बंगाल में भाजपा से सरकार की उम्मीद क्यों बनी?

बंगाल चुनाव में भाजपा ने लगाई बड़ी छलांग….. सुरेश शर्मा। भाजपा ने पश्चिमी बंगाल विधानसभा के आम चुनाव में 77 सीटें जीत कर एक रिकार्ड बनाया है? रिकार्ड यह कि जिस पार्टी का अपना कोई संगठन वहां प्रभावशाली न होने के बाद भी विपक्ष के नेता की ताकत प्राप्त की। पहले से ताकतवर व सत्ता में रह चुकी कांग्रेस और कम्युनिष्टों को एक भी सीट नहीं जीतने दी। पूरे बंगाल में चुनाव की घुरी बनी रही। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उसके प्रत्याशी ने घूल चटा दी। इसके बाद भी एक वर्ग भाजपा की सरकार नहीं बन पाने को ऐसे पेश कर रहा है कि जैसे वहां पहले से ही सरकार थी जो चली गई? या जनता सरकार बनाने को लालाहित थी जो बाद में बदल गई। हां इतना जरूर सच है कि भाजपा ने बंगाल में अपना विस्तार तेजी से किया। वहां के जनमानस में अपना प्रभाव और स्वीकार्यता बनाई। हिंसा और अराजकता का डटकर मुकाबला किया और 3 विधायकों की संख्या को 77 तक पहुंचा कर यह सिद्ध कर दिया कि वह अगली सरकार बनाने की प्रबल दावेदार है। लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि मीडिया और राजनीति का एक वर्ग भाजपा की अपेक्षाओं को न पाने को उसकी असफलता के रूप में पेश कर रहा है। जिसमें यह संदेश होता है कि भाजपा को मतदाता पहले की अपेक्षा कम स्वीकार करने लग गया है। जबकि ऐसा कोई आधार सामने नहीं आता है।

बिहार विधानसभा के चुनाव से समीक्षा को शुरू करते हैं। वहां नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करते वक्त यह आम राजनीतिक धारणा थी कि बिहार में भाजपा बड़ा राजनीतिक दल बनकर सामने आयेगा। लेकिन बड़ा दल बनने के बाद भी नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके दो कारण हैं। पहला सहयोगी दलों में भरोसा और विश्वसनीय बनी रहे। दूसरा यह कि आने वाले समय के लिए दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में करीबी आये जिसका लाभ अगले चुनाव में मिलेगा। इसके बाद हैदराबाद स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा का आक्रामक प्रचार और वहां मेयर जीतने की संभावना दिखाना रणनीति का हिस्सा रहा। वहां मेयर तो नहीं बन पाया लेकिन भाजपा दूसरे नम्बर पर आ गई। यही रणनीति बंगाल में बनाई गई। वहां पार्टी के 3 विधायक थे। जबकि सांसदों की संख्या 18 थी। यहां यह समझना होगा कि सांसद अधिक देने के पीछे नरेन्द्र मोदी का चेहरा और पिछले कार्यकाल में उनका काम अपना असर दिखा रहा था। विधानसभा के चुनाव में मोदी के नाम पर आकर्षित होने वालों की संख्या लोकसभा के मतदान के करीब नहीं पहुंच पाती है। प्रदेश का चेहरा सामने होता है तब उसका असर होता है। बंगाल चुनाव में यह देखने को मिला। मोदी के नाम पर 77 सीटों तक तो पहुंचा जा सका लेकिन इससे आगे के लिए पांच साल इंतजार करना होगा।
यह राजनीतिक रणनीति होती है कि कोई भी राजनीतिक दल अपना लक्ष्य निर्धारित करता है। भाजपा काडर आधारित पार्टी है। उसकी अपनी विचारधारा है। उसका काम करने का अपना तरीका है। वह देश के प्रति अपने विचारों को राजनीति से ऊपर रखकर सोचती है और चुनाव के लिए हर वक्त तैयार रहती है। ऐसे में बंगाल में सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झौंक देना कोई गलत रणनीति का हिस्सा कैसे हो सकता है? भाजपा जैसा दल जिसकी केन्द्र में सरकार है वह विपक्षी दल होने का लक्ष्य लेकर तो चुनाव मैदान में नहीं आ सकती है। ऐसे में उसके लक्ष्य को आधार मानकर उसकी उपलब्धि को फीका लिखने का कोई कारण समझ में नहीं आता है। इसके बाद भी लेखकों का एक वर्ग और सोशल मीडिया में भी एक समूह ऐसे उदाहरण पेश कर रहा है कि नरेन्द्र मोदी बंगाल में सरकार नहीं बना पाये। उसके खास रणनीतिकार अमित शाह का लक्ष्य कमजोर पड़ गया। पार्टी के सेनापति जेपी नड्डा अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए। दूसरी तरफ ममता का जनाधार और महिला होने के सामने पीके की रणनीति का अधिक प्रभावशाली बताया जा रहा है। यह विश£ेषण गले नहीं उतरता है। किसी भी राजनीतिक दल को कोई चुनावी रणनीतिकार जितवा दे यह संभव नहीं होता है। यह हो सकता है कि रणनीति पर नेता काम करे और नेता की भावना और बातों को कार्यकर्ता जनता तक पहुंचाने का काम कर दे। इससे मतदाता निकलेगा और विधायकों की संख्या अधिक हो जायेगी। लेकिन रणनीतिकार ही सरकार बनवा या रूकवा सकता है यह कमजोर समीक्षक होने का प्रमाण है।

