‘दोऊ दीन’ से गये पांडे हलवा मिले ना ‘मांडे’

भोपाल। राजनीति बड़ी ही क्रुर होती है। वह समय पर किसी को भी माफ नहीं करती है। जिसके दिन सीधे होते हैं तब उसे कोई परेशानी नहीं होती है मतलब गलती भी सजा नहीं देती। लेकिन सब दिन बुरे होते हैं तब सही करने का प्रयास भी घाटे का सौदा हो जाता है। यह बात गुरूल्चेले के लिए ऐसा ही लग रहा है। इमरान खां एक तरफ अमेरिका में अपनी लाज बचाने के लिए लाज दांव पर लगा रहे हैं और यहां नवजोत सिंह सिद्धु मंत्री भी नहीं रहे और कमाई के अन्य रास्तों से भी दूर हो गये। इसी को ही कहते हैं दोऊ दीन से गये पांडे हलवा मिले ना मांडे। मतलब हलवा खाने के लिए निकले थे रोटियों से भी गये। सिद्धु भाजपा के स्टार नेता थे। उनकी तासीर भी भाजपा के हिसाब से ही मैच खाती थी। अरूण जेटली से पंगा करके कांग्रेस में चले गये। उमा भारती से सीख लेना थी। जेटली से पंगा करके भाजपा में ही बनी रही। ज्यादा हुआ तो केदारनाथ चली गई और वापस आई तो भाजपा ने उन्हें स्वीकार कर लिया। सिद्ध साहब तो सीधे नरेन्द्र मोदी से ही भिड़ गये उन्हें लगा था राहुल गांधी केनजदीक होने का लाभ मिल जायेगा। लेकिन क्या करें किस्मत का। इमरान खां से दोस्ती कर बैठे और प्यार में सब लुटवा आये। एक कदम उठा था शपथ में जाने का राजनीति भी चौपट करवा गया। कमाने के लिए हंसाई का धंधा भी गया व अमरिन्द्र सिंह के मंत्रीमंडल का स्थान भी गया।
अमरिन्द्र सिंह ने तो पाकिस्तान से आकर पाकिस्तान की भाषा बोलने पर ही सिद्धु को हटाने का निर्णय ले लिया था। एक सेना के कैप्टन को पाकिस्तान की दोस्ती की बात को इस हद तक कैसे स्वीकार कर सकता था। लेकिन राजनीति में खुद नुकसान नहीं उठाना चाहते हैं इसलिए अब उन्हें चलता कर दिया गया। जिस राहुल गांