‘बाबा साहब’ की बहुआयामी प्रतीभा दबाने का पापी ‘कौन’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायाधीश का एक बयान आज सुर्खियों में है। उन्होंने एक आयोजन में कहा कि बाबा साहब अम्बेडर संस्कृत को भारत की अधिकृत भाषा बनाना चाहते थे और इसके संदर्भ में उन्होंने प्रस्ताव भी रखा था। लेकिन वह प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ और भारत की मूल भाषा बनने से संस्कृत को वंचित कर दिया गया। वैसे भी संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो उत्तर से दक्षिण तक सभी को स्वीकार्य है। जिस प्रकार का विवाद हिन्दी को लेकर पैदा किया गया वह नहीं होता और बाबा साहब की इस बहुआयामी प्रतिभा का लाभ देश लेने से वंचित हो गया। अब सवाल यह उठता है कि बाबा साहब की इस प्रतीभा का दमन करने का पापी कौन है? यह सवाल खुद ही महत्वपूर्ण है। बाबा साहब की सोच को दर्शाता है कि वे केवल छुआछात को हटाने भर के पक्षधर नहीं थे वे भारतीय समाज की जो संरचना चाहते थे वह मूल भारत की तस्वीर तैयार करती। लेकिन उनकी भावनाओं को राजनीतिक आधार पर दबाने का प्रयास किया गया। कई बार लगता है कि हमारे राष्ट्रपिता के राजनीतिक प्रेम का जिन्होंने अनुचित लाभ उठाया उनके कारण देश की दिशा ही बदल गई। भारत बिना अपनी भाषा और बिना अपने संस्कारों के आगे तो बढ़ता गया लेकिन दिशाहीन होकर?

बाबा साहब की प्रतीभा पर अनेकों बार चर्चा होती है। वे हर बार बेहतर सिद्ध होते हैं। जब गांधीवाद और अम्बेडर के विचारों को साथ रखकर देखते हैं तब गांधी का समाज सुधार वोटों की फसल की तरफ जाता हुआ दिखाई देता है जिसे कुछ घरानों ने भुनाया। जबकि बाबा साहब अम्बेडकर का समाज सुधार समानता की धुरी पर टिका था। लेकिन दुखद पक्ष यह है कि उनके विचारों का सामने आने से रोकने के प्रयास गांधी के जीवनकाल में ही शुरू हो गये थे। जब देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश यह कहते हैं कि बाबा साहब संस्कृत को देश की भाषा बनाने का प्रस्ताव लेकर आये थे लेकिन उसे स्वीकार नहीं होने दिया गया। यहां यह भी उल्लेख करना बनता है कि संस्कृत विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी भाषा है लेकिन उसे एक षडयंत्र के तहत पूजा पाठ की भाषा बना दिया और हिन्दी को दरिद्रों की। अंग्रजों के प्रभाव में पली बढ़ी भारतीय राजनीति की विरासत ने गुलामी से मुक्ति के बाद भी भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाने की मंशा के तहत काम किया। यह बाबा साहब की प्रतीभा को दबाने का पाप है।

अम्बेडकर और गांधी के सिंद्धान्तों का विमर्श हमेशा नई प्रेरणा और उपहार देता है। संस्कृत वाले प्रस्ताव में भी यही सब भरा हुआ है। ऐसा कोई भी सुझाव गांधी जी और नेहरू जी की तरफ से आया हो जिससे भारतीय संस्कृति समृद्ध होती हो कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया। उनके वंशजों ने तो आजादी के बाद मुगलिया व्यवस्था का सेक्युलरिजम के नाम पोषण ही किया। अम्बेडकर अनेक मामलों में भारतीय संस्कृति के पोषक होते दिखे हैं। उनकी प्रतिभा को दबाने के कुप्रयासों पर अनेकों बार चर्चा होती है और यह प्रमाण दिया जाता है कि कांग्रेस ने उन्हें संसद में पहुंचने के लिए हर बार रोका। राजनीतिक स्वार्थ के लिए हुआ पाप देश को कितना भारी पड़ा हम समझ सकते हैं।

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