फिर उठने लगे किसान आंदोलन के औचित्य पर सवाल

नई दिल्ली ( विशेष प्रतिनिधि )। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में खरीफ फसलों के लिए समर्थन मूल्य की मंजूरी दी गई। यह समर्थन मूल्य पिछले वर्ष की तुलना में 50 से 62% की बढ़ोतरी हुई है। लगभग डेढ़ दर्जन फसलों का उल्लेख करते हुए ₹20 से ₹452 प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी की गई है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि करोड़ों किसानों को इससे लाभ मिलेगा। नरेंद्र मोदी सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लिए प्रतिबद्ध है। अब एक बार फिर किसान आंदोलन के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं।

तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर एकत्रित हुए किसानों का आंदोलन 6 महीने से अधिक समय से जारी है। जब आंदोलन शुरू हुआ था तब इसको व्यापक समर्थन मिल रहा था। सरकार पर कानून वापस लेने का दबाव था और सरकार बैकफुट पर भी दिखाई दे रही थी। लेकिन बहुत ही सहजता से सरकार ने कृषि सुधार बिलों में क्या कमी है इस पर सारे विवाद और उसके बाद की चर्चा को केंद्रित कर दिया। कानूनों की कमियों के बारे में किसान नेता देश के सामने बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाए। जो विपक्षी दल राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसानों को हवा दे रहे थे वे भी कृषि सुधार कानूनों में कोई खास कमी रेखांकित नहीं कर पाए  इसलिए किसान आंदोलन धीरे-धीरे अपना प्रभाव होता चला गया। गणतंत्र दिवस की घटना किसान आंदोलन के ताबूत में कील ठोकने का बड़ा काम कर गई। इससे यह आंदोलन सहानुभूति खोता गया।

किसान नेताओं ने बहुत ही चतुराई से कृषि सुधार बिलों की विरोध वाली रणनीति के साथ समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की एक नई बात जोड़कर आंदोलन में वापस जान फूंकने का प्रयास किया। आज किसी भी किसान नेता से जब बात करते हैं तब वे समर्थन मूल्य पर कानून की बात ज्यादा करते हैं कानूनों में कमी पर कम। इसलिए केंद्र सरकार ने भी बहुत ही रणनीति के तहत समर्थन मूल्य में किसान हित देने वाली सरकार स्वयं को सिद्ध करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बार-बार किसानों को यह आश्वासन दिया है कि समर्थन मूल्य हर स्थिति में जारी रहेगा।

9 जून को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में खरीफ फसलों के लिए समर्थन मूल्यों की घोषणा की। इसमें दलहन और तिलहन के उत्पादन को अधिक समर्थन देने के लिए समर्थन मूल्य में खासी बढ़ोतरी की है। अरहर और उड़द के दामों में ₹300 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी के साथ ही तिल की खरीदी में ₹452 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। राम तेल में ₹235 बढ़ाए हैं। हालांकि मक्का में महज ₹20 की बढ़ोतरी की है साथ ही ज्वार और बाजरा में 100 से ₹118 की बढ़ोतरी करके किसानों की आय को दोगुना करने के अपने वादे के क्रम में एक कदम और बढ़ने का प्रयास किया है। कैबिनेट के इस निर्णय के बाद यह संदेश भी दिया गया है कि यह सरकार समर्थन मूल्यों की पक्षधर है और यह मानती है कि समर्थन मूल्य दिए जाने से किसान बाजार में भी टिक सकता है और उसकी आय दोगुनी करने के लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकता है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैबिनेट के निर्णय की जानकारी देते हुए किसानों के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में बताया। जावड़ेकर ने कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष समर्थन मूल्य में 50 से 62% की वृद्धि की गई है। उन्होंने कई जींस में अच्छी खासी बढ़ोतरी किए जाने का भी उल्लेख किया। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे करोड़ों किसानों को लाभ मिलेगा। सरकार किसानों की आय दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने किसानों से आंदोलन वापसी की फिर अपील की और कहा सरकार ने किसानों के सामने पहले ही बहुत सकारात्मक प्रस्ताव दिया हुआ है  किसान नेता सरकार से अन्य विषयों पर भी बात कर सकते हैं।

समर्थन मूल्य में हुई इस बढ़ोतरी के बाद किसान नेताओं की जिस प्रकार की प्रतिक्रिया आना चाहिए थी वह आपेक्षित है। किसान नेता आंदोलन समाप्त करने के निर्णय तक पहुंचने में केवल इसलिए हिचकिचा रहे हैं कि वह अपने क्षेत्र के किसानों को आंदोलन के औचित्य को कैसे समझा पाएंगे? इसलिए दिल्ली बॉर्डर पर डटे रहना उनकी मजबूरी जैसा बना हुआ है। लेकिन आज यह धारणा आम बनती जा रही है कि किसान आंदोलन वर्तमान परिस्थितियों में अपना औचित्य खो चुका है।

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