‘नरोत्तम’ के भाषण से विपक्ष हंसा भी और ‘फंसा’ भी

भोपाल (सुरेश शर्मा)। अविश्वास प्रस्ताव पर सबसे पहले विपक्ष के नेता ने अपनी बात कही। आम धारणा यह रही कि विपक्ष के नेता द्वारा आरोप लगाने में संकोच किया गया। इसलिए सत्तापक्ष ने उनको खूब बोलने का मौका दिया। मीडिया में भी यह चर्चा शुरू हो गई थी कि हाथ जोडक़र अविश्वास थोड़े ही किया जा सकता है। यह तो सेल्फ गोल हो गया। इसके बाद बोलने खड़े हुए संसदीय कार्यमंत्री व विधानसभा में नम्बर दो के नेता डा. नरोत्तम मिश्रा। उन्होंने कुछ इस अंदाज में बोला कि विपक्ष हंसता भी रहा और फंसता भी रहा। नरोत्तम अपनी सरकार की उपलब्धि और कमलनाथ के कार्यकाल की कमियों को एक साथ बताते रहे। अनेकों अवसरों पर दी जाने वाली उनकी चुनौती विपक्षी विधायकों को निरूत्तर कर रही थीं। मसलन किसानों की कर्जमाफी की चुनौती। नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि कोई भी कांग्रेसी विधायक एक भी किसान का दो लाख का कर्ज माफ होने का प्रमाण पेश कर देगा तो वे त्यागपत्र दे देंगे। झूठमूठ में भी कोई विधायक खड़ा नहीं हुआ। इसलिए डा. मिश्रा अधिक प्रभावी होते चले गये। मिश्रा ने सरकार के कामों को जब गिनाना शुरू किया तब यह लग रहा था कि शिवराज सरकार ने इतने काम कर दिये और लोगों को सही में जानकारी ही नहीं है। लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वे अपने भाषण से विधानसभा में छा गये।

अब नरोत्तम मिश्रा की क्षमता और प्रशासनिक दक्षता के साथ उनकी वाकपटुता के इस रूप की भी चर्चा शुरू हो गई। विपक्ष के नेता के भाषण का प्रभाव तो इसी से खत्म हो गया। अब कमलनाथ का यदि भाषण हुआ तब तुलना उससे की जायेगी। यहां यह कहना राजनीतिक लग सकता है लेकिन समझने वाली बात है। शिवराज के भाषण की तुलना नरोत्तम के भाषण के साथ की जायेगी। यह राजनीतिक जरूरत भी है और समय की मांग भी। खुद नरोत्तम मिश्रा ने ही कहा है कि शिवराज प्रदेश के नेता हैं और भाजपा में सर्वमान्य नेता हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि किसी भी संगठन में ठहराव आ जाये। नया करने की धारणा बनी रहती है यह तो शिवराज में भी है। ऐसे में नरोत्तम ने अविश्वास प्रस्ताव पर बोलकर लम्बी छलांग लगाई है। यह राजनीतिक रूप से भी है और प्रशासनिक क्षेत्रों में भी धमक का आगाज है। जब नरोत्तम मिश्रा कांग्रेस के एक-एक विधायक के तानों का जवाब दे रहे थे तब अधिकारी दिर्घा में बैठे मुख्यसचिव और डीजीपी मुस्करा रहे थे। यह अविश्वास प्रस्ताव के लचर होने का प्रमाण भी था और नरोत्तम मिश्रा की वाकपटुता का सम्मोहन भी।

विपक्षी विधायकों की ओर से भी कोई ताकतवर प्रहार नहीं हुआ। जब नरोत्तम कुत्तों के तबादले की बात कह रहे थे तब ही लग गया था कि उन्होंने आरोप लगाने वाले नेताओं को खुजली पैदा कर दी और वे आरोप कम आरोपों की सफाई पर अधिक ध्यान देंगे। यही राजनीतिक समझ उन्हें और प्रभावशाली बना रही थी। विपक्ष ने चर्चा का एक दिन और प्राप्त कर लिया। उसमें क्या और होता है यह समझने की बात होगी। कमजोरी को दूर करने के लिए आज विपक्ष के हमले हो सकते हैं और ससंदीय कार्य मंत्री के नाते डा. मिश्रा किस कौशल का उपयोग करते हैं देखना होगा।

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