भारत के साथ भारत वर्ष का कदमताल

(सुरेश शर्मा) हिन्दी में मेडीकल की पढ़ाई केवल शिक्षण भर नहीं है…. ।  कई बार इस प्रकार की बातें कहीं जा चुकी हैं यदि पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल के समय ही भारत का भारत वर्ष के साथस कदमताल करा दिया जाता तो आज हम विश्व की महाशक्ति होते। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नेहरू जी के कार्यकाल मेंं जिस भारत के निर्माण की नींव रखी थी वह भी कोई कमजोर नहीं थी। उसी बुनियाद पर आज हम तेजी से कदम उठा रहे हैं। लेकिन यदि उसमें मूल भारत का साथ ले लिया जाता तो हम आज विश्व के ताकतवर देश होते। जब जागो तभी सवेरा होने की धारणा हमारे यहां हैं। आज नरेन्द्र मोदी की सरकार के समय और भाजपा के शासनकाल में देश भर में भारत की प्रगति का सोपान कम नहीं हुआ बल्कि उसमें भारतीय सांस्कृतिक विरासत का समावेश हो गया है। इससे उसकी महक और अधिक बढ़ गई है। मोदी सरकार के आठ साल के कार्यकाल में जिस दिशा में भारत ने कदम बढ़ाये हैं वे न तो पंडित नेहरू के भारत निर्माण के तौर तरीको रोकते हैं और न ही श्रीमती इंदिरा गांधी के सशक्त भारत के निर्माण की अवधारणा को कमजोर कर रहे होते हैं। सडक़ों के निर्माण और आयुद्ध सामग्री के निर्यात की स्थिति के लिए दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों की अवधारणा को आगे बढ़ाते हैं। यहां नरेन्द्र मोदी भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की राष्ट्रवाद की अवधारणा को भी तेजी से न केवल आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि उसे अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ा रहे हैं जहां पर अटल जी पहुंचना नहीं खहते थे। इसलिए जब नई शिक्षा नीति सामने लाई गई और प्रमुख विषयों के पाठ्यक्रम हिंदी में तैयार करने की योजना बनी तब यह लगा कि भारत अपने भारत वर्ष के गौरव की ओर कदम बढ़ाने का साहस दिखा रहा है। आज जब शिवराज सिंह चौहान ने अपने राज्य मध्यप्रदेश में मेडीकल की शिक्षा का पाठ्यक्रम हिन्दी में उपलब्ध करा दिया है तब देश का गौरव हिलौरे मारने लगा है।

बात को केवल यहीं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता है कि मेडीकल की शिक्षा अब हिंदी में भी की जा सकती है। वस्तुत: हिंदी में शिक्षा का मतलब यह है कि हम समझने की सरलता के साथ मानसिकता में भी बदलाव लाने का प्रयास शुरू कर चुके हैं। हम भूल चुके हैं कि इससे पहले भारत में नालंदा और तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण करने वाले को वैश्विक सम्मान मिलता था लेकिन आज हम कैम्बरीज और ऑक्सफोर्ड से शिक्षा ग्रहण करने वाले को अतिरिक्त सम्मान देने का प्रयास करते हैं। हमारे देश के नेतापुत्र तो विदेशों से शिक्षा ग्रहण करने का प्रमाण-पत्र लेकर ही अपने सहपाठियों पर रोब झाडऩे का काम कर लेते हैं। यह गिरावट क्यों आई? इसका निराकरण करने की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाये गये? देश को सशक्त औद्योगिक विरासत देने वाले पंडित नेहरू ने देश की शिक्षा व्यवस्था को उसी अनुरूप ताकतवर क्यों नहीं किया और शिक्षा प्रणाली को मैकाले की कृपा के लिए क्यों छोड़ दिया? यह सुविचारित था या नहीं इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है लेकिन आशंकाए जरूर पनपने का आधार बनती हैं। और जब देश को दशकों पर दिशा देने वाले परिवार की सरकार देश की परासंपत्ति पर उनका अधिकार दिखाने का प्रयास करती है जिन्होंने कई बार देश से अपना हिस्सा ले लिया है तब आशंका करने का आधार बन जाता है। देश में शिक्षा प्रणाली पर हमेशा से द्वंद्व रहा है। कान्वेंट शिक्षा के लिए कालोनियों में स्थान उपलब्ध कराये गये जबकि सरस्वती शिशु मंदिरों की शिक्षा के तौर तरीकों की आलोचना की गई। आखिर ऐसा क्यों हुआ? यही कारण था कि हम अपने तक्षशिला और नालंदा के शिक्षा गौरव पर बात नहीं कर पाये।

