‘भाषा’ पत्रकार का अलंकार भी है ‘हथियार’ भी है


सुरेश शर्मा

भोपाल।
लम्बे समय के बाद किसी प्रतिष्ठित पत्रकार पर इतनी एफआईआर हुई हैं। लम्बे समय के बाद उसकी गिरफ्तारी को लेकर इतना हल्ला भी हो रहा है। पत्रकार बिरादरी भी उहापोह की स्थिति में है कि वह अर्नब गोस्वामी के साथ खड़ी हो भी या नहीं। इसके बाद भी कई प्रमुख पत्रकार संगठनों ने साथ आने का निर्णय लिया है। कुछ व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण देर से आ सकते हैं लेकिन उन्हें आना ही होगा। कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनको आलोचना करने में ही मजा आता है उनका कहा नहीं जा सकता है। इस प्रकार के पत्रकार यह मानते हैं कि अर्नब की भाषा पत्रकार की भाषा नहीं है। लेकिन ऐसा पहला उदाहरण नहीं है जब पत्रकार को अपनी भाषा को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना पड़ा हो। केन्द्रीय राजधानी दिल्ली के पत्रकार बताते हैं कि इस प्रकार का द्वंद्व पहले भी चलता रहा है कि पत्रकार अपनी भाषा को अलंकार के रूप में ही इस्तेमाल करता रहे या कभी कभार उसे हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करे। यह हमारी अपनी विचारधारा के हिसाब से समझने और उत्तर निकालने को विवश करती है। यही बात यदि अर्नब ने कही है तब वह आलोचना का केन्द्र है लेकिन यही बात और भाषा रवीश बोलते हैं तब वह प्यारी भी लगती है और उससे पुरूस्कार का प्रयास भी किया जाता है। इसलिए किसी भी भाषा को सही या गलत सिद्ध करने की हमारी अपनी मानसिकता होती है।

पत्रकार को लेकर मेरी मान्यता यह रही है कि वह आइना भर क्यों बन रहा है? उसकी समीक्षा करने की क्षमता को दबाकर क्यों रखना चाहिए? सोशल मीडिया के नासमझ दौर में पत्रकारिता को अपनी स्वर और स्वाद बदलने की जरूरत है या नहीं इस पर मंथन करने की जरूरत है। लेकिन यदि पत्रकार को जब नेताओं की भाषा और असंयमित व्यवहार को दिखाना और प्रकाशित करना पड़ेगा तो आप भाषा की गारंटी केवल पत्रकार से ही क्यों चाहते हैं? जब उसे यदि दिखाना पड़ेगा कि चौकीदार चोर है और अखबारों में बड़े-बड़े शब्दों में यह लिखना होगा कि पैसा लेकर भागे मोदी सब भाई-भाई हैं तब आप कितने दिन तक पत्रकार से अलंकार को पिरोने की उम्मीद रखेंगे? इस सवाल को भी खारिज करना होगा कि पत्रकार की कोई दलीय प्रतिबंद्धता नहीं होती? यह सच है कि वह सभी के बयानों को उसी भावना से दिखाता है जिस भावना से वे जारी किये गये हैं लेकिन उसे दिखाते या छापते वक्त उसे यह भान होता है कि वे सही नहीं हैं। अब पत्रकार ने जो सही नहीं है उसे रिजेक्ट करना बंद कर दिया है। यहीं से गलत हो गया है।

क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने केवल विशेष स्थानों और वर्गों तक ही रह जायेंगे? ऐसा होगा तो भारत का लोकतंत्र डोल जायेगा? लोकतंत्र में सोनिया को भी वही स्थान मिलना चाहिए जो मोदी को है। लेकिन जो व्यवहार मोदी सहन कर जाते हैं उसे सोनिया को भी सहन करना चाहिए? पत्रकार को गटागट की गोली नहीं समझना चाहिए। वह बाकी के तीन स्तंभों के रहम पर नहीं बल्कि जनता के विश्वास पर चौथे स्तंभ की मान्यता पाकर खड़ा है। इसलिए यदि देश की जनता का बड़ा भाग रवीश की भाषा और प्रमाणों को मानता है तब बड़ा वर्ग अर्नब को भी स्वीकार करता है। इसलिए अच्छा यह ही होगा कि पत्रकारिता और राजनीति में वर्ग संघर्ष को टाला ही जाना चाहिए।

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