‘राष्ट्रपति’ अभिभाषण में कहां से आ टपके ‘अडाणी’?

भोपाल (सुरेश शर्मा)। मेरा टेसु यहीं अड़ा। विपक्ष भारत के बड़े उद्योगपति को निशाना बनाते समय सभी मर्यादाओं को तार-तार कर रहा है। विश्व में कहीं भी ऐसा उदाहरण शयद ही मिले की सरकार के मुखिया का चरित्र तार-तार करने के लिए किसी उद्योगपति को इस प्रकार और इतना निशाने पर लिया गया होगा। देश पर अधिक समय तक राज करने वाली राजनीतिक पार्टी का वारिश यदि इस प्रकार की निशानेबाजी करता है तब यह अधिक चिंता की बात हो जाती है। क्योंकि ये सभी उद्योगपति उन्हीं की सरकार के समय निवाजे गये थे। ऐसा करना देशहित में ही था कि उद्योग पनपे और रोजगार के साधन निर्मित हों। लेकिन अब सरकार बदलने पर विरोध विनाश की स्थिति तक चला जाये ऐसा तो कभी देखने में नहीं आता था। लेकिन आज का विपक्ष जो कर दे वह कम है। यही कारण है कि जनता में उसका अधिक समर्थन नहीं मिल रहा है। एक विदेशी निवेशक के द्वारा अडाणी किया गया खुलाशा सच है या नहीं लेकिन भारत की विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने इसे मुद्दा बना लिया। वित्तमंत्रालय और रिजर्व बैंक के द्वारा दी गई जानकारी को भी वह सुनने और मानने के लिए तैयार नहीं है। इससे संसद और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिया जाने वाला धन्यवाद अभी उलझा हुआ है। आखिर सरकार ने विपक्ष को इसके लिए मना लिया।

राहुल गांधी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के कभी मुखिया रहे हैं। उन्होंने अभिभाषण पर बोलना शुरू किया। शुरूआत में अभिभाषण में उल्लेखित विषयों को छुआ लेकिन बाद में सुई अडाणी मामले पर आकर सेट हो गई। देश ने इस भाषण को सुना और समाचार पत्रों में उसे पढा। इसमें अडाणी की व्यापार गाथा और प्रधानमंत्री के साथ उनके संबंधों पर केन्द्रीत था। देश का प्रधानमंी हमेशा तीन विषयों को लेकर विदेशों में यात्रा करता रहा है। भारत में इससे पहले ऐसा नहीं हुआ होगा यह कोई स्वीकार नहीं कर सकता है। समसामयिक मामले में कूटनीति, संस्कृति और व्यापार। इन्हीं विषयों पर विदेश यात्रा केन्द्रीत रहती है। नरेन्द्र मोदी के सरकार में आने बाद से इन तीनों विषयों पर भारत को अपार सफलता मिली है इसलिए इस पर विपक्ष उन्हें घेरने का प्रयास करता है। राहुल गांधी ने खुद ही बताया कि प्रधानमंत्री के दौरे के बाद अडाणी के साथ व्यापर समझौते होते थे। मतलब व्यापार के मामले में यात्रा सफल हो रही थी। हमारे निर्यात और मेक इन इंडिया में हुए निवेश इसको और प्रमाणित करते हैं। विश्व में कूटनीति मामलों में भारत की धाक का प्रमाण यूक्रेन-रूस युद्ध के बीच से भारतीय छात्रों को निकालने का है। यूएई में सांस्कृतिक बदलाव तीसरा प्रमाण है।

ऐसे में राहुल गांधी का भाषण बेमानी हो जाता है। अडाणी भारत की अर्थव्यवस्था का प्रतीक होना सही है या नहीं यह एक विमर्श का विषय है लेकिन उनके व्यापार को दांव पर लगाकर विरोध करना अनुचित है। राहुल गांधी विपक्ष की मर्यादा को लांधते दिखाई दिये। विपक्ष भी भारत के विकास और एकता का संरक्षक होता है। उसकी भी देश में सरकारें हैं। उनकी सरकारों ने भी इन उद्योगपतियों से निवेश का आग्रही किया है। ऐसे में इन उद्योगपतियों और ट्रेडर्स के साथ इस प्रकार का व्यवहार सही मानसिकता को नहीं दर्शाता है। फिर भी राहुल गांधी राहुल गांधी हैं उनको को सीख दे सकता है?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button