‘राजनीति’ की खुद्दारी भी और कुर्सी की ‘भूख’ भी

भोपाल (सुरेश शर्मा)। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक गलियारों की सबसे विचित्र खबर बने हुए हैं। यह भी कहा जा सकता है कि इस जाट नेता ने किसान आन्दोलन और यूपी चुनाव को देखते हुए अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए शेर के मूंह में हाथ डाल दिया है। अभी शेर न तो हाथ को चबा रहा है और न ही छिटक रहा है। लेकिन इसे राजनीतिक खुद्दारी बताने वाले गवर्नर सत्यपाल मलिक अपने आप कुर्सी का मोह भी नहीं त्याग पा रहे हैं। शहीद होकर यूपी के चुनावों में किसमत आजमाने की मानसिकता को भाजपा नेतृत्व ने अंजाम तक न पहुंचाने की मंशा बना रखी है। सवाल यह है कि सत्यपाल मलिक राज्यपाल हैं, किसान नेता हैं या भाजपाई हैं तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं। जम्मू और कश्मीर में जिस प्रकार का काम उन्होंने किया और धारा 370 व 35-ए हटाने में भूमिका निभाई उसके कारण भाजपा उनका तिरस्कार नहीं करना चाहती है। इसीलिए वे न तो हटाये जा रहे हैं और न ही उनके बयानों पर कोई प्रतिक्रिया ही आ रही है। लेकिन इसी के साथ यह भी अपने आप सामने आ रहा है कि सत्यपाल मलिक कुर्र्सी प्रेमी हैं और अपने आप उसे छोडऩे की मंशा ही नहीं रखते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घंमडी कह कर उस राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन किया है जो कोई विरोधी तो कर सकता है दल वाला नहीं।

सत्यपाल मलिक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घमंडी कह कर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि मोदी किसानों के हितषी नहीं हैं। जबकि जितनी योजना मोदी ने किसानों के लिए शुरू की उतने से उन्हें किसान हितैषी मान लेने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। कृषि सुधार बिलों को लेकर आज की परिस्थितियों में भी मतभेद हैं। अनेक किसान नेता भी यह मानते हैं कि बिलों में ऐसा कुछ नहीं था कि जिनको लेकर इतना बड़ा आन्दोलन करने की जरूरत थी। संशोधन के माध्यम से उन्हें दुरस्त किया जा सकता था। लेकिन जिस प्रकार से किसान नेता बिना अक्ल का इस्तेमाल किए बयान दे रहे हैं मलिक भी ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीति में खीज निकालने का चलन नया नहीं है लेकिन पहले नैतिकता के आधार पर पद को छोडऩा चाहिए इसके बाद राजनीतिक खुद्दारी दिखाना चाहिए। सत्यपाल मलिक का बड़बोलापन कश्मीर के राज्यपाल के रूप में ही शुरू हो गया था। बाद में उनके इसी व्यवहार के कारण गोआ का राज्यपाल बनाया गया तब वे इसे दंड मान बैठे। इसके बाद उन्हें पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय का राज्यपाल बना दिया गया। इससे वे खीज रहे हैं।

मलिक ने यूपी चुनाव और अपने पुराने राजनीतिक संबंधों के कारण शेर के मूंह में हाथ तो डाल दिया लेकिन उन्हें हाथ निकालना नहीं आया। कहावत भी है बिच्छु का जहर उतारना नहीं जानते और सांप की बाबई में हाथ डाल रहे हैं। मलिक किसान नेता तब माने जाते जब किसानों को सरकार से अधिक से अधिक दिलवाने की कोई योजना सामने रखते। वे तो बिल वापस करवाने में लग गये। बिल वापस होने से तो किसानों के हाथ खाली ही रह गये। कोई गर्वनर साहब से पूछे कि एक साल के आन्दोलन के बाद किसानों को मिला क्या? आपने मोदी में घमंड देखने की बजाये किसानों को कुछ दिलवाया होता बेहतर होता?

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