‘दो’ नेता, दो प्रतिशत वोट और सीट भी ‘दो’ ही

भोपाल (सुरेश शर्मा)। यह बात सबको पता थी। लेकिन मीडिया का स्वभाव बन चला है कि वह तभी लिखता है जब उसे कोई बोल दे। राज्यपाल के अभिभाषण पर सरकार का जवाब आ रहा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सदन में बताया कि कांग्रेस को विकास के कार्यों में सहभागी बनना चाहिए। उसे ऐसी राजनीति करना चाहिए जिसको जनता स्वीकार करती हो, जनता का समर्थन मिलता हो। लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व है कि मानता ही नहीं। इसके बाद बात आई यूपी विधानसभा के चुनाव की। शिवराज बोले कि दो नेता लगे थे। जनता ने दो सीट थमा दी। खास बात यह है कि वोट भी दो प्रतिशत ही मिले हैं। शिवराज के तंज का गहरा अर्थ है। यूपी में कांग्रेस की हालात पर विचार किया जाये। बिना यूपी के दिल्ली के तख्त पर विराजमान होने का सपना कैसे देखा जा सकता है? 22 करोड़ का प्रदेश। 85 लोकसभा की सीट और राज्यसभा में भी ताकत दिलाने वाला प्रदेश है यूपी। उसके बिना कोई भी दल दिल्ली में सरकार बनाने का सपना कैसे देख सकता है? हां, सरकार तो बन सकती है लेकिन मोदी या इंदिरा जैसी नहीं गुजराल और देवेगौड़ा जैसी बन सकती है। जिसको इतिहास में स्थान देने वाला भी नम आंखों से लिखता होगा। जिसने भारतीय राजनीतिक इतिहास के गौरव को बट्टा ही लगाया है।

प्रियंका वाड्रा ने खुद को सिद्ध करने के लिए यूपी की कमान खुद अपने हाथ में ली। कोई भी बड़ा नेता खुद कमान नहीं संभालता है वह हीरो दिखाई देना चाहिए वर्कर नहीं। जिस प्रकार से यूपी चुनाव में अमित शाह ने इंट्री मारी थी और लोकसभा में भाजपा के पक्ष में वातावरण बनाया था। ऐसा प्रभाव प्रियंका वाड्रा को भी दिखाना था। लेकिन न उनके पास संगठन है न कार्यकर्ता? अन्य प्रदेशों के कार्यकर्ताओं की फौज यहां उतारी भी नहीं जा सकती है? ऐसे में चमत्कार कैसे संभव है? प्रियंका ने खुद मैदान में उतर कर गांधी परिवार का नया रूप दिया या गांधी परिवार की बंद मु_ी को खोल दिया। इस पर समीक्षा करने की जरूरत है। राहुल गांधी ने साथ देकर यूपी में माहौल बनाने का प्रयास किया लेकिन जब परिणाम सामने आये तब पिछली बार की सात विधानसभा सीटों की बजाए गाड़ी 2 पर आकर रूक गई। जिस रायबरेली से अकेली श्रीमती सोनिया गांधी लोकसभा की सदस्य बनी हुई हैं वह रायबरेली भी अब उनकी नहीं रही। वहां कांग्रेस के हाथ में कुछ बचा नहीं।

जो भी हो कांग्रेस की हालात यूपी में दयनीय हो गई और दोनों नेताओं (राहुल और प्रियंका) की जनता में पकड़ या प्रभाव कितना बचा है यह उजागर हो गया। तब जी23 समूह की आवाज उठी। उन्होंने फिर से कमान गैर गांधी को देने की मांग की। वो ही कार्यसमिति की बैठक बुलाई और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भरोसा जताने का प्रस्ताव पारित कर लिया। यह औपचारिकता है फिर तुफान के पहले की शान्ति आने वाला समय बतायेगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सका है जिस कांग्रेस के साथ इतिहास जुड़ा है वह इतिहास बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। इसलिए नहीं कि उसको जनता ने नकार दिया है इसलिए कि उसके नेतृत्व को जनता ने नकार दिया है। गांधी परिवार से बाहर निकले बिना कांग्रेस की वापसी की कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही है।

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