भाजपा के बंगाल संगठन की बात की जाये तब यह समझ में आयेगा कि उसे सेना की तरह देश भर से कार्यकर्ता बुलाकर संगठन का ढ़ांचा तैयार करना पड़ा है। प्रत्याशियों की मारामारी होने के कारण अन्य दलों के चर्चित चेहरों को अपने यहां लाकर चुनाव लड़वाना पड़ रहा है। एक स्थापित और सभी प्रकार का दम रखने वाली पार्टी से मुकाबला करना है। विपक्ष में वे दो दल भी सामने हैं जिनकी राज्य में सरकार रही है। ऐसे में कमजोर होकर मैदान में उतरने की बजाये भाजपा ने बड़ा सपना देखा। जब बड़ा सपना देखा तो उसे बड़ी सफलता भी मिली। 3 विधायकों से सदन में 77 विधायक और सत्तापक्ष के बाद विपक्ष की अकेली पार्टी बन गई। पश्चिमी बंगाल विधानसभा का दृश्य अजीब सा ही होगा। सदन में या तो सरकार बैठेगी या विपक्ष। इनके अलावा मात्र दो और विधायक होंगे। जिसमें एक निर्दलीय और दूसरा एक विधायक एक पार्टी का प्रतिनिधित्व करेगा। ऐसे में सरकार को एक ताकतवर विपक्ष का सामना करना होगा। अब काम करते देखने का भी मजा आयेगा और विपक्ष की ताकत का भी।

बंगाल में भाजपा सरकार नहीं बना पाई यह एक बात है लेकिन यह उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि उसने अपनी ताकत में जबरदस्त इजाफा किया है। वह अगले पांच साल के बाद की रणनीति पर काम करके चुनाव में गई थी। इस चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण पक्ष भी यही है। ममता को सीधा निशाने पर लेकर उसकी ढ़की स्थिति को सबके सामने रख दिया परिणाम यह निकला की आम चुनाव में मुख्यमंत्री ही चुनाव हार गई। इसकी संभावना भाजपाई भी नहीं देख रहे थे। अगली रणनीति में ममता को हिंसा की समर्थक नेता के रूप में आम लोगों के सामने पेश कर दिया जिसे जनता ने समझ तो लिया लेकिन भाजपा का पर्याप्त विकल्प नहीं माना। यह नहीं माना कि भाजपा ममता की हिंसात्मक राजनीति का हिंसक तरीके से जवाब दे सकती है? जबकि वाम दलों की हिंसा का मुकाबला ममता ने हिंसा से ही दिया जिसे जनता ने हाथों हाथ लिया था और दो बार सरकार का तोहफा दे दिया था। बंगाल में जय श्रीराम के नारे को सामने करके भाजपा ने वहां के बंगालदेशी घुसपैठियों और मुस्लिम वोटों के समानान्तर धु्रवीकरण करने का प्रयास किया। यह प्रयास शत-प्रतिशत पूरा नहीं हुआ। लेकिन इसकी नींव डल गई जो आने वाले पांच वर्ष में अपने आप पल्लवित होता जायेगा। यदि हिन्दू वोट बैंक की आलोचना करने की जरूरत महसूस की जाती है तब मुस्लिम वोट बैंक की इजाजत कैसे दी जा सकती है? यदि इजाजत दी जा सकती है तब दोनों ही समुदायों को दी जाना चाहिए। एक की आलोचना और दूसरे को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए भाजपा ने इस बार की विधानसभा चुनाव रणनीति तत्कालीक और अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तय की थी। उसे जबरदस्त सफलता मिली है। ममता बनर्जी को चुनाव जीतने के लिए हिंसा के साथ हमले की झूठ का सहारा लेना पड़ा है। अपने पांव को पट्टी बांधकर फरेब करना पड़ा है। जबकि भाजपा ने समूची व्यूहरचना के साथ चुनाव लड़ा और जनता का इतना समर्थन पा लिया जिससे वह पहले पायदान पर ताकत के साथ पहुंच गई और अगले पायदान के लिए वह अपनी सेनाओं को सजाने के लिए तैयार हो रही है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शून्य का स्कोर प्राप्त करने वाले विपक्षी दलों, पूर्वाग्राही मीडिया और इसी प्रकार के सोशल मीडिया राइटरों ने भाजपा की बड़ी सफलता को सरकार न बनने की विफलता के रूप में पेश करने एक षडयंत्र का काम किया है जो सफलता को दबाने का प्रयास मात्र है। 
                                                       संवाद इंडिया

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