मोदी के पांच साल के कार्यकाल का रोज हुआ आडिट, टाइम की बेटाइम बातों की टाइमिंग

भारत में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं। जब पांच चरण पूरे हो गये तब टाइम मेग्जिन ने अपने कवर पेज पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर आलेख प्रकाशित किया। इसमें उन्हें विभाजन करके राज करने वाले नेताओं में शुमार करने का प्रयास किया। वास्तव में यह विदेशी अर्थव्यवस्था के संरक्षक तत्वों की हरकतें हैं जिन्होंने भारत को भारतीय हिसाब से चलाने की प्रक्रिया हजम नहीं हो रही। कोई भी चुनाव वोट से जीते जाते हैं इसलिए अपना वोट बैंक तैयार करने को विभाजन मानना इसलिए अनुचित है। सरकार के संचालन में भेदभाव परिलक्षित नहीं होना बताता है कि सबका साथ सबका विकास का मंत्र महज नारा नहीं अपितु व्यवहार में लाया गया वाक्य है। 130 करोड़ का देश चंद घटनाओं से अनुशरण करने लग जायेगा यह उदाहरण सही नहीं है और उस समय तो वह और गंभीर विरोध का आधार बन जाता है जब उसी प्रकार की अन्य घटनाओं की अनदेखी करके उदाहरण दिया जाता है। मोदी सरकार का पांच साल में प्रतिदिन मीडिया आडिट हुआ है जो इससे पहले किसी भी सरकार का नहीं हुआ। तब अर्थव्यवस्था का बात हो तब भी, आन्तरिक सुरक्षा की बात हो तब भी, विदेशों में भारत को शक्तिसंपन्न राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने की बात तब भी, विदेश नीति की बात हो तब भी, भारतीय संस्कृति को समावेशी तरीके से लागू करने की बात हो तब भी, ईमानदार व्यापार की दिशा में देश को लेकर चलने की बात हो तब भी मोदी सरकार के काम में नम्बर काटने की स्थिति नहीं बनती।
टाइम मेग्जिन ने पांच चरण के चुनाव के बाद अपना आलेख प्रकाशित किया है। इस बेटाइम बात की टाइमिंग पर सवाल उठाने की जरूरत है। जब यह अवधारणा बन रही है कि मोदी सरकार की वापसी हो रही है तब विदेशों की मानसिकता को प्रधानता देने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं की कवर पेज स्टोरी मोदी को बनाने की मंशा को समझा जा सकता है। मॉब लांचिंग की बात का तर्क सही है उसके बारे में बात तो होगी ही। लेकिन सरकार ने उसे कितना गंभीरता से लिया है और किस प्रकार से उसे पेश किया गया है इसका साथ लेकर बात करने की जरूरत है। क्या अखलाक की घटना की आलोचना और निंदा करते वक्त दिल्ली के डाक्टर की मौत का उल्लेख नहीं होगा? इसका मतलब यह है कि सुविधा के अनुसार विषयों को उठाया जाता है और उन्हें तूल दिया जाता है। दलितों के साथ अन्याय को स्वीकार करना संभव नहीं है लेकिन जब दलित आन्दोलन में लोग मरते हैं जब उन्हें प्रतिक्रिया मानकर टालना सही नहीं होगा।
विभाजन करने वाला शासक मानकर आलोचना करने वाले आधे तर्क के साथ अपना आलेख लिखते हैं। चुनाव का वोट के साथ सीधा संबंध है। देश के मतदाताओं के विभाजन को पहले समझना होगा। मुस्लिम मतदाताओं पर कांग्रेस का एक समय में एकाधिकार होता था। दलित वोट भी उसे मिलते थे। उनकी सरकार को उखाडऩे का कोई ख्वाब भी नहीं देख पाता था। इन दोनों ही समुदायों के विकास का ग्राफ कांग्रेस की सरकारें को समय का देखें तो पता चलता है कि वे विकास के रास्ते पर चल ही नहीं पाये। केवल वोट की फसल उगलने वाले ही बने रहे। लेकिन कांशीराम और मायावती ने दलितों को अलग इकाई बनाने का प्रयास किया। उन्हें विकास के सपने दिखाये गये। इस वोट बैंक ने अपना पाला बदल लिया। मायावती ताकतवर हो गई और कांग्रेस सत्ता से बाहर चली गई। गठबंधन सरकारों का दौर आ गया। मुस्लिम वोटों पर मायावती और मुलायत सिंह यादव ने सेंधमारी करके कांग्रेस को सत्ता से कई राज्यों में बाहर कर दिया। लालू यादव का माई फार्मूला आज तक खबरों की सुर्खियां तो बनता है लेकिन कोई यह सहास नहीं करता कि ऐसे गठजोड़ देश के हित में नहीं हैं। जिन भी नेताओं में इस प्रकार के गठजोड़ को तोड़कर अपना समीकरण बनाने की ताकत आई वे सरकारों में आते चले गये। मतलब वोट ही सरकार बनवाते हैं। अटल जी की एक वोट से सरकार गिरना नैतिकता नहीं वोट ताकत का प्रमाण थी। इसलिए कोई भी राजनीतिक दल अपनी सरकार बनाने के लिए अपने वोट बैंक का सजृन करता ही है। यह विभाजन है तब यह विभाजन पहले भी किया जाता रहा है और मोदी आलोचना के पात्र हैं तब के उन विभाजनकारियों की आलोचना भी होना चाहिए।
