‘भाजपा’ की पिच पर खेलने आ गए ‘केजरीवाल’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। अरविंद केजरीवाल का राजनीति करने का तरीका सबको समझ में आ गया है। वे गरीबों की भावना दोहन के आधार पर वोट कबाड़ते हैं। सबसे पहले दिल्ली में उन्होंने वही किया। रिक्शे वाले, दिहाड़ी वाले लालच में अपने साथ किए। उन्हें इतना लालच दिया कि मनोज तिवारी को अध्यक्ष बनाना भी भाजपा के काम नहीं आया। दूसरा वे मीडिया का मूंह इतना मीठा कर देते हैं कि उसकी पूरी मिठास केजरीवाल को याग्य बताने में ही लगी रहती है। दूसरी तरफ भाजपा छोटे-बड़े मीडिया को नापने के काम में लगी है। दिल्ली की सरकार के दोबारा आने का सबसे आधार यह है कि उसके काम के मूल्यांकन का कोई मेजरमेंट नहीं है। पुलिस केन्द्र सरकार के हाथ में तो स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर उनका शोर मीडिया में इतना अच्छे से दिखाया जाता है कि लगता है कि राम राज्य आया हुआ है। पंजाब में दूसरी सरकार बनी है। यह किसान आन्दोलन में सेवा का प्रतिफल है। इसके बाद केजरीवाल की परीक्षा भी शुरू होती है। पंजाब में भाजपा विपक्ष भी नहीं है और कांग्रेस से उसने सत्ता को छीना है इसलिए वहां परिणाम का आकंलन करने जैसी स्थिति होगी। यह बात अलग है कि देश भर में मीडिया घरानों को फुल पेज विज्ञापन जारी करके वहां का असंतोष मीडिया के माध्यम से आने की बाड़ तैयार की जा रही है। फिर भी?

अब गुजरात में केजरीवाल चुनाव लडऩे चले हैं। वहां की राजनीति कुछ अलग प्रकार की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का गौरव विश्व भर में बढ़ाया है। इसका अनुभव गुजरातियों को होता है क्योंकि गुजरात का व्यक्ति विश्व के किसी भी क्षेत्र में मिल जायेगा। अमित शाह का गुजरात है तब रण्णनीति बनाने में माहिर इस नेता का सामना भी केजरीवाल को करना होगा। ऐसे में गुजरात में केजरीवाल भाजपा की पिच में खेलने के लिए अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया है। उन्हें लक्ष्मी पूजन के समय ध्यान आया कि क्यों न महात्मा गांधी के साथ भारतीय करेंसी पर लक्ष्मी गणेश का चित्र छापने की बात उठा दी जाये। ऐसा करने से हिन्दू कार्ड भी खेल लिया जायेगा और सरकार ऐसा न करने की स्थिति में हार्ड हिन्दूओं के निशाने पर भी आ जायेगी। हिन्दू कार्ड खेलना ही भाजपा की पिच है जिस पर केजरीवाल ने बैटिंग शुरू कर दी है। यह सच है कि पहली बार में केजरीवाल कोई गुजरात में भाजपा को हरा नहीं सकते इसलिए उन्होंने अगले पांच साल बाद की योजना पर काम करना शुरू किया है। पहली बार में तो वह केवल कांग्रेस के लिए रास्ता बंद करने का काम ही कर रहे हैं।

जब से देश की राजनीति हिन्दू वोटों के आधार पर निर्णायक हुई है तब से राजनीतिक दलों ने बड़ी ही बेरहमी से मुसलमान वोटों का त्याग किया है। अन्ना आन्दोलन के समय जिस प्रकार की राजनीति करने का इरादा लेकर केजरीवाल आये थे वह तो भारतीय राजनीति में पहले ही बदल गई थी। अब तो भाजपा की मंशा के अनुसार राजनीति करने में सभी दल लगे हुए हैं। यहां भी कहा जा सकता है कि जो आरोप लग रहे हैं कि जब से केजरीवाल को आबकारी नीति के गोलमाल में माल का स्वाद चखने को मिला है केजरी भाई को भी समझ में आने लगा है कि लक्ष्मी का चित्र नोटों पर होना चाहिए? बस यही तो राजनीति है।

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