जब देश के गृहमंत्री अमित शाह मध्यप्रदेश के लालपरेड मैदान में मेडीकल की हिन्दी माध्यम की किताबों की विमोचन कर रहे थे तब यह समझ में आ रहा था कि यह हिन्दीं में पढ़ाई का रास्ता नहीं है बल्कि हमारे देश का गौरव लौटाने का प्रयास शुरू हो गया है। इससे अधिक खास बात यह है कि यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में चल रही सरकार के माध्यम से हुआ है जिसने इस प्रकार के काम करने मेंं हमेशा सबसे पहले रूचि दिखाई है। हिन्दी विश्व विद्यालय स्थापित करने में प्रदेश पहला रहा तो सांची में निर्मित विश्वविद्यालय की नींव से हिन्दी विस्तार का व्यापक मार्ग प्रशस्त हुआ। जब हिंदी में अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण यूएनओ में हुआ था और विश्व के सभी पटलों पर नरेन्द्र मोदी का हिंदी में भाषण गूंजता है तब भारत वर्ष का कण-कण सलामी देने के लिए खड़ा हो जाता है। हमें दिखाई इसलिए नहीं देता क्योंकि हमें यह सब देखना नहीं आता। हमारे देखने का एक नजरिया है। इस नजरिये में बदलाव आता दिखाई दे रहा है और आने वाले वर्षों में इसका प्रयोग होगा।

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले से बोल रहे थे अब हमें गुलामी के प्रतीकों को समाप्त करने की दिशा में बढ़ेंगे और हमारी आने वाले पीढिय़ों को आजादी की गौरव गाथा सुनाई जायेगी तब यह कल्पना तो थी कि हम किस दिशा में बढ़ सकते हैं। हमने बंटवारे से उन सबकी हिस्सेदारी चुका दी है जो कभी कभार दावा करते प्रतीत होते हैं। इसलिए हमें बेपरवाह होकर अपनी रफ्तार को बढ़ाने की जरूरत है। चाहे विषय राम मंदिर के निर्माण से आक्रांताओं की निर्मम दास्तां से आगे निकलने का प्रयास शुरू हुआ हो। या फिर आतंक के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राइक करके आत्मविश्वास से भरे भारत के दर्शन कराने की बात हो। चाहे संसद के फिर से निर्माण के साथ गुलामी के प्रतीकों का बेल उतार फैंकने का प्रयास हो। भ्रष्टाचार के विरूद्ध महायुद्ध की बात हो फिर शिक्षा नीति में नयापन लाकर संस्कारों की पुनस्र्थापना की बात हो। मोदी के युग में भारत के सांस्कृतिक विरासत की स्थापना का दौर है। यह किसी विचार या संस्कृति के विरूद्ध युद्ध न होकर भारत की भारत वर्ष से मुलाकात का दौर है। इसलिए जब मोदी सरकार के संकल्प की बात होगी तब शिवराज सिंह चौहान की संकल्प शक्ति को पूर्ण करने की जिम्मेदारी निभाने की बात भी होगी। यही बात अमित शाह ने भी कही है।

मेडीकल की शिक्षा की किताब हिंदी में होना केवल इतनी सी बात नहीं है कि छात्र किताब को पढ़ेंगे और शिक्षा प्राप्त करने के नये तरीके के आधार पर डाक्टर हो जायेंगे। इसमें भारत का भारत वर्ष के साथ कदमताल होना शुरू हो जायेगी। अभी तक हम डाक्टर की पढ़ाई के बाद इंग्लिश भाव में आ जाते हैं अब भारत के भाव में आयेंगे। हमारा देश हमको अपना लगेगा। हालांकि पहले भी लगता था लेकिन यहां भाव की बात है। याने की भारतीय डाक्टर होगा, भारतीय इंजिनियर होगा। जिसने भारत की राष्ट्रभाषा में या अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण की है। यहां से अवधारणा बदलने की शुरूआत होगी। जो किसी कल कारखाने के निर्माण के बाद होने वाले विकास की भांति विकास की राह खोलेगी। हम एक ताकतवर और आधुनिक भारत की दिशा में आगे बढेंगे। जिस नये भारत की निर्माण की बात हो रही है वह नया नहीं अपितु मूल भारत के निर्माण की बात है। हिन्दी, हिन्दू (जीवन पद्यति),हिन्दूस्तान की बात हो रही है। उस हिन्दूस्थान की जहां पर देवता जन्म लेते रहे हैं। वहां मानवता की सुरक्षा का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। जिसकी संस्कृति, संस्कृत और संस्कार विश्व को मार्गदर्शन देने की हमेशा पहले करते रहे हैं। आज विश्व भारत की ओर इसी आशा से देख रहा है कि वह आतंक से पीडि़त विश्व को फिर शान्ति का संदेश  सुनाने के लिए आगे आये। विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया को भारत से उम्मीद है वह इसे रोकने के लिए अपने प्रयास करे। भारत विश्व की उम्मीद केवल इसलिए बना है क्योंकि वह अपनी संस्कृति की ओर लौट रहा है। उसमें अपने हिन्दू होने का प्रदर्शन करने की ताकत आ गई है। उसमें हिन्दी को उसका समुचित स्थान दिलाने की क्षमता आ गई है। उसी का एक प्रयास है कि हिन्दी सहित क्षेत्रीय भाषाओं में मेडीकल और इंजिनियरिंग की शिक्षा ग्रहण करने का रास्ता निकाल लिया गया है। पहले चाहे नरेन्द्र मोदी ने की हो लेकिन उसको मूर्त रूप देने का काम शिवराज सिंह चौहान के खाते में आना ही है।
                                                        संवाद इंडिया

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