पूरे चुनाव में विपक्ष मोदी को गालियां देता रहा…. जनभावना को समझ ही नहीं पाया

लोकसभा के आम चुनाव संपन्न हो गये। मतदान के अन्तिम दिन परिणामों को पूर्वानुमान भी आ गया। 23 को परिणाम भी आ जायेंगे। इन चुनावों में जितना राजनीति का स्तर गिरा है इससे पहले के किसी भी चुनाव में नहीं गिरा। इससे पहले एक राजनीतिक घराने का जिसमें जन्म ही प्रधानमंत्री बनने के लिए लिया जाता है उसको मिली चुनौती और रजवाड़ों को सरदार पटेल द्वारा समाप्त करने के बाद लोकतांत्रिक रजवाड़ों में घबराहट के कारण इतनी गालियां दी गईं। जैसा कि अनुमान दिखाया गया है तब एक ही धारणा सामने आती है कि विपक्ष देश को मूढ समझने में नाकाम रहा है या मूढ समझने के बाद बौखला गया। इस चुनाव में जनमानस में कुछ ऐसे विषय थे जो मोदी के पक्ष में चले जाते दिखे और विपक्ष की खासकर कांग्रेस की लोकलुभावना घोषणाएं विश्वास की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। इसलिए परिणाम का पूर्वानुमान इस दिशा में जा रहा है। यह पहली बार हो रहा है कि कोई गैर कांग्रेस पृष्ठभृमि का नेता दोबारा चुनाव में दम ठोकता हुआ दिखाई दे रहा है। चुनाव परिणाम ऐसे ही रहते हैं तब देश को नई दिशा मिलने की संभावना देखने वालों की संख्या भी अधिक है।
देश की सबसे बड़ी समस्या रोजगार की चुनाव में सामने आई। इसके तह में जाने की जरूरत है। आखिर डिग्रियां हर साल बंट रही है लेकिन रोजगार के अवसर उतने नहीं आ रहे। यह चिन्ता किस प्रकार से दूर हो इसको लेकर मंथन की जरूरत है। किसी भी राजनीतिक दल ने इसके निपटारे का कोई विजन पेश नहीं किया। कांग्रेस सहित विपक्ष का आरोप था कि मोदी ने 2014 में 2 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था लेकिन वह उसे पूरा नहीं कर पाये। देश में 2014 से पहले रोजगार हर उस युवा को मिल रहा था जो शिक्षा पूरी करके आ रहा है ऐसा नहीं था। इसका कारण खोजने पर पता चला कि रोजगार सजृन की संख्शय तुलनात्मक कम है। साथ में छात्रों के पास डिग्री तो है लेकिन उनकी शिक्षा का स्तर उतना नहीं है जिन्हें निजी संस्थान नौकरियां दे सके। इसमें बदलाव को क्रम शुरू हुआ है। आगे हो सकता है कि डिग्री के अनुसार छात्र का ज्ञान भी हो और रोजगार के अवसार भी मिल सके। स्वरोजगार की दिशा में चलने की प्ररेणा भी दी जा रही है। यदि चीन के सामन की भांति यहां भी उत्पाद शुरू करने के लिए युवा आगे आ जायेंगे तो देश में रोजगार की अकाल नहीं होगा। कोई को तो पहल करने की जरूरत होगी। शिक्षण संस्थाओं को अपना स्तर सुधारना होगा। इस बाढ़ का मूल्यांकन करने की भी जरूरत है। एक उल्लेख विशेष रूप से कहने की जरूरत है। हरियाणा का एक मुख्यमंत्री इसलिए जेल में है क्योंकि उसने शिक्षकों की नौकरियों में गोलमाल किया है और एक मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री है जिसने नौकरियों को पारदर्शी बनाया है और लोग सरेआम कहते मिल जायेंगे कि बिना पैसा लिये भी नौकरी दी जा सकती है यह खट्टर ने प्रमाणित कर दिया।
देश की मानसिकता बदलने की जरूरत भी सामने आई है। देश में राजनीतिक व्यवस्थाओं पर आत्मनिर्भरता ने युवाओं को भटकाया है। उनके परिवार की सोच को बदला है। बिना दिये नौकरी नहीं मिलती और जब देना ही है तब पढऩे की क्या जरूरत है। सभी समस्याओं की ईलाज राजनेताओं के पास ही है। वे हमें सस्ता अनाज देंगे जभी पेट भरेगा। वे सहायता करेंगे तभी हमारा जीवन आगे बढ़ेगा। मोदी ने पांच साल में इस मानसिकता को आत्मनिभर होने की दिशा में बदला है। पूर्वानुमान बताते हैं कि लोगों ने इसे स्वीकार किया है। उन्होंने कांग्रेस के 72 हजान के मुफ्त देने के नारे को अस्वीकार किया है। वैसे यह विश्वास का सवाल भी है। 10 दिन में किसानों की कर्जमाफी की बात करने वाली कांग्रेस ने किसानों का भरोसा नहीं जीता और उन्हें महसूस करा दिया कि कहा तो कहा। चुनाव के परिणामों में यदि ऐसा ही रहता है तब यह संदेश जायेगा कि लोग आत्मनिर्भर होना चाहते हैं। देश का युवा कुछ कर गुजरना चाहता है। उसे इसी प्रकार की दिशा में की जरूरत है।
