‘भाषाई’ गिरावट क्या बिगड़ रहा है कांग्रेस का ‘डीएनए’?

भोपाल। आम चुनाव में जिस भाषाई गिरावट की बात करते हुये हम मीडिया के लोग सभी दलों को सीख दे रहे थे वह बीमारी अब लोकसभा के अन्दर तक पहुंच गई है। सबसे बड़े विरोधी दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर जिस शब्द का इस्तेमाल किया वह दुखद और अशोभनीय है। हालांकि उसे सदन की कार्यवाही से निकाल दिया गया और चौधरी ने उसके लिए खेद प्रकट कर दिया है लेकिन कार्यवाही के अलावा सभी जगह उस शब्द का इस्तेमाल हो रहा हे। वह आम जनता के जहन में आ गया है। तब यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है या फिर गांधी परिवार के प्रति अगाध भक्ति का परिचायक है। इंदिरा गांधी गंगा और वह भी मां गंगा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गंदी नाली। यह बताता है कि कांग्रेस का डीएनए ही बिगड़ रहा है। नेताओं में भाषायी संयम नहीं रहा है। वे अपनी बात को महत्वपूर्ण और प्रभावशाली शब्दों में नहीं पिरो पा रहे हैं। इसलिए चर्चाओं में आने के लिए निचले स्तर की भाषा का इस्तेमाल करके सुर्खियां बन रहे हैं। अधीर रंजन ने भी अपने आप को शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं की श्रेणी में खड़ा कर लिया है। यदि लोकतंत्र के निर्णय को स्वीकार करने की बजाये खीज की मानसिकता से कांग्रेस इसी प्रकार के शब्दों पर चलती रही तो यह उसके लिए सही मार्ग तो कम से कम नहीं कहा जा सकेगा?
लोकसभा चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक सभा में उन पर हुये निचले स्तर के शब्दिक हमलों की जानकारी दी थी। कौन नेता ने क्या कहा इसकी जानकारी देकर देश को बताने का प्रयास किया था कि कांग्रेस में भाषाई दिवालियापन आ गया है। इसके बाद जब लोकसभा के परिणाम आ गये और मोदी सरकार फिर से बन गई तब उन्होंने कहा कि चुनाव में बोले गये शब्द पुरानी बात हो गई देश को आगे ले जाने के लिए सभी का साथ सभी विश्वास आधार रहेगा। यह माना भी जा रहा था कि यह लोकतंत्र के लिए सही मार्ग है। लेकिन जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का समय आया तो कांग्रेस ने फिर से संयम खो दिया। इंदिरा गांधी को मां गंगा और नरेन्द्र मोदी को गदी नाली बता कर अपने विचार को उसी स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया जैसा चुनाव के समय था और चुनाव के परिणाम उसकी परिणीति रहे। अब लोकसभा में ऐसी भाषा का इस्तेमाल इजाजत नहीं है। चौधरी जनप्रतिनिधियों की इस सभा में अपने लज्जित सा महसूस किया। खुद को मणिशंकर के बराबर देखकर लगा कि उनका राजनीतिक कैरियर भी ढ़लान की ओर चला जायेगा। इसलिए उन्होंने माफी तो मांग ली। लेकिन वह नजीर लोकसभा के इतिहास में दर्ज हो गई जो किसी नेता पर वैचारिक कलंक होती है।
यह विषय दलीय नहीं है। कई बार लगता है कि कोई दल अपने नेता की इस प्रकार की भाषा का समर्थन कर सकता है? लगता नहीं। तब क्या कांग्रेस का डीएनए बदल रहा है। या उसमें ऐसे नेताओं का जमावड़ा होता जा रहा है जिनमें जनता को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। जो अपनी बात भी सही शब्दों में नहीं कह सकते हैं? जब पार्टी का प्रमुख चेहरा और भविष्य राहुल गांधी की चुनावी कैम्पेन चौकीदार चोर के नारे पर चलती रही तब किसी और को क्या दोष दिया जायेगा। यह डीएनए में बदलाव कांग्रेस का स्वरूप बदल देगा और यही मोदी की पिच पर खेलने के बराबर होगा जो कांग्रेस खेल रही है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button