हैं। उनका कहना था हम भारत की नीति के साथ हैं क्योंकि भारत सरकार का संचालन कोई भी कर रहा हो लेकिन कश्मीर पर तीसरे पक्ष को स्वीकार करने की कोई बात हो भी नहीं सकती और प्रधानमंत्री मोदी ऐसा बोल भी नहीं सकते। यह तो हुई दोनों के बौद्धिक नेताओं की। अब कांग्रेस के त्यागपत्र दिये अध्यक्ष राहुल गांधी की बात कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को इसका जवाब देना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने ट्रंप के सामने ऐसा कुछ नहीं बोला। उनकी संसद में ब्रिगेड ने भी ऐसी ही मांग की। लोकसभा में अधिरंजन और राज्यसभा में गुलाम नबी और आनंद शर्मा ने राहुल की बात को ही आगे बढ़ाया शशि थरूर की बात को नहीं।
सवाल यह है कि राष्ट्रपति टं्रप ने कश्मीर को लेकर जो बात बोली उसका खंडन भारत के विदेश मंत्री ने दोनों सदनों में कर दिया। अमेरिका की ओर से भी इसकी पुष्टि कर दी। ट्रंप की बेटी ने भी इसका खंडन करके अपने पिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिये। यह सब हुआ जिसमें दोनों देशों की साख और संबंधों को कोई खतरा नहीं हुआ। अब विपक्ष के नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी बोले कि टं्रप ने झूठ बोला है। ऐसा बोलते ही दोनों देशों के बीच संबंधों का बिगडऩा तय है। विपक्ष ऐसा क्यों चाहता है कि भारत और अमेरिका के बीच बने संबंधों में बिगाड़ आये? लेकिन कांग्रेस में दो नेता ऐसे हैं जिन्होंने न केवल अपने राजनीतिक कौशल का वैश्विक आधार दिया और उन्होंने देश का पक्ष लिया। शशि थरूर ने साफ किया कि हमें भारत के नेतृत्व पर भरोसा करना चाहिए। इसी प्रकार की गंभीर बात  नटवर सिंह ने भी कही जो विदेश मंत्री रह चुके हैं। यहां यह भी उल्लेख करने की बात है कि भारत के आज के विदेश मंत्री उस समय विदेश सचिव थे। लेकिन देश की राजनीति में यह निकल कर आया कि विपक्ष अपने राजनीतिक हित के लिए देश की भावनाओं और सम्मान को भी दांव पर लगा सकता है।
एक बात और सामने आई है। कांग्रेस इस समय नेतृत्व विहिन है। राहुल गांधी के त्यागपत्र के साथ यह स्थान खाली है। तीन प्रभावशाली नाम सामने आ चुके हैं। दूसरी तरफ एक नाम है। अधिरंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा। वे राहुल की भाषा के नेता हैं। दूसरी तरफ एक नाम है शशि थरूर है। जो कांग्रेस की मूल संस्कृति का नेता है। अब राहुल गांधी को तय करना है कि वह शशि थरूर को अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं या बाकी तीनों की बिग्रेड़ को। देश की नजर है कि इतनी गंभीर हार के बाद भी कांग्रेस पुराने राग अलापती है या फिर नया विचार लेकर आती है।

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