मोदी सरकार : सफलताओं का ग्राफ बड़ा है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 7 साल में दी देश को सही दिशा
सुरेश शर्मा।
जब भी किसी सरकार के कार्यकाल की सफलता और असफलता का मूल्यांकन करते हैं तब कौन सा पैमाना सामने रखना चाहिए? अभी तक मूल्यांकन का कोई तय मापदंड नहीं बना है। यह समीक्षक को याद आये कामों के अनुसार ही तय होता रहा है। 2014 में देश की कमान संभालने के बाद नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनके काम का मूल्यांकन वर्ष भर में या पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद नहीं बल्कि हर रोज या फिर यूं भी कह सकते हैं कि हर निर्णय पर होता रहा है। राफेल विमान खरीदी मामला को तो खरीदी से पहले ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देखा गया कि उसकी खरीद प्रक्रिया और मूल्य का निर्धारण सही है या नहीं। जो सही पाया गया। यह अभी तक की आजाद भारत की पहली और अनोखी घटना रही है। रोजाना के निर्णयों का मीडिया ट्रायल और व्यक्तिगत नापंसदी की प्रयोगशाला से तो निर्णय होता ही रहा है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी के सात साल के कार्यकाल में सफलताओं का ग्राफ किसी भी अन्य सरकार की तुलना में सर्वाधक ऊपर रहा है। जिन्हें असफलताएं बताई जा सकती हैं उनमें भी मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को मायनस मार्किंग नहीं दी जा सकती है। यह विचार बदलाव का दौर भी रहा है और जिसकी सत्ता या प्रधानता जाती है उससे सकारात्मकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

सबसे पहली बात यहीं से। देश के मीडिया पर स्थापित पत्रकार या तो वाम विचार के रहे हैं या इस विचार के बाद कांग्रेस द्वारा पोषित। इन सभी को युग समाप्त होने के करीब आ गया है। इसलिए उनके आलेख हों या समीक्षात्मक टिप्पणियां हार की हताशा से ग्रस्त होकर मोदी विरोधी ही होती हैं। प्रमाण के लिए कश्मीर से पंडितों को जिस अवस्था में निकाला गया था उसकी चर्चा मोदी सरकार के आने के बाद से होने लगी जबकि ये स्वनामध्न्य पत्रकार अखलाक की भांति उसकी भी समीक्षा कर सकते थे। लेकिन इनके विचार और निष्ठा ने इसकी इजाजत नहीं दी। इसलिए किसी भी विषय को समझने से पहले यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि विचार निष्ठ पत्रकारिता इससे पहले भी होती रही थी लेकिन हमें उसको देखने और पढऩे की आदत हो चुकी थी। यह आदत बदलने का दौर है इसलिए कई बार हम मुखर हो जाते हैं। इसी कारण किसी की असफलता को किसी के खाते में दिखाने का प्रयास हो जाता है। मसलन, कोरोना के पहले दौर में मोदी सरकार ने सब अपने हाथों में लेकर व्यवस्थाओं को संभाला पूरे विश्व में तारीफ हुई। हम अधिक सुरक्षित भी रहे। तब राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने कहा था कि काम राज्य की सरकारों ने किया श्रेय मोदी ले गये। लॉक और अनलॉक करने का काम राज्यों को करना चाहिए। स्वास्थ्य राज्यों का विषय है केन्द्र को तो केवल मानिटरिंग करना चाहिए। जब कोरोना के दूसरे दौर में ऐसा किया गया तो विफलता राज्यों के गले डालने की बजाये 'उननेÓ मोदी के सर ठिकरा फोडऩे का प्रयास किया गया। लेकिन देश विदेश से आक्सीजन लाने की बात हो फिर मेडीकल व्यवस्थाओं का विषय हो सभी ने मिलकर संभाला ही। यह सच है कि इस दौर में मौतों का आंकड़ा घबराहट भरा रहा है।

आज हम यह कह सकते हैं कि किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। उसके व्यापार से होती है और उसकी नागरिक सुविधाओं से होती है। इसी से संप्रभुता का आंकलन भी किया जा सकता है। भारत के लिए चीन और पाकिस्तान हमेशा सरदर्द रहे हैं। पाक के साथ हर घटना का डोजियर सौंपने की परम्परा रही है। पाठनकोट मामले तक डोजियर देने और पाक द्वारा उसका परीक्षण करने की घटना हुई। उसी परम्परा के कारण पाठनकोट में पाक की एजेंसी के घुसने की घटना हुई। इसके बाद भारत ने सर्जिकल और एयर स्ट्राइक करके जवाब दिया डोजियर नहीं सौंपा। यह संप्रभुता की शक्ति का अहसास देश ने किया। चीन के सामने भारत के नीति निर्धारकों की कभी खड़े होने की हिम्मत नहीं हुई इससे सेना को हमेशा नीचा देखने की स्थिति बनती रही। मोदी काल में राजनीतिक निर्णय के कारण सेना को अपना दम दिखाने की स्थिति बनी तो हम विश्व के सामने एक बार फिर से शक्तिसंपन्न गणराज्य के रूप में दिखाई दिये।

