‘राज्यपाल’ ऐसे बजट पर हस्ताक्षर न करे तब क्या ‘क्या’ होगा

भोपाल। एक चौंकाने वाली खबर फिर से बंगाल से आ रही है। वहां बजट सत्र राज्यपाल के अभिभाषण के बिना ही शुरू होने जा रहा है। यह संविधान के अनुच्छेद 176 का उल्लंघन है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि हर वर्ष के शुरू में होने वाले सत्र का शुभारंभ राज्यपाल या राष्ट्रपति का लोकसभा के लिए अभिभाषण होगा उसी के बाद सत्र शुरू होगा। पश्चिमी बंगाल विधानसभा का यह अन्तिम सत्र है और ममता सरकार ने तय किया है कि वे बजट बिना राज्यपाल के अभिभाषण के ही शुरू करवायेंगी। इस बारे में विधानसभा के अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने कहा है कि चूंकि सत्र पहले से ही चल रहा है इसलिए अब अभिभाषण की जरूरत नहीं है। इसके बाद जानकारों का कहना है कि दो दिनी विशेष सत्र भी तो बिना राज्यपाल के अभिभाषण के ही शुरू हुआ था इसलिए यदि ऐसा हुआ तो यह संविधान का घोर उल्लंघन होगा। उस समय और संकट पैदा हो जायेगा जब अभिभाषण के बिना परित वित्त विधेयक पर राज्यपाल यह कह कर हस्ताक्षर करने से मना कर दें कि यह संविधान की भावनाओं के विपरीत पारित हुआ है तब प्रदेश की स्थिति क्या होगी? इसलिए विरोधी दलों के नेताओं ने सरकार के इस कदम की आलोचना की है। सभी दलों ने इसे संविधान विरोधी बताया है। लेकिन चुनाव में कुछ भी कर गुजरने की मानसिकता रखने वाली ममता बनर्जी के सामने विरोध कोई मायने नहीं रखता। संघीय व्यवस्था का अनुपालन केन्द्र को भी करना होता है और राज्यों को भी। लेकिन मोदी जब से देश के प्रधानमंत्री बने हैं तब से संविधान का मजाक बनाने और संघीय व्यवस्थाओं की अनदेखी करने की होड़ मची हुई है। केन्द्र के आदेशों को न मानने, सीबीआई को अपने प्रदेश में न घुसने देने और अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग न करने देने जैसे केन्द्र सरकार द्वारा पारित कानूनों को अपने राज्य में लागू न करने के संबंध में विधानसभाओं से प्रस्ताव पारित करके भेजने संबंधित अनेक घटनाएं इन दिनों हो रही हैं। यह संघीय व्यवस्था के विपरीत हैं। केन्द्र मेंं जिस भी दल की सरकार को जनादेश मिलता है उसे अपनी विचारधारा के आधार पर कानून और कार्यक्रम बनाने और चलाने का अधिकार मिल जाता है। जब देश में कांग्रेस की सरकार थी तब वह भाजपा की मंशा के अनुसार कानून नहीं बनाती थी और अब भाजपा की सरकार है तब उसे कांग्रेस से सहमति लेने की कोई जरूरत नहीं है। इसलिए कानून बनाने के समय असहमति का अधिकार तो संविधान देता है लेकिन जब कानून बन जाता है तब वह देश का कानून हो जाता है।
अब नया मामला आ गया। बजट सत्र से पहले अभिभाषण से ही ममता सरकार ने इंकार कर दिया। बंगाल में राज्यपाल और सरकार के बीच तनातनी की घटना सर्वविदित है। इसके बाद भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वे राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दे। पहले भी विरोधी विचारधारा के राज्यपाल अभिभाषण देते आये हैं। अब राज्य में नया विवाद हो जायेगा। जब राज्यपाल विनियोग विधेयक पर हस्ताक्षर से मना कर देंगे और पास बजट का कानून नहीं बन पायेगा और सरकार को खर्च करने का अधिकार नहीं मिल पायेगा। तब क्या होगा? तब क्या ममता बिना स्वीकृति के राशि खर्च कर लेंगी? यह गंभीर चिन्ता की बात है।

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