‘राजनीति’ का खेला खेल दिल्ली चले गये ‘कमलनाथ’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। देश की राजनीति की नब्ज कांग्रेस के नेता जितनी जानते रहे हैं उतनी किसी अन्य दल के नेताओं के बस की बात नहीं थी। यही कारण है कि इंदिरा जी ने जनता पार्टी की सरकार के बाद अढ़ाई साल में वापस सरकार संभाली और अटल बिहारी वाजपेयी की उपलब्धियों के साथ चली पांच साल की सरकार के बाद सोनिया गांधी ने वापस कांग्रेस की सरकार बनवाई। नब्ज को पहचानने वाले नेताओं में वे पुराने दिग्गज हुआ करते थे जिनका अपना अनुभव और कार्यकर्ताओं की सूचना का समावेश होता था। वे मुद्दे ही ऐसे उठाते थे जिसका सीधा असर जनता के दिल पर होता था। अब न तो वैसा कांग्रेस का नेतृत्व रहा और न ही वैसे नेता ही बचे। राहुल गांधी की जिस प्रकार की समझ है कोई भी नेता अपनी समझ को उनसे ऊपर ले जाने का सहास ही नहीं दिखा पाता है। जब यह सवाल उठता है कि इतना लम्बा राजनीतिक अनुभव रखने वाले कमलनाथ की राजनीति करने का तौर-तरीका ऐसा क्यों हो गया? महामारी के काल में नकारात्मक राजनीति करता विपक्ष का बौना नेतृत्व तो समझ में आता है लेकिन पुराने और दिग्गज नेताओं की पत्थर मारो और भाग जाओ की राजनीति कुछ समझ में नहीं आ रही है। क्या नरेन्द्र मोदी हों या शिवराज जनमानस की सेवा और राहत की राजनीति का कोई तोड़ इन्हें नहीं मिल पा रहा है?

मध्यप्रदेश की राजनीति में दिल्ली की राजनीति करते-करते कमलनाथ आये तो उनका एक 'ओरा' था। उनको बेहतरीन रणनीतिकार और एक सफल केन्द्रीय मंत्री के रूप में देखा जा रहा था। छिन्दवाड़ा के अजेय योद्धा के साथ ही छिन्दवाड़ा माडल के जनक के रूप में उन्हें प्रस्तुत किया गया। किसान कर्ज माफी का छौंक लगाकर उन्होंने अपने पकवान को जायकेदार बनाकर प्रदेश की सरकार भी मामूली अन्तर से शिवराज से छीन भी ली थी। लेकिन जब सरकार को चलाने का तौर-तरीका और विषयों पर समझ देखी तो मध्यप्रदेश की राजनीति ने समझ लिया कि यह तो ऊंची दुकान फीका पकवान है। कर्ज माफी भी चरणों के कारण चरण में आ गिरी और बदले की भावना सवार होते ही सर चढ़कर बोलने लग गई। कमलनाथ को जैसा समझा था वैसे वे दिख नहीं पाये। अत: सरकार गिर गई। सरकार गिरने का सबक जरूर नेता को बदल देता है। लेकिन याद करना होगा कि 2003 में जाम सांवली हनुमान मंदिर में अंडा युक्त केक का बयान देकर जिस प्रकार की राजनीति दिखी थी आज जब महामारी में मरने वालों की राजनीति की जा रही है  दोनों एक जैसी ही है।

उमंग सिघार को गंदगी से निकालने की राजनीति के समानान्तर गंदगी को बड़ा दिखाने की राजनीति ने भी कमलनाथ को दिल्ली जाने पर मजबूर कर दिया। भ्रम पैदा करो और भाग जाओ की राजनीति कमलनाथ जैसे दिग्गज की ओर से हो रही है तब सरकार विचलित होगी या नहीं होगी यह दूसरा सवाल है लेकिन पहला सवाल तो यह है कि प्रदेश का क्या होगा? कोरोना में ठीक उसी प्रकार कंधा मिलाकर सरकार के साथ उन्हें खड़ा होना था जैसा गैसकांड के वक्त प्रथम सेवक अर्जुन सिंह के साथ द्वितीय सेवक सुन्दरलाल पटवा खड़े हो गये थे। लेकिन राजनीति ऐसी हुई कि उन्हें भोपाल छोड़कर कुछ दिन के लिए दिल्ली जाना पड गय़ा।

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