भटकता राकेश टिकैत आया साख का संकट

नई दिल्ली (विशेष प्रतिनिधि)। किसान आंदोलन राजनीतिक हो गया है। किसान नेता सरकार को अपनी बात तो समझा नहीं पा रहे हैं, खीज के कारण हिंसक प्रवृत्ति के प्रमाण दे रहे हैं। पंजाब में भाजपा विधायक के कपड़े फाड़ने की घटना हो या भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के काफिले पर पत्थरबाजी। दोनों ही मामले वर्ग संघर्ष व जातीय संघर्ष की ओर इशारा कर रहे हैं। किसान आंदोलन 26 जनवरी को ही अपने रास्ते से भटक कर हिंसक हो गया था। सरकार के संयम के कारण कोई बड़ी वारदात नहीं हो पाई  यदि यह वर्ग संघर्ष देश में बढ़ता जाएगा तो किसान आंदोलन विफल होने के साथ ही, काला इतिहास भी अपने साथ लिखवाने की स्थिति में होगा।

कृषि सुधार के तीन कानूनों का विरोध करने के लिए पंजाब के किसान राजनीतिक शह पर दिल्ली की ओर आए थे। पड़ोसी राज्य हरियाणा ने इनका समर्थन किया। किसान नेता की विरासत पाल रहे टिकैत बंधुओं ने भी बिना मांगे इस किसान आंदोलन का समर्थन कर दिया। इस प्रकार दिल्ली तीनों ओर से घेरकर अपनी मांग मनवाने के लिए किसान बड़ी संख्या में बॉर्डर पर बैठ गए। किसान आंदोलन के प्रति सरकार झुकती हुई नजर आई, मीडिया में सहानुभूति का प्रचंड वातावरण रहा, आम जनता केंद्र सरकार को आशंका की दृष्टि से देखती रही। तभी सरकार की ओर से कानून स्थगित करके बात करने तक का प्रस्ताव आ गया। लेकिन गणतंत्र दिवस के दिन हुई लाल किले की हिंसक घटना ने किसान आंदोलन की नियत पर शक पैदा कर दिए। विदेशों में बस रहे खालिस्तानी समर्थक और देश विदेश के एक्टिविस्ट जब इस किसान आंदोलन से जुड़े तो इसने अपने मूल चरित्र को खो दिया। यहीं से सरकार का रुख ढीला हो गया, मीडिया अनदेखी करने लग गया और किसान आंदोलन भटक गया।

यह माना जाने लगा कि किसान आंदोलन लगभग समाप्त हो गया। देश को चाहने वाले किसान, आंदोलन स्थल से उठकर अपने घरों की ओर जाने लगे। पुलिस का दबाव बढ़ गया और किसान आंदोलन समाप्त होने की ओर बढ़ गया। इसी बीच राकेश डकैत के आंसुओं ने आंदोलन को वापस खड़ा करने में सहायता की  लेकिन कुछ दिनों बाद ही यह पता चला कि राकेश के साथ आने वाली भीड़ बालियान खाप के लोगों की ही है। यहां से यह आंदोलन एक जाति विशेष का आंदोलन हो गया दूसरी तरफ पंजाब में कुछ विशेष विचारधारा के सिखों यह आंदोलन बन कर रह गया। गुंडागर्दी, मारपीट, कपड़े फाड़ना इस आंदोलन की विशेषता बन गया। आम जनता की सहानुभूति और मीडिया की बेरुखी ने इतने लंबे आंदोलन के महत्व को कम कर दिया। अब यह आंदोलन भाजपा हटाओ का राजनीतिक आंदोलन बन गया।

किसान नेता कृषि सुधार कानूनों में कमी बताकर किसानों और जनता की सहानुभूति आज भी प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन इनके पास कमी दिखाने जैसा कोई तर्क नहीं है। गुंडागर्दी, हिंसा और अराजकता से कोई भी आंदोलन सफल नहीं किया जा सकता। यदि किसान नेता आम जनता की राजनीति करने उतरेंगे तब राजनीति करने वालों से उनका सीधा मुकाबला होगा और इस सीधे मुकाबले में टिक पाना किसान नेताओं के लिए संभव नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो राकेश टिकैत लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अपने ही क्षेत्र में नहीं हारते? अब यह आंदोलन सरकार बनाम किसान होने की वजह कुछ किसान नेताओं का भाजपा विरोध के रूप में सामने आ रहा है। जिसका जनता पर असर होना संभव नहीं है। यदि लोहार को गहने बनाने की जिम्मेदारी दे दी जाए और सुनार से लोहे के सामान बनाने को कहा जाए तब जो परिणाम होता है वही स्थिति इस किसान आंदोलन की होती दिख रही है। आज राकेश टिकैत पर हमला होना निश्चित रूप से शर्मनाक कहा जाएगा लेकिन यह एक शर्मनाक कदम के सामने दूसरी शर्मनाक घटना है।

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