‘नेता’ हैं सब राजनीति को समझते ही हैं ‘कमलनाथ’ जी

सुरेश शर्मा

भोपाल। अजेय कमलनाथ इन दिनों धराशाही होकर अपनी जमीन तलाश रहे हैं। सपने आ रहे हैं कि दोबारा सरकार बनाकर प्रदेश की कमान संभाल लेंगे। यह तभी संभव है जब विधानसभा के होने वाले दो दर्जन के करीब उपचुनावों में बड़ी संख्या में कांग्रेस जीते और फिर बहुमत का आंकड़ा प्राप्त करे। इसकी संभावनाओं को लेकर अपने-अपने तर्क हैं। हो भी सकता है कि कमलनाथ के भाग्य में राजयोग फिर से प्रबल हो और हो सकता है कि काठ की हंडिया एक बार चढ़ चुकी हो। लेकिन राजनीति में एक बात जरूर चर्चा में रहती है या समीक्षा में रहती है कि आपका काम करने का सरोकार कैसा है? कमलनाथ साहब जब प्रदेश के मुखिया बने तब यह खूब चर्चा थी कि वे अनुभवी नेता हैं। हमने भी टीवी चैनलों पर कई बार कहा कि सही है कि वे अनुभवी हैं लेकिन एक विभाग चलाने में अनुभवी हैं। सरकार चलाने और विभाग चलाने का अनुभव अलग-अलग होता है। सरकार चलाने में जवाबदेही होती है और परिणाम का मूल्याकंन जनता करती है। विभाग चलाने में जवाबदेही नहीं होती और बोस काम का मूल्याकंन करता है जो फीस के बाद सही सिद्ध कर सकता है। लेकिन अनुभव आत्मविश्वास बढ़ाता है जो कम से कम कमलनाथ में तो दंभ तक की स्थिति में था। कारण वे पहले दिन से ही कह रहे थे कि मुझे क्या सिखाओगे? लेकिन वे आज न तो अपनों पर भरोसा कर पा रहे हैं और न ही खुद पर।

कमलनाथ अजेय योद्धा थे। चुनाव का प्रबंधन उन्हें पता था। कम से आदिवासियों की गरीबी को अपनी अकूत संपत्ति से खरीदने का प्रबंधन उन्हें अच्छे से आता है। दूसरी बात जो कही जाती थी वे अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी रेखा को लांघ सकते हैं। यह अनुभव प्रदेश के मुखिया बनने के बाद हुआ। मीडिया का दमन हुआ इतना भर नहीं आपातकाल से भी आगे जाकर घर-घर जांच कराई गई। वे यह जांच कोरोना की करा लेते तो शायद यह बीमारी कम हो जाती लेकिन मीडिया की कराई गई। वे स्वभाव से ही हठी हैं। यही कारण है कि छोटे मीडिया को बर्वाद करने के बाद अपने ही नेताओं को सबक सिखाने में लग गये। सिंधिया को सड़क पर उतरने की चुनौती दे दी तो महाराज ने नाथ को ही अनाथ बना दिया। ला दिया सड़क पर। सभी कहते रहे कि दिग्विजय सिंह का खेल है लेकिन आज दिग्विजय सिंह भी भरोसे के नहीं रहे। पहले लोकसभा के चुनाव में इस उम्र में यह हाल बनवा दिया अब राज्यसभा में भी ठेगा दिखाने की तैयार करी हुई है। वरिष्ठ मूह ताकते रहे और प_ों को केबिनेट दे दिया। हो गई बगावत और कमलनाथ कुर्सी से नीचे आ गये।

क्या प्रदेश का किसान समझता नहीं है कि दस दिन में कर्ज माफ करने की बात करने वाले डेढ़ साल तक झांसा देते रहे? क्या युवक नहीं जानता कि न रोजगार मिला न भत्ता ही मिला? महिलायें नहीं जानतीं कि एक को छोड़कर किसी को कुछ नहीं मिला। उद्योग की बात हो या व्यापार की सभी तरफ दंभ से अधिक कुछ नहीं। लोगों ने समझाने का प्रयास किया तो मिल पाना संभव नहीं था सुरक्षा की दीवार की बजाये खास किस्म के लोगों की दीवार रास्ता रोकती थी। आज भी वे सपने में ही हैं। सपना यदि साकार करना भी है तब भी दिग्विजय सिंह के गुण भी लेना होंगे। सिंधियां का स्वाभिमान भी लेना होगा और शिवराज की तकनीक को भी कुछ समझना होगा।

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