भाजपा केन्द्र सरकार की सत्ता पर काबिज है। देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं। उनके मित्र दलों की सरकारों के बाद उसका अधिकांश भू-भाग पर कब्जा है। ऐसे में यदि इस दल के नेता को विभाजन की राजनीति करने वाला कहा जाता है तब यह तर्क बेमानी हो जाता है। यह पूर्वाग्रह से लिखा हुआ आलेख हो जाता है। वास्तव में जातियों में बंटी भारतीय राजनीति को एक समग्र समाज में एकत्र करके अपना वोट आधार बढ़ाने की राजनीति को विभाजन की बात कैसे कही जा सकती है? देश की धार्मिक राजनीति को गौर से देखने की जरूरत है। अभी मतदाता अधिक मुखर है। देश के किसी भी कोने में जाइये मुस्लिम मतदाता मोदी के काम की तारीफ भी करे लेकिन वोट देने का आश्वासन नहीं देता। वह मोदी के विरोध में वोट देने की बात कहता हुआ दिखाई दता है। मुस्लिम वर्ग के बुद्धिजीवी भी इसी प्रकार की बात करते हैं। क्या वे एक कदम साथ चलने की बात नहीं कर सकते जैसा हिन्दू समुदाय आज भी करता है? जिन राजनीतिक पार्टियों में खुला मुस्लिम वोटों को पाने का अव्हान होता है वहां पर हिन्दू मतदाता भी बड़ी संख्या में वोट देता है। तब विभाजन की बात खुद ही खारिज हो जाती है। यह ऐसा षडयंत्र है जिसमें आड़ तो हमारी बातों की ली जाती है और मिशन मिशनरियों का पूरा किया जाता है।
जहां तक भारत की अर्थव्यवस्था की बात है, उसकी वैश्विक रेंकिग में सुधार बताता है कि जब से मोदी सरकार आई है उसने भारत के अनुसार अर्थव्यवस्था का निर्धारण किया है। कर अपवंचन की संस्कृति को समाप्त करने के लिए जीएसटी को सहारा बनाया गया और करेंसी असंतुलन का समाप्त करके कालेधन पर प्रहार करने की मंशा से नोटबंदी की गई। बैंकों के खाते खोल कर बीच में चुंगी मारने की मानसिकता पर प्रहार किया तो रोजगार सजृन करने के लिए भारत में निर्माण की बात करके और कौशल उन्नयन की बात करके लोगों को तैयार किया गया। इससे उन लोगों के पेट में दर्द हो रहा है जिनकी नाजायज कमाई पर हमला हुआ है। कई बार तो लगता है कि मोदी पर हमला करने वाले वे अधिक हैं जिनकी नाजाइज कमाई छीन ली गई और मोदी का समर्थन करने वाले वे लोग जो मेहनत और ईमानदार से कमाकर खाना चाहते हैं। देश को मुफ्तखोरी की गर्त से निकाल कर आत्म सम्मान की ओर ले जाने की नीतियों की आलोचना स्वभाविक है। जब भारत की जनसंख्या को बाजार समझने वाले अपनी बिक्री की ताकत को खरीदी करने की क्षमता की ताकत से प्रभावित होते देखते हैं तब उनकी प्रतिक्रिया टाइम की प्रतिक्रिया बनती है। जब भारत के उत्पादन की क्षमता बढऩे के कारण निर्यात करने वाले देशों को होने वाली हानि से उपजी पीड़ा टाइम के माध्यम से निकली चीख से समझ में आती है। जब भारतीय संस्कृति की गौरव गाथाओं पर गर्व होने के समाचार धर्मान्तरण करने वाली शक्तियों को पता चलता हैं तब दर्द टाइम के माध्यम से पता चलता है। जब चुनाव में यह संदेश मिलता है कि पांच चरण में मोदी की सरकार फिर से बन रही है  यह ध्वनि विरोध के रूप में सामने आती है। जब आतंकवाद की मार खाकर मन मसोसने वाला भारत बदले की कार्यवाही करता है तब भारत का गर्व से माथा ऊंचा होता है लेकिन जिन्हें परेशानी होती है उनकी आवाज टाइम के माध्यम से सुनाई देती है। जरूरत यह है कि सबका साथ सबका विकास पर कोई आडिट विवाद खड़ा नहीं कर पाया तो सबको एक साथ आने की दिशा में विचार करना चाहिए।                  संवाद इंडिया

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