‘मोहरे’ बदलने से गेम जीतने की ‘योजना’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। रोजना कोरोना की समीक्षा और समीक्षा के बाद कसावट के प्रयास। लेकिन परिणाम अभी तक सामने नहीं आया है। जब से भोपाल को लॉक किया गया है उसके बाद भी कोरोना के मरीजों की संख्या में कमी नहीं आई है। बीते दिन तो राजधानी में दोगुणा मरीज आने से हडकंप मच गया। इन मरीजों की संख्या पर ध्यान नहीं जाये इसलिए सरकार ने स्वास्थ्य आयुक्त को बदल दिया है। कहा यह गया है कि  वे आकंलन करने में विफल रहे। तब क्या एसीएस स्वास्थ्य को इस मामले में सफल माना जाये? वे तो पत्रकारों को कह रहे हैं कि कोरोना की कोई दवा नहीं है। लेकिन डा. संजय गोयल को हटा दिया गया। किसी को हटाने और किसी को बैठाने में कोई अन्तर हम लेखकों को नहीं पड़ता लेकिन जो विभाग का मोह नहीं त्याग पा रहा हो उसके बारे में पूर्वानुमान लगाया ही जा सकता है। इंदौर के सफल कलेक्टर रहे आकाश त्रिपाठी को स्वास्थ्य आयुक्त की जिम्मेदारी दी गई है। सबकी अपेक्षा है कि पंडित जी के आने से विभाग की गतिविधियों में सकारात्मकता आये और मरीजों की संख्या में कमी आये। लेकिन इतना तो कहना ही होगा कि जब सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो पुराने महकमों में रूचि का क्या मतलब? सरकार कृपावंत है तो बाद में भी नम्बर आ जायेगा?

हुजुर विधायक रामेश्वर शर्मा ने टवीट किया है कि सात के लिए सब लोग अज्ञातवास में चले जायें। जरूरी हो तभी बाजार जायें। किसी से मिलें नहीं। तब कोरोना की चैन टूट जायेगी? दूसरी तरफ दूसरे भोपाल के विधायक पीसी शर्मा पर मुकदमा दर्ज हो गया। उन्होंने डाक्टर को धमकाया था। यह अन्तर समझने की जरूरत है। लेकिन सरकार की करनी और कथनी को भी समझना होगा। सरकार प्रदेश को लॉक कर रही है लेकिन कह रही है कि यह लॉक नहीं है। आदेश और मीडिया के बीच की भाषा में अन्तर साफ दिखाई दे रहा है। चलों मान लेते हैं तब स्वास्थ्य सेवाओं की इतनी ढ़ील की क्या जरूरत थी। आम गरीब के पास इतना धन नहीं बचा है कि सरकार की सहायता के बिना वह जिंदा रह पायेगा। संवेदनशीलता की उम्मीद तो रहेगी ही। अधिकारी गुमराह कर रहे हैं। शिवराज की सदाशयता को धन्यवाद देना होगा कि उन्होंने मंत्रियों को काम का मौका दे दिया। अब जिलों के कोरोना प्रभारी मंत्री अपना प्रफारमेंस दिखायेंगे। वे अपने मंत्री होने की क्षमता का प्रमाण देंगे। विभाग तो चल जाता है साहब समस्या का समाधान कर देंगे तब क्षमता समझ में आयेगी।

 कुछ मंत्रियों की बयानवीरता का कोई सानी नहीं है। वे मीडिया में बने रहने के लिए इस कदर लालाहित रहते हैं लेकिन अब तो सच की अग्रि परीक्षा में शिवराज ने उन्हें डाल दिया है। मीडिया में बयान देना एक बात है और सरकार की उपलब्धि बनाकर प्रफारमेंस देना दूसरी बात है। सारे मंत्री कसौटी पर हैं। एक अधिकारी पूर्व आकंलन करने में निकम्मा निकला तो उसकी स्थान लेने वाला पुराने विभाग छोडऩे को राजी नहीं है। आखिर यह सब है क्या? सेवा और सर्विस का अन्तर नहीं समझ पाने से प्रदेश की जनता भयावह स्थिति में आ खड़ी हुई है। जनता को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता है फिर भी बहुत कुछ संभालने की जरूरत है।

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