बंधन पर कम गठबंधन पर अधिक ध्यान है : खिसकते जनाधार में सत्ता की चाहत

एक बार फिर से मोदी सरकार के खिलाफ गठबंधन की तैयारियां हो रही हैं। अबकी बार गठबंधन के दलों की संख्या कम हुई है। गांधी परिवार के हाथ से सत्ता के सूत्र न केवल खिसक गये हैं अपितु वापसी की संभावना भी कम ही दिख रही हैं। वाम दलों का आधार समाप्त जैसा हो गया है। ममता की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा पर कांग्रेस का स्थानीय संगठन ही सवाल उठा रहा है। मायावती के मन में यूपी लोकसभा में सफाया और विधानसभा में एक भी राज्यसभा सदस्य नहीं भेजने जैसी स्थिति का खौफ सता रहा है। तेजस्वी यादव ऐसे पिता के पुत्र हैं जिनको देश के न्यायालय ने भ्रष्टाचार का न केवल दोषी माना है बल्कि उन्हें एक के बाद एक सजायें दी हैं। केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ देश को बचाने की जंग लडऩे आये थे लेकिन अब क्या कर रहे हैं उसकी व्याख्या करने के हालात बन रहे हैं। मुगलकाल की भांति अपने पिता को सत्ता शीर्ष से बेदखल करके राजनीतिक सत्ता कबजाने वाले अखिलेश यादव गठबंधन की धुरी बनने का प्रयास कर रहे हैं। मोदी सरकार के खिलाफ एक ऐसा गठबंधन खड़ा हो रहा है जिसको सत्ता से जाने का डर सता रहा है जिसमें देश के विकास का कोई अपना विजन सामने नहीं आया है? लेकिन भारत की विवशता यह है कि वह भावनाओं के आधार पर संचालित होता रहा है फिर भी आज का सुलझा हुआ मीडिया सत्ता के लिए आने वाले दलों से उनकी कुंडली पूछ लेता है। यही कारण है कि इस गठबंधन के नेता मीडिया पर सीधा निशाना साध रहे हैं। जिस लोकतंत्र की कल्पना भारतीय राजनीति में की गई थी उसका निचला स्तर आता हुआ दिखाई दे रहा है। मोदी के प्रयासों की आलोचना का अधिकार है लेकिन यह आलोचना तथ्यात्मक हो तो नेताओं की साख बनती है नहीं तो बूसुरी आलोचना दिखाई देती है।
सबसे पहले कर्नाटक की ताजपोशी के वक्त 17 राजनीतिक दल एक साथ मंच पर आये थे। तब यह कहा गया था कि देश का लोकतंत्र बचाना है। मोदी की व्यापक आलोचना की गई थी। कर्नाटक विधानसभा में जिस दल को सबसे अधिक सीटें दी गईं लेकिन सत्ता से कुछ कदम दूर रख दिया था। लोकतंत्र बचाने वाले इन दलों ने सबसे कम सीटों वाले दल के नेता को मुख्यमंत्री बनाकर लोकतंत्र को सही दिशा देने का भी संकेत दिया था। वह मुख्यमंत्री सत्ता का जहर पी रहा है ऐसा बयान दे रहा है। अब एक बार फिर से विपक्षी नेताओं के हाथ में मोमबत्तियां हैं। इस बार इन दलों की संख्या कम हो गई। यह कमी दूरियां हैं यह नहीं कहा जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि विपक्षी एक का सूत्रपात देश के आसन्न किसी खतरे के कारण हो रहा है या फिर सत्ता से दूर होने के गम के कारण। जिन दलों का जमावड़ा हो रहा है उसमें अधिकांश तो अपनी सत्ता को खो चुके हैं जो सत्ता में बचे हुये हैं। वे सरकार जाने के खौफ से भयग्रस्त हैं।
राहुल गांधी ने कहा है कि संघ और भाजपा के खिलाफ पूरा देश खड़ा हो गया है। जब संघ और भाजपा की बात राहुल गांधी करते हैं तब उनके दिमाग में विशेष राजनीतिक दल होते हैं या हिन्दू समुदाय होता है? मनमोहन सरकार के दस साल को कार्यकाल भारत के इतिहास में हिन्दू विरोध के कार्यकाल के रूप में गिना जायेगा। हिन्दू आतंकवाद शब्द का सजृन इसी कार्यकाल में हुआ है। भारतीय मान्यताओं को सबसे अधिक इसी समय में तोड़ा गया। राजनीतिक धु्रवीकरण का आरोप संघ व भाजपा पर लगता रहा है लेकिन विपरीत धु्रवीकरण का प्रयास आज भी हो रहा है। बंगलादेशी घुसपैठियों का समर्थन एक समुदाय विषेश लिये किया जा रहा है। देश देख भी रहा है कि यह समुदाय विशेष भाजपा के विरोध में वोट करने का आव्हान करता है। चर्च भी पत्र जारी करके भाजपा को वोट न देने की अपील करते हैं। यह विपरीत राजनीतिक धु्रवीकरण है। इसलिए इस सारी राजनीतिक कसरत को धु्रवीकरण के रूप में ही देखा जा रहा है।
