‘राजनीति’ की तराजू में आ गये देवालय और ‘मदिरालय’

सुरेश शर्मा

भोपाल। जब 22 मार्च को जनता कफ्र्यू लगाकर लोगों को प्रेरित किया था तब पूरा देश प्रेरित हो गया था। अगला दिन रविवार का था इसलिए देशभर में संस्थान बंद ही रहे। अगले दिन से लॉकडाउन करके देश को कोरोना वायरस की महामारी से बचाने का प्रयास शुरू हुआ। पूरा देश सरकार या सरकारों के साथ खड़ा है। वे ही समस्या बने रहे जिन्हें अपने प्राणों की परवाह नहीं लेकिन वे मोदी के निर्णयों, सरकार के काम और मोदी की राजनीति का विरोध करते रहे हैं। ऐसे समूह को अलग से परिभाषित करने की जरूरत नहीं है क्योंकि वे देश के सामने बेनकाब हो चुके हैं। देश का पहिया जाम है। सेवाभावी लोग बाहर हैं और देश घरों में है। हम इसकी समीक्षा नहीं करेंगे कि कौन क्या कर रहा है और कौन राजनीति कर रहा है? आज हमारा ध्यान केवल राजनीति की तराजू में देवालयों और मदिरालयों को रखने और उसमें भेदभाव करने पर है। जब सरकार की अर्थव्यवस्था बिगडऩे लगी तो रास्ता निकाल लिया गया कि शराब की दुकानें शारीरिक दूरियों के फार्मूले के आधार पर खोली जा सकती हैं। तब सवाल यह उठता है कि आस्थावान भारत वर्ष की आस्थाओं पर ताला लगाने की क्या जरूरत है? इसी फार्मूले के आधार पर देवालयों को भी तो खोला जा सकता है। जब महाकाल मंदिर बंद किया गया तब से उज्जैन में काल का तांडव किससे नहीं देखा। देवदर्शन भी 'इम्युनिटी'  बढ़ाने का बड़ा साधन है।

दो बार के लाकडाउन को बढ़ाने का किसने विरोध किया? किसी ने भी नहीं। उल्टे राज्य की सरकारों ने तो पहले ही समय बढ़ा दिया जबकि केन्द्र सरकार बाद में सामने आई। लेकिन जब खुद सरकार ने कहा कि शराब की दुकानें खोल देते हैं क्योंकि शराब के नशे के बिना देश का एक बड़ा वर्ग परेशान है। हालांकि वह बड़ा वर्ग परेशान हो या न हो सरकार की अर्थव्यवस्था जरूर चरमरा रही है। तब यदि तुलनात्मक बात करें तो देवदर्शन के कारण भी बड़ी आबादी खुद को सुरक्षित नहीं मान रही है। वह चाहती है कि यदि मदिरालय खुल सकते हैं तो देवालय खुलने में क्या परेशानी है? यदि अर्थव्यवस्था ही शराब की दुकान खोलने का आधार है तब अर्थव्यवस्था तो मजदूर की बिगड़ गई उसे घर में समेटने का क्या अर्थ है? आम व्यक्ति की बिगड़ गई जिसके पास घर बैठे घर चलाने के साधन खत्म हो गये। कर्ज की किस्त देने वालों के लिए भी है जिसको बिना कमाई के किस्त देना पड़ रही है। तब राजनीति की केवल मदिरालयों पर ही इतनी मेहरवानी क्यों है?

जब सरकारें दूरदर्शन पर धार्मिक धारावाहिक लाकर आस्थाओं पर मोहर लगाती है तब देवालयों की तुलना में मदिरालय को प्राथमिकता क्यों? सरकारें बदमिजाज हो रही हैं? वे व्यापारी हो रही हैं? सरकारें जनता को संभालते-संभालते खुद को संभाल रही हैं। गरीब को राहत देकर वापसी का रास्ता तलाश रही हैं। यह सच है कि मोदी के प्रयासों पर मरकज ने पानी फेरा यह विरोध था या आतंक की अगली कड़ी जांच के बाद पता चलेगा। लेकिन मदिरालयों पर मेहरवान तो सरकारों की अपनी अक्ल का प्रमाण है। पहले इतना डरा दिया जितने की जरूरत नहीं थी। अब डर खोलने के लिए देवालय खोलने की बजाये मदिरालय खोले जा रहे हैं। इसे ही कहते हैं अपने अच्छे किये का गुड़-गोबर करना।

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