‘राजनीति’ के झमेले में उलझ कर न रहे जाये ‘अपराध’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। कुछ घटनाक्रम यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि राजनीति के झमेले में जब भी कोई विषय जाता है वह अपने मूल स्वरूप को खो देता है। सुशान्त सिंह राजपूत का विषय हो जिसकी जांच सीबीआई ने शुरू की थी। तेजी भी आई। राजनीति अन्दर घुसी तो न्याय नहीं मिल पाया। खास बात यह है कि जिन लोगों को लग रहा था कि सुशान्त की हत्या हुई है वे भी और नहीं हुई मानने वाले दोनो पक्ष चुप हैं। इसके बाद नारकोटिक्स विभाग की इन्ट्री हुई। कुछ नामचीन लोग सलाखों के पीछे गये। जेल की हवा भी खाई लेकिन जमानत हुई तो सब ठंढे बस्ते में चला गया। कारण इसमें भी वही था। राजनीति का प्रवेश हुआ और सब गुड़ गोबर हो गया। पिछले दिनों आयकर विभाग ने दो उन फिल्मी सितारों के यहां छापा डाला जिन पर मोदी का विरोध करने का आरोप था। खूब राजनीति हुई। यह भी समाचार छापा गया कि 500 करोड़ का गोलमाल सामने आया है। लेकिन जब यह कहा गया कि यह छापा तो मोदी के विरोध में बोलने के कारण डला है तब यह मामला भी परदे के पीछे चला गया। हो सकता है विभाग अपना काम कर रहा होगा लेकिन बात तो दब गई। ऐसा न हो कि शरद पवार ने अमित शाह से मुलाकात कर ली और एनआईटी अनिल देशमुख मामले को हाथ ही न लगाये? यह राजनीति है भाई।

इतने प्रमाण देखने के बाद कुछ कहने को नहीं दिखता है। फिर भी इटारसी की सभा में प्रधानमंत्री ने कहा था कि मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार किसी योजना का पैसा शिफ्ट कर रही है। तब बात समझ में नहीं आई थी लेकिन जब चुनाव आयोग ने इसके बारे में प्रदेश सरकार को टीप भेजी तब उम्मीद हुई थी कि मामला परिणाम तक पहुंचेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। घोटाले घपलों की बात नेतागण अपने भाषणों में कहते हैं लेकिन जिम्मेदारी के पद पर होने के बाद भी कोई कुछ नहीं करता। इसका मतलब है कि सब राजनीति का झमेला है। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि देशमुख ने सौ करोड़ का टारगेट दिया और हर महीने में ऐसा करने का कहा तब इसकी आंच किसी झुलसायेगी? देश का कौन सा नागरिक नहीं चाहेगा कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा कहने वाला प्रधानमंत्री अपनों को तो खाने नहीं दे रहा है लेकिन विपक्ष के लोग तर माल खा रहे हैं उनको रोकने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। राहुल गांधी रोजाना गैर जिम्मेदारी वाले आरोप लग रहे हैं लेकिन उनके कारनामों की जानकारी होने के बाद भी कोई परिणाम दिखाई नहीं देते हैं। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि अनिल देखमुख ने जा टारगेट दिया है उसका कुछ हो पायेगा?

याद करना ही होगा देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना मुकेश अंबानी के घर के सामने विस्फोटकों से भरी गाड़ी खड़ी करके कोई चला गया। बाद में पता चला कि यह गाड़ी तो प्रायोजित थी। आरोपी पुलिस वाला निकला और वह निलंबन के समय मेें शिवसेना में काम करता था। इसके बाद भी मामला ठंडे बस्ते में है इसलिए यह राजनीति है। एक नेता दिन भर अडानी-अंबानी को कोसता है और उसके समर्थन वाली सरकार विस्फोटक रखवाती है लेकिन चर्चा नहीं होती यही राजनीति का झमेला है। अनिल देशमुख मामला इसी झमेले में फंसे इसके लिए पवार-शाह में मुलाकात होती है। परिणाम तो आना ही चाहिए।

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