बाह्य शक्ति का प्रदर्शन करने के बाद आतंकवाद और कश्मीर जैसी समस्याओं के निदान के लिए मोदी सरकार ने नीतिगत निर्णय निर्णय लिये। अगल धु्रव और धारा की नेता मेहबूबा के साथ जम्मू और कश्मीर की सरकार चलाकर उन सभी आदेशों का समाप्त करवाया जिसके कारण सेना वहां कार्यवाही नहीं कर सकती थी। और जब धारा 370 को समाप्त करने के लिए सरकार ने विधानसभा से प्रस्ताव न करने की बात की तो समर्थन वापस ले लिया गया और संसद को यह सूचना दे दी गई कि जिस तरीके से राष्ट्रपति ने धारा 370 को अस्थाई रूप से लगाया था उसी प्रकार से उसे वापस भी ले लिया है। यह देश की सबसे बड़ी समस्या और विवाद था जिसमें पाकिस्तान खुद को भागीदार मानता था। यह विवाद बिना किसी विवाद के शान्त हो गया। विदेशी घुसपैठ भारत की दूसरी बड़ी समस्या है। वोटबैंक की राजनीति के कारण उसका समाधान निकालने की कोई जरूरत ही कभी महसूस नहीं की गई। मोदी सरकार ने उसका समाधान निकालकर देश को बड़ी समस्याओं से मुक्त कर दिया। श्रीराम मंदिर निर्माण का आन्दोलन शतकों पुराना था। देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने ऐसा वातावरण बनाया गया कि पहले से दिये गये प्रस्ताव को दोनों समुदायों ने स्वीकार कर लिया और देश में समाजिक टकराव के इस मामले का भी अन्त हो गया। अन्य विवाद भी मोदी काल के सात साल में निपटाये गये। यही से शुरू होती है विकास की गाथा।

मनमोहन सिंह ने देश में जिन आर्थिक सुधारों को शुरू किया था उन्हें मोदी सरकार ने भी आगे बढ़ाया। जीएसटी कानून की बाधाओं को दूर किया। नोटबंदी से कालाधन निवारण का प्रोग्राम चलाया गया। राजीव गांधी की एक रुपये के बदले पन्द्रह पैसे हितग्राही तक पहुंचने की चिन्ता का निवारण सीणे बैंक खातों में राशि डालकर किया गया। आर्थिक सुधार के कार्यक्रमों को और विस्तार देकर कृषि सुधार तक ले जाया गया। आज किसान उसका लाभ ले रहा है। करअपवंचन से लगाकर देश के प्रति समर्पण भाव से टेक्स देने की मानसिकता का जन्म हुआ। जिस देश की अपनी सांस्कृतिक विरासत विश्व की अनमोल हो और उसे सत्ता संचालकों ने लगभग विस्मृत कर दिया था उसे मोदी काल में फिर से जीवित किया गया। गंगा आरती में विदेशी मेहमान को घंटों शामिल होने का प्रसंग हो या विदेश की इस्लामिक मान्यता वाली धरती है मंदिर के लिए जमीन की घोषणा की बात हो सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इस प्रकार के अनेकों विषय मोदी सरकार की देन हैं। यह कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जिन विषयों का निर्धारण करके सरकार को चलना था वह 2014 से चलना शुरू हुई है। जो विरोध का शोर दिख रहा है वह विचार और प्रधानी जाने का है जिसका कोई मतलब नहीं है।

किसान आन्दोलन और कोरोना की महामारी में मौत का तांडव दो विषय ऐसे हैं जिन्होंने मोदी काल में काला टीका लगाने का प्रयास किया है। किसान आन्दोलन में नेताओं को क्या करना है यह पता नहीं है इसलिए चलता ही जा रहा है। कोरोना में व्यवस्थाओं को जुटाने और उसके बंटवारे की राजनीति ने मौतों को अधिक होने की समस्या को बढ़ाया। नकारात्मक राजनीति के कारण देश को इन समस्याओं से रूबरू होना पड़ा है। लेकिन आरोपों और मीडिया धुन को बजते देखने के बाद भी व्यवस्थाओं के लिए एकाग्र प्रयास मोदी के खाते में आती खामियों को कम दिखाने के लिए रास्ता देते हैं। इसके बाद भी यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि नरेन्द्र मोदी सरकार के सात साल में विफलताओं के आगे सफलताओं का ग्राफ इतना बड़ा है जो आने वाले समय में जनमानस को फिर से पुराने दिनों में लौटने के लिए प्रेरित करेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमिशाल काम करके यह बता दिया सत्ता घरानों की बंधक नहीं होती है।                                 संवाद इंडिया

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