देश की सुरक्षा ऐसा विषय है जिसको लेकर हर भारतीय चिन्ता करता रहा है। पाकिस्तान की ओर से सीजफायर का उल्लंघन करने का सहास और आतंकवादियों को अपने यहां प्रशिक्षण देकर भारत में अशान्ति पैदा करने का कुप्रयास हर किसी को चिन्तित करता रहा है। पहले की सरकारों के समय भी यह सब होता था और मोदी सरकार में भी हुआ। लेकिन जिस प्रकार का करारा जवाब मोदी सरकार के वक्त सेना ने दिया इससे पहले ऐसा राजनीतिक सहास नहीं दिखाया गया था। इसलिए मोदी के प्रति जनता में विश्वास जगा। आतंकवाद को लेकर स्पष्ट नीति की रास्ता छोड़ो या दुनिया छोड़ा ने आतंक की कमर तोड़ दी है। सबसे अधिक समस्या चीन की ओर से आ रही है। चीन के सामने पहली बार राजनीतिक रूप से भी सीना तान कर कोई प्रधानमंत्री खड़ा हुआ है तो देश ने देखा और हमारी सेना ने भी चीन की सेना को धकियाने का प्रयास किया यह भी देश ने देखा। व्यापार नीति के रास्ते भी चीन को संदेश दे दिया गया। चीन ने आतंकवादी अजहर मसूद को खूब संरक्षण दिया लेकिन भारत सरकार की कूटनीति के कारण उसे अपनी स्टेंड बदलना पड़ा। इससे भारत सरकार की साख आम आदमी में बढ़ी और उसने निर्णय लिया कि ऐ मौका और देने में क्या हर्ज है।
नोटबंदी और जीएसटी की आलोचना विपक्ष डरकर कर रहा है। उसका अभिमत क्या है यह अभी तक साफ नहीं हुआ है? नोटबंदी करना चाहिए थी या नहीं इस पर कोई बहस नहीं हुई है। विपक्ष नोटबंदी के मुद्दे पर इमोशनल बात करता है जबकि इससे काले धन पर भी चोट हुई है क्योंकि नोटों की छपाई का सन्तुलन बिगाड़ दिया गया था। रूपया बैंकों में आ गया और देश की तरलता बढ़ गई जिसका अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभव पड़ा है। जीएसटी ने काले कारोबार पर गहरी चोट की है। स्वभाविक है कि इसका प्रतिकार होना था। लेकिन प्रतिकार करने वालों को जल्द समझ में आ गया कि वे ईमानदार व्यापार की नींव रखने जा रहे हैं और उनकी आने वाली नस्लें सलीके का व्यापार करके विश्व के साथ कदमताल कर सकती हैं। इसिलए यह विरोध राजनेताओं का ही रह गया आम व्यापारी का नहीं रहा।
इसलिए चुनाव की नब्ज विपक्ष नहीं समझ पाया। यदि समझा तो उसका कोई तोड़ उसके पास नहीं दिखा। भारत का जनमानस दमदार का साथ देता और साथ देने में गर्व की अनुभूति करता है। मोदी का साथ देने में गर्व की अनुभूति देश को हो रही है। अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं में सहास नहीं है अपितु उदंडता है। इस उदडता को देश ने स्वीकार नहीं किया। मुस्लिम मतदाताओं में मोदी विरोध का अतिरेक भी हिन्दू मतों को एक साथ लाने का बड़ा कारण इस चुनाव में बनता दिखाई दे रहा है। ममता के चुनावी आतंकवाद का विरोध नहीं करना, मायावती का दलितों का विकास नहीं करना और वोट की ठेकेदार होना, अखिलेश का मर्यादा तोड़कर मायावती के साथ तालमेल कर लेना और भ्रष्ट (आरोपों के कारण) लालू के जेल में रहने का तेजस्वी को नुकसान हुआ है। शिवसेना का साथ आना और अकाली दल का ताकत के साथ मोदी का साथ देना भी इस चुनाव का उल्लेखनीय पक्ष है। आम जनता की भावना मोदी को लेकर थी। उसने पार्टी लाइन से परे होकर भी कई स्थानों पर मतदान किया है। इसलिए विपक्षी दलों ने मोदी को निशाने पर लिया। उसका समर्थन देश में नहीं हुआ तो उनकी भाषा की गिरावट बढ़ती चली गई जिसका बदला लेने के लिए मतदाता गुस्से में आ गया। यह पहला चुनाव होगा कि किसी भी सरकार को बचाने के लिए मतदान हुआ है। देश को मोद पसंद है यह संदेश निकल कर सामने आ रहा है। यह राष्ट्रवाद की प्रतिस्थापना का चुनाव रहा है। जिसका अलख आगे भी जगेगा।

संवाद इंडिया

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