पिछले दिनों कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई थी। बैठक में पार्टी ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाने का ऐलान किया था। विपक्षी एकता के एकाध दल को छोड़ दिया जाये तो किसी भी दल ने राहुल को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी नहीं माना। दो दिन में पार्टी को यूर्टन लेना पड़ा। नेतृत्व किसका होगा यह देश के सामने स्पष्ट नहीं है। कहीं ऐसा न हो कि नरेन्द्र मोदी की तुलना में कोई देवेगौड़ा देश को प्रधानमंत्री मिल जाये। जिस प्रकार से भाजपा को रोकने के लिए कर्नाटक को कुमार स्वामी मिल गये। तेजस्वी के बयानों को मीडिया गंभीरता से लेता है लेकिन वे जिस राजनीतिक दल का नेतृत्व करने जा रहे हैं वह व्यक्तिवादी दल है। जिस व्यक्ति के कारण वह दल खड़ा हुआ है वह भ्रष्टाचार के आरोप में सजायाफ्ता है। क्या इससे लोकतंत्र मजबूत होगा? पिछले तीन दशक से गांधी परिवार सत्ता से सीधे जुड़ा हुआ नहीं है। 2 दिसम्बर 1989 को राजीव गांधी का कार्यकाल समाप्त हुआ था। इसके बाद कांग्रेस को सत्ता तो मिली लेकिन गांधी परिवार के पास प्रधानमंत्री का पद नहीं रहा। पंचायत चुनाव में ममता बनर्जी ने बंगाल में जिस तरीके का प्रदर्शन किया। विपक्षी किसी भी दल को नामांकन तक भरने नहीं दिया वह लोकतंत्र की रक्षक पार्टी कैसे हो सकती है। ऐसे किसी भी दल को केन्द्र की सत्ता देने के बाद तानाशाही की संभावना से इंकार किया जा सकता है। बाकी एक साथ आने वाले राजनीतिक दल या सभी दलों के समूह को अपना विजन बताने का समय ही नहीं मिला है क्योंकि गठबंधन का घर बनता और बिगड़ता जा रहा है। क्या यह गठबंधन देश के हितों को ध्यान में लेकर बन रहा है?
पिछले दिनों से कांग्रेस के प्रवक्ताओं में देशव्यापी बीमारी आई है। वे मीडिया पर हमला कर रहे हैं। जिस भी मीडिया कर्मी ने सरकार के किये कामों का उल्लेख कर दिया उसे भाजपा से जुड़ा हुआ बताने में वे वक्त नहीं लगाते हैं। कई बार तो उनकी भाषा का स्तर भी बताता है कि वे सत्ता के लिउ कितना नीचे तक जाते जा रहे हैं। बात चाहे राजीव त्यागी बनाम देवगन की हो या प्रियंका चतुर्वेदी बनाम गुजरात के एक पत्रकार ही हो। ऐसे घटनाक्रम देश भर में हो रहे हैं। मीडिया के सामने कांग्रेस का नेतृत्व सरकार का विरोध करने ही आता है। अपना विजन बताने नहीं। अपने किये काम उल्लेख किय जायें तो मीडिया के पास उनको दोहराने का मौका होगा लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य कांग्रेस उपस्थित ही नहीं कराती है। दूसरी तरफ मोदी सरकार अपने काम बताते नहीं थकती तो राज्य सरकारें भी सवाल पूछने पर अपनी उपलब्धियों की फहरस्ति पढ़ देती हैं। लोकसभा में राहुल गांधी ने दो करोड़ रोजगार की बात उठाई थी प्रधानमंत्री ने उसका विस्तार से जवाब दिया था। उसे दोहरा देना भाजपा का हो जाना होगा? इसलिए आज समय विरोध का नहीं है विरोध के साथ अपनी क्षमता, योग्यता और योजना बताने का भी है। विपक्ष या विपक्ष गठबंधन इस काम में काफी पीछे दिखाई दे रहा है।
विपक्षी गठबंधन मजबूरी का गठबंधन है यह बात आये दिन आरोपों में आती है। भाजपा का विस्तार मोदीकाल में जितनी तेजी से हुआ है यह ऐसा दस्तावेज है जिसने बचे हुये राजनीतिक दलों में भ्य व्याप्त करा रखा है। दिल्ली के मंच पर एकता का प्रदर्शन करने वाले दल अपने राज्य में विरोधी हैं। यह देश देख रहा है और इन नेताओं के पास इसका कोई जवाब नहीं है। इसके अलावा देश का धार्मिक विभाजन करने का आरोप विपक्ष सरकार पर लगाता है लेकिन वह बंगलादेशी घुसपैठियों का साथ देता है, रोहिग्यां का साथ देता है तब उसकी कथनी और करनी में अन्तर दिखाई देता है। मोदी सरकार के पास विजन है उस प्रकार का विजन राहुल गांधी और उसकी कांग्रेस को भी दिखाना चाहिए। महागठबंधन को भी दिखाना चाहिए।

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