‘नारायण’ त्रिपाठी बोले लौट के …. ‘घर’ को आये

भोपाल। भाजपा सरकार में मंत्री रहे एक वर्तमान विधायक ने कहा कि संगठन को पता था। विधायक दल को भी पता था कि नारायण त्रिपाठी नेताओं के बुलावे पर सदन में नहीं आ रहे हैं। वे विधायक दल की बैठक में भी शामिल नहीं हो रहे हैं। उनकी नाराजगी का सभी बड़े नेताओं को पता था। लेकिन किसी ने भी यह प्रयास नहीं किया कि उन्हें मनाया कैसे जाये और उनकी समस्या का समाधान कैसे किया जाये। वे यह भी बोले कि यह संगठन की विफलता है। पार्टी के संकट मोचक विधायक का कहना था कि नारायण त्रिपाठी को हेबिचुवल हैं इसलिए चले जाना कोई नई बात नहीं है। लेकिन वे भी यह कहते हैं कि सब नेताओं को पता था कि त्रिपाठी नाराज हैं इसलिए उनकी नाराजगी का समाधान नहीं निकालना विफलता है। अब यह नारायण त्रिपाठी हैं कौन यह भी जान लेते हैं? त्रिपाठी जी उस समय चर्चा में आये थे जब वे मैहर से समाजवादी पार्टी की टिकिट पर विधानसभा पहुचे थे। लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा या प्रभाव जो भी हो अगली बार से कांग्रेस की टिकिट पर विधानसभा में दाखिल हुये। भाजपा की सरकार थी। लोकसभा का चुनाव आया तो अजय सिंह राहुल से नाराजगी दिखाकर वे पाला बदल कर भाजपा में आ गये। उपचुनाव लड़ा और विधिवत विधायक हो गये। अबकी बार भाजपा की सरकार नहीं बनी तो कल वे अपने मूल दल में लौट गये।
कोई भी राजनीतिक दल यदि आयातित नेताओं के सहारे  अपना मार्ग तय करेगा तब वह संख्या तो बढ़ा सकता है लेकिन क्वालिटी नहीं दे सकता है। भाजपा की संख्या 108 तो है लेकिन इसमें दो दर्जन से अधिक आयातित लोग हैं। लोकसभा में भी आयातित लोग हैं। नारायण त्रिपाठी की समस्या यह थी कि जब वे कांग्रेस में थे तब उनकी अजय सिंह राहुल भैया से नहीं पटी और वे भाजपा में आ गये। आजकल उनकी तनातनी सतना से भाजपा सांसद गणेश सिंह से हो रही है। गणेश सिंह भी मूलत: भाजपाई नहीं हैं लेकिन कई बार से सांसद हैं इसलिए उन्हें भाजपाई माना जा सकता है। पार्टी को शिकायत है कि नारायण और गणेश में द्वंद्व है। किसकी गर्दन कटेगी यह तय नहीं था। लेकिन नारायण ने जगह बदलना ही बेहतर समझा। नारायण त्रिपाठी और कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के बीच में गहरी दोस्ती है। लेनदेन भी चलता है। यह बात एक कांग्रेसी नेता ने बताई है। पिछले कुछ दिन से त्रिपाठी जी आरिफ भाई के साथ ही खा-पी रहे थे। बस गनीमत यह है कि इमने प्रयास के बाद भी वह केवल शरद कौल को ही तोड़ पाये। यह भी हो सकता है कि बाकी बागी होने की प्रतिक्रिया को जानना चाहते हों।
त्रिपाठी ने पत्रकारों से कहा कि वे लौटकर घर आ गये हैं। कुछ और विधायक भी घर आ जा सकते हैं। लेकिन जिसे घर संभालना था वे अपना घर नहीं संभाल पाये। भाजपा का संगठन खत्म होकर व्यक्तियों का समर्थक हो गया। यह बात भी विधायकों की ही हैं जिन्होंने अपना जीवन संगठन को बनाने में दिया है। एक मित्र ने पोस्ट डालकर फोन किया कि जो आ रहा है उसे तो भाव मिलता है और जो घर में ही उसे दाल भी नसीब नहीं है। मध्यप्रदेश में हर पद पर व्यक्ति मिल जायेगा लेकिन वह भाजपा की बजाये किसी न किसी नेता का है। इस कारण यह बगावत हो रही है। देखिये क्या होता है?

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