ननि बनाएगा बडे तालाब में मिट्टी का टापू

भोपाल। नगर निगम सूरज नगर के बिशनखेड़ी एरिया में तालाब में माउंट (मिट्टी का टापू) का निर्माण कर रहा है। ये माउंट तालाब के अंदर 8 से 10 फीट ऊंचे और 20 से 30 फीट लंबे होंगे। ताकि जलीय जीव जंतुओं सहित बाहर से आने वाले परिंदे यहां ठहर सकें। यहां बताना लाजिमी होगा कि वर्ष 2002 में भोज वेटलैंड को रामसर साइट के रूप में नामांकित किया गया था। भारत में कुल 26 साइट हैं, लेकिन सेंट्रल इंडिया में भोज वेट लैंड बड़ा तालाब ही एकमात्र साइट है। कई अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के आधार पर बड़े तालाब को रामसर साइट में नामांकित किया गया था। रामसर साइट का दर्जा बरकरार रहे, इसके लिए यह प्रयास किए जा रहे हैं। नगर निगम के झील संरक्षण प्रकोष्ठ के अधिकारियों के अनुसार पर्यावरणविदों से मिले सुझाव के आधार पर रविवार से यहां खुदाई शुरू की गई है। यहां से निकलने वाली मिट्टी को निकाला नहीं जाएगा, बल्कि यहीं माउंट बनाया जाएगा। करीब दो सप्ताह तक काम चलेगा। पर्यावरणविद डॉ. बृजगोपाल व अन्य के सुझाव पर निगम ने यह काम शुरू किया गया है। यह एरिया बसाहट क्षेत्र से काफी दूर होने के कारण यहां जीव जंतुओं को किसी तरह का व्यवधान भी नहीं होगा। झील संरक्षण प्रकोष्ठ के प्रभारी संतोष गुप्ता ने बताया कि बड़ी झील के संरक्षण के लिए 1 मई से भदभदा क्षेत्र में गहरीकरण का काम शुरू किया गया था। यहां अब तक करीब 1400 ट्रक मिट्टी निकाली जा चुकी है। जेसीबी पोकलेन मशीनों के माध्यम से खुदाई की जा रही है। यह लगातार जारी रहेगा। इधर, खुदाई के संबंध में निगम अधिकारियों ने मैनिट एक्सपर्ट से भी सुझाव मांगे थे, जिस पर विशेषज्ञों ने बताया कि तालाब में दो से ढाई मीटर तक सिल्ट जमा है, इसे निकालने में किसी तरह की समस्या नहीं होगी। निगम अब ढाई मीटर तक गहरा करने की तैयारी में है। 
    भदभदा के बाद दूसरे चरण में खानूगांव और बैरागढ़ के कैचमेंट एरिया में गहरीकरण करने की प्लानिंग है। विभिन्न प्रकार के जलीय जीव, सैकड़ों प्रजातियां न केवल दुर्लभ थे, बल्कि उनके जीवित रहने से स्थानीय जैव विविधता बनाए रखी जा सकती थी। बड़े तालाब में माइक्रोसाइट की 106 प्रजाति, जिसमें 14 प्रजाति दुर्लभ थी। फाइटोप्लैंटन की 108 और जू प्लांटेन की 105 प्रजातियां थीं। मछलियों की 43 प्रजातियां, रेप्टाइल (मगरमच्छ, म़ेढक, कछुआ) की 100 और अन्य कीट पंतगों की 98 प्रजातियां थीं। 20 हजार से अधिक पक्षी थे, जिनकी 160 प्रजातियां सालभर घूमती थीं, इसमें अनेक पक्षी तो दुर्लभ थे।आश्चर्यजनक रूप से सारस क्रेन की 121 प्रजातियां थीं, भारत के सबसे बड़े पक्षी ग्रूस एंटीगोन भी पाए गए थे। पक्षी विज्ञानी डॉ. डीसी चौधरी के अनुसार 40 डिग्री तापमान पर भी कई पक्षी यहां रहना पसंद करते थे, जबकि मार्च तक अधिकांश पक्षी चले जाते हैं। तालाब का पानी 2002 में बी कैटेगरी में था, कुछ जगह सीवेज मिलने से सी और डी कैटेगरी भी मिला था। यहां बता दें कि दुनिया के पर्यावरण को बचाने के लिए कई देशों के विशेषज्ञों ने ईरान के शहर रामसर में वर्ष 1971 में एक बैठक की थी। इसमें नम भूमि की जमीन को बचाने के लिए कई कदम उठाने पर सहमति बनी। इसके तहत ऐसे नदी, समुद्र या तालाब के किनारे जहां विदेशी पक्षी और जैव विविधता सबसे ज्यादा होती है। उसे रामसर साइट घोषित किया जाता है।पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) की 2014 की जांच रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि जिन कारणों से तालाब को इस साइट का दर्जा दिया गया है, वह खूबियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं। पानी की गुणवत्ता बढ़ाने वाले जलीय वनस्पतियों की मात्रा घटी है। पानी में प्रदूषण के कारण गुणवत्ता खराब करने वाले वनस्पतियों की संख्या बढ़ी है।

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