नफरत के उल्हाने से भाईचारे की आस

मोदी राज में विपक्षी नेताओं की क्या हो गई हालात…? (सुरेश शर्मा) राजनीति का एक दौर था जब नफरत भी परदे के पीछे से होती थी और प्यार का इजहार में भी परदा रहता था। लेकिन इन दिनों भारत वर्ष की राजनीति बेपरदा हो गई है। अब नफरत भी खुलकर होती है और समर्थन भी खुलकर हो रहा है। अस्सी के दशक से राजनीति के चरित्र में बेइंतिहा गिरावट आई थी। अब तो यह हो गया अखबारों में छपी बातों से इज्जत का कोई सवाल ही नहीं रहा। जिसकी छप गई वह बड़ा आदमी हो जाता है। वह शर्म से सिर झुका कर नहीं चलता अपितु उसके समर्थक कहते हैं कि देखा साहब ने कितना बड़ा हाथ मारा है कि चर्चा मीडिया तक में हो रही है। सरकारें भी मीडिया से निगरानी वाला पक्ष छीनने का प्रयास कर रही हैं। इसलिए परदा हटता जा रहा है। यह परदा नोटों और वोटों दोनों से हटता जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हद हो गई थी। देश के बहुसंख्यक समाज को यह लगने लग गया था कि वोट उसके ज्यादा और सरकार में हिस्सेदारी में उनका प्रतिशत कुछ भी नहीं हैं। समाज के जो लोग राजनीति में हैं उन्हें तो समाज का बोलने में ही हारने का खतरा सताता था। इसलिए एक बड़ी राजनीतिक करवट आई और नरेन्द्र मोदी की सरकार का पदार्पण हुआ। मोदी ने बेशक सरकार हिन्दू मतदाताओं के गुस्से के कारण पाई लेकिन अब वे देश के विकास और देश को शक्तिशाली बनाने के दम पर चला भी रहे हैं और पा भी रहे हैं। यदि ताजा सर्वे को देखें तब यही बात समझ में आ रहा है कि वे हेट्रिक बनाते दिख रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्ष के ताकतवर नेता राजनीतिक रूप से विक्षिप्त से दिखाई दे रहे हैं। उनके बयान समाज में जहर घोल रहे हैं। वे नफरत की बातें करके भाईचारे का पैगाम लेकर फिर रहे हैं। यह कैसे संभव होगा?

हमने राहुल गांधी की भारत जोड़ा यात्रा को पहले दिन से देखा। समापन हो रहा है। लेकिन जिस प्यार की बात की जाने लगी थी वह जिस परवान चढऩा थी नहीं चढ़ पाई। वही परम्परागत संघ की आलोचना और वीर सावरकर जैसे महान देशभक्त के खिलाफ दादा-नाना के समय से बोले जा रहे बोल ही उनके मुख से निकले। संघ के मिशन को नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव जी भी कोसते हुए चले गये लेकिन न विचार बदला और न ही सोच। अब सेानिया राहुल का युग भी इसी मुहिम में लगा है। जबकि वे देख रहे हैं कि देश की जनता उसी संघ के प्रचारकों को देश की कमान दे रही है। राज्यों में भी अधिक से अधिक सरकार दे रही है। राजनीति का रूखापन देखिये की इसके बाद भी ये लोग समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। किस साख को काटने का प्रयास करते रहे हैं यह नहीं समझ रहे हैं कि हर चोट में उनके ही वोट कटकर सूखने वाले हैं। लेकिन कौन समझाये राहुल गांधी को कि नफरत के उल्हाने देकर प्यार का पैगाम नहीं दिया जा सकता। जब रामसेतु की सच्चाई को न स्वीकारने के मकसद में राम को ही काल्पनिक बता दिया गया तब देश की चिती को झकझौर दिया गया था। पूरे देश को गांधी नेहरू के उपकारों के तले दबा बताने की मेहनत हुई और लाल सलाम के रचे दोगले इतिहास से सच को काला करने का प्रयास किया गया। इसे देश ने देखा और पढ़ा है। हिन्दू मेधा को मिशनरी की चिकनी चुपड़ी बातों और सेवा के आडम्बर के साथ चुनौती देने का प्रयास किया गया। क्या देश इस बात को नहीं समझता कि चार बैरिस्टर विदेश से आते हैं और शान्ति और अहिंसा के नाम पर देश की आजादी के लिए क्रान्तिकारियों के हवन में पानी डालने का प्रयास करते हैं? एक अंग्रेज सरकारी कर्मचारी के द्वारा बनाई गई राजनीतिक पार्टी को देश को आजाद कराने का उपक्रम करने वाला करार दे दिया जाता है। यह कौन नहीं जानता कि ब्रिटिश औपनिवेशकों को हिटलर ने हिला दिया था और उन्होंने उसके खौफ से बचने के लिए यूएन में यह प्रस्ताव दिया था और सभी देश आजाद किये गये थे। ये बैरिस्टर तो सुभाष बोस, वीर सावरकर, चन्द्रशेखर आजाद और शहीद भगतसिंह जैसे महान सपूतों के यशगान को गांधी-नेहरू की झोली में डालने का प्रयास करते रहे हैं। मोदी के आने के बाद युवा भारत को पता चला है कि आजादी बिना खडग ढ़ाल के नहीं मिली इन वीरों के रक्त की गर्मी से मिली है।

यह देश राम-कृष्ण, मीरा-रसखान, नानक-रविदास, गीता और राम चरित्र मानस का देश है। ऐसे ही अन्य उदाहरणों को शामिल करने पर भारत वर्ष का गौरव दिखता है। लेकिन मोदी की राजनीति का खौफ इस कदर छा गया है कि आलोचनाओं का परदा हट गया। नीतीश कुमार की सरकार का शिक्षा मंत्री डा. चन्द्रशेखर राम चरित्र मानस की आलोचना की शुरूआत करता है। जिसके अपने राजनीतिक चरित्र का पता नहीं है वह श्रीराम के चरित्र के लेखन पर सवाल उठाने का साहस दिखा रहा है। यह क्रम आगे बढ़ाने का काम स्वीमी प्रसाद मोर्य जैसे दलबदलु और दंभ की राजनीति करने वाला नेता करता है। जिन राम चरित्र मानस की एक चौपाई का अर्थ बताने जितना दिमाग नहीं है। वही रामचरित्र मानस और गीता इस देश की जीवन संचार के ग्रंथ हैं। जिस चौपाई को लेकर राजनीति होती है उसका अर्थ विद्वानों ने अनेकों बार बता दिया है। इसके बाद भी मूढ मति उसके अर्थ को समझने का प्रयास ही नहीं करती है। आज का संदर्भ भी उस पर खरा उतरता है। ढ़ोल, ग्वांर, शूद्र, पशु, नारी-सकल ताडऩा के अधिकारी। इसका मतलब साफ है। जिन नामों का उल्लेख है उन पर सदैव निगरानी की जरूरत होती है। नजर हटने पर कोई अनर्थ या नुकसान होने की संभावना रहती है। इसलिए नारी और शूद्र का उल्लेख करके राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया जाता हे। जबकि तुलसीदास ने ही लिख दिया था कि नारी उत्थान की जरूरत है इसलिए उसकी निगरानी हरदम रखना होगी। आज के संदर्भ में कानून बनाकर कर और सुविधाएं देकर उनकी बात के अनुरूप ही सभी नेता चलते हैं। शूद्र को निगरानी की जरूरत नहीं होती तो आरक्षण क्यों दिया जा  रहा है? यह न केवल राजनीतिक लाभ के लिए बोला जाता है जबकि सनातन संस्कृति को कमजोर करने के विधर्मी प्रयास हैं।

सवाल यह है कि क्या इस प्रकार के उल्हानों से देश में भाईचारा स्थापित किया जा सकता है? आजादी के समय जिस प्रकार की बातों को प्रचलन में वामपंथी लेखकों के द्वारा लाया गया उन्हीं को प्रमाण मान लिया जा रहा है। जबकि प्रचीन बातों को, दादी-नानी की कहानियों में कही जाने वाली बातों को देखा जाये तो हमारी समृद्ध संस्कृति के बेजोड़ उदाहरण मिलते हैं। हम विश्व गुरू हमारे धर्म के कारण थे। हमारी शिक्षा पद्यति के कारण थे। हमारे संस्कार और विचार ही हमें विश्व गुरू बनाने का काम करते थे। भारत वर्ष की समृद्धि का कल्पना इसी से की जा सकती है कि कोई अमेरिका की खोज करने नहीं निकला, भारत की खोज के ही प्रमाण मिलते हैं। राजनीति की गंदगी को समाज की धारा नहीं मानना चाहिए। समाज मनीषी, संत और समाज सुधारकों का देश, राजनेताओं के कब्जे में नहीं रहना चाहिए। गांधी ने समाज में सुधार की बात की थी। नेहरू ने बच्चों को संस्कार देने की बात की थी। आज नरेन्द्र मोदी स्वच्छ भारत का संस्कार देने के साथ भारतीय संस्कृति को जीवन का आधार बनाने का काम कर रहे हैं। इसलिए उनको लेकर असहजता स्वभाविक है। लेकिन इसका अभिप्राय यह तो नहीं हो सकता है कि संपूर्ण सनातन संस्कृति पर ही कीचड़ उछालने का प्रयास करना शुरू कर दिया जाये। यदि सुखद बात है तो वह यह है कि विधर्मी ऐसा नहीं कर रहे हैं। हिन्दू समाज के राजनीति के पिटे मोहरे ऐसा कर रहे हैं। वे फिर राहुल गांधी हों, चन्द्रशेखर हों या फिर स्वामी प्रसाद मोर्य। मोदी की राजनीति के सामने नेताओं को पसीना छूट रहा है। नेता मतलब भ्रष्टाचार, नेता मतलब सभी गलत कामों का मिश्रण हो गया था। मनमोहन सिंह पर लिखी किताब से इसका उदाहरण लिया जा सकता है। लेकिन मोदी राज में नेताओं के पास नेता के पर्याय बने शब्दों का इस्तेमाल करने का कोई तथ्य नहीं मिल रहा है। गंगा को गंगोत्री पर और नर्मदा को अमरकंटक में दूषित बताना शुरू कर दिया गया है। मोदी के वोट को ही गालियां देना शुरू कर दिया है। नफरत के बीज बो प्रेम का संदेश कैसे दिया जा सकता है?
संवाद इंडिया

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