बड़े चक्रव्यूह को भेद ममता जीती

नई दिल्ली ( विशेष प्रतिनिधि )।  पांच राज्यों में हुए विधानसभा के उपचुनाव के परिणाम आ गए हैं। सबसे प्रतिष्ठित पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भाजपा के बड़े चक्रव्यूह को भेदने के बाद तीसरी बार सत्ता पर काबीज होने जा रही है। तृणमूल कांग्रेस को जिताने के चक्कर में ममता बनर्जी नंदीग्राम के प्रतिष्ठित सीट से खुद चुनाव हार गई। असम में भाजपा की वापसी हो गई है जबकि केरल में वाममोर्चा फिर सरकार बनाने में कामयाब हो गया। तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन होकर डीएमके पावर में आई है तो पांडुचेरी में राजग की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया। इन चुनावों में किसने क्या खोया क्या पाया इसका विश्लेषण आज से शुरू हो जाएगा। ममता बनर्जी ताकत के साथ वापस हुई है जबकि भाजपा बंगाल में प्रतिपक्ष दल बना है। वहां परसों राज करने वाले वाम दल और सत्ता की प्रबल दावेदार कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई। कांग्रेस को पांडिचेरी में नुकसान हुआ है तो तमिलनाडु में वह सत्ता की भागीदार हो गई। अन्य जगह उसे कोई बड़ा लाभ नहीं हुआ। क्षेत्रीय दलों ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है।
 
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम पूरे दिन भर चर्चा का विषय बने रहे। लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान पश्चिमी बंगाल के चुनाव परिणाम को लेकर रहा। वह सुबह से ही जिस तरह का ट्रेंड शुरू हुआ उसमें यह साफ लगने लग गया था कि ममता बनर्जी तीसरी बार सरकार में वापसी कर रही है। हालांकि 3 सदस्यों वाली भाजपा 77 स्थान पाकर दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनी है। यहां तीन दशक तक राज करने वाली वाम पार्टी और कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाए। पश्चिमी बंगाल में साफ तौर पर दो दलीय विधानसभा हो गई है। तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतकर पहले से अधिक खुद को ताकतवर सिद्ध किया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि नंदीग्राम से ताल ठोकने वाली ममता बनर्जी खुद चुनाव हार गई। यह घटना पार्टी के जश्न को फीका करने वाली सिद्ध हो रही है। ममता बनर्जी की जीत पर सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं ने उन्हें बधाई दी है। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कैलाश विजयवर्गीय ने भी उन्हें बधाई देते हुए नसीहत दी है कि अब वे अपने कार्यकर्ताओं को संभाले।
 
बंगाल विधानसभा चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भाजपा ने अपनी पूरी ताकत और सारे बड़े नेताओं को झोंक कर जो चक्रव्यूह रचा था उसे ममता बनर्जी एक दुर्घटना में टूटी टांग लेकर भेदने में कामयाब हो गई। जनमानस में उनके प्रति सहानुभूति पैदा हुई। दूसरा मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण, उसका ममता बनर्जी के पक्ष में होना बड़ा फैक्टर रहा। इसके प्रत्युत्तर में हिंदू वोट बैंक का वैसा धुर्वीकरण नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय से प्रभावित होने वाला महिला वोट भी ममता बनर्जी के पक्ष में चला गया। हालांकि यह राजनीतिक समीक्षा का विषय है कि वामपंथी और कांग्रेसी वोट ममता बनर्जी के पक्ष में शिफ्ट हुआ है?  फिर भी यह जरूर कहा जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस की ताकत इतनी बड़ी बगावत के बाद भी जनता में बरकरार है यह राजनीतिक शोध का विषय है।
 
यह एक विषय हो सकता है कि भाजपा बंगाल में सत्ता के करीब नहीं पहुंच पाई। लेकिन यह भी महत्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष है कि जिस भाजपा का बंगाल में सांगठनिक ढांचा ना के बराबर है और विधानसभा में जिस की सदस्य संख्या तीन है वह राजनीतिक पार्टी मुख्य प्रतिपक्षी दल बन कर सामने आई है। अब बंगाल विधानसभा का परिदृश्य तृणमूल और भाजपा के विधायकों के रूप में ही दिखाई देगा। केवल 2 सदस्य अन्य होंगे जो जीत कर आए हैं। भाजपा की इस छलांग को राजनीतिक समीक्षक एक ऐसे नए अखाड़े में जीत के रूप में देख सकते हैं जिसके दाव पेच समझने में न आने के बावजूद भी चुनाव में इतनी बड़ी जीत हासिल की है। ममता बनर्जी के लिए 5 साल का यह कार्यकाल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा क्योंकि विपक्षी दल के रूप में भाजपा का अपना एक काम करने का तरीका है।
 
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों को देख कर सबसे पहले टिप्पणी यह तो की ही जा सकती है कि ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेजस्वी चेहरे, अमित शाह की सांगठनिक ताकत और पूरी पार्टी को झोंक देने के बाद जीत का सेहरा बांध लेना यह उनकी बड़ी ताकत है। यही ताकत विपक्षी ध्रुवीकरण का नया केंद्र बिंदु बन सकती है अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों में अब ममता से अधिक चमकदार चेहरा कोई नहीं है।

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