फिर ‘सपना’ कोई एक पद छोड़ेंगे ‘कमलनाथ’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। खबर यह है कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और विधानसभा में विपक्ष के नेता कमलनाथ कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से मिलकर आये हैं। वहां अन्य विषयों के अलावा एक विषय यह भी चर्चा में आया है कि इस उम्र में मूंह भरने की बजाये युवाओं को पदों की जिम्मेदारी दी जाये। इसलिए समाचार यह सामने आया कि कमलनाथ विधानसभा में विपक्ष के नेता का पद छोडऩे वाले हैं। जब यह समाचार मीडिया मंडी में आया तो अनेक नेताओं के यहां खुशी के चिराग जलने लगे। स्वत: उनमें घी भी आ गया और रौशनी भी फैलने लग गई। अब कोई इतना दमदार नेता तो है नहीं कि वह कमलनाथ से जाकर पूछ ले कि महाराज कब पद छोड़ रहे हैं और सच में कौन सा पद छोड़ रहे हैं? इसलिए खुशी माने के अलावा कोई परिणामदायक बात सामने आयेगी इसकी संभावना कम ही है। कमलनाथ की विशेषता यह है कि वह अमरिन्द्र सिंह की भांति भी नहीं हैं और दिग्विजय सिंह तरह भी नहीं हैं। वे तो कमलनाथ हैं। मतलब सोनिया के साथ उनके रिश्ते अमरिन्द्र की भांति हैं लेकिन उन्हें हटने के लिए सोनिया गांधी नहीं कह सकती हैं। वे न ही दिग्विजय सिंह की भांति हटाये जा सकते हैं क्योंकि वे बड़बोले नहीं हैं। क्योंकि वे कमलनाथ हैं। इसलिए वे कोई पद छोड़ेंगे इसको लेकर सवाल उठना स्वभाविक है।

राजनीति में अवधारणा और अनुभूति का अपना महत्व है। जनता में अवधारणा बन जाये तो उसको तोडऩा कठिन हो जाता है और अनुभूति से नेता जिंदगी निकाल देता है। इस बार की विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों को पहले सरकार की अनुभूति हुई। सूखा खत्म करने की पूरी योजना ने काम किया। अब विपक्ष के नेता का स्थान खाली होगा और किसी भी वरिष्ठ विधायक का नम्बर आ जायेगा यह अनुभूति काम कर रही है। कमलनाथ वयोवृद्ध नेता हैं और यह अच्छे से जानते हैं कि विपक्ष के नेता की अनुभूति किसी भी नेता को उनक विरूद्ध खड़ा होने से रोकने के लिए पर्याप्त है। इसलिए विधायकों को सपने में खोये रहनेे देना चाहिए। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है। दिल्ली में नेतृत्व कमजोर है तो पुराने और प्रभावशाली नेताओं का काकस उसे दबाये हुए है। केन्द्रीय नेतृत्व समझ रहा है कि उसके साथ क्या हो रहा है? जहां भी उसे कोई विकल्प मिलता है वहां पर बदलाव की इेरी नहीं होती। पंजाब इसका उदाहरण है। वहां सरकार जाये भाड़ में अमरिन्द्र को सिद्धु नामक विकल्प मिलते ही बदलने का फरमान जारी हो गया।

मध्यप्रदेश में अब कोई भी ऐसा विकल्प नहीं है जो कमलनाथ का नेतृत्व और दिग्विजय सिंह का साथ को चुनौती दे सके। इसलिए जो चाहिए वही हो रहा है। सिंधिया को बाहर का रास्ता दिखा दिया और शेष बचे नेताओं में कोई दम है नहीं। इसलिए प्रदेश कांग्रेस का नेता हो या विधायक सब सपने में जी रहे हैं। भाजपा की सरकार और नेताओं को कोसने की होड़ लगी है क्योंकि उसी से तो हायकमान देश का हो या प्रदेश का खुश होते हैं। फिर मतदाता में इसका कोई असर हो पाये या नहीं? मध्यप्रदेश में कांग्रेस कमजोर नहीं है केवल रणनीति के नाम पर उस पर कब्जा करने से वह कमजोर दिखाई दे रही है। वरना कौन नहीं समझता कि पंचायत चुनाव हों या निकाय के चुनाव टल क्यों रहे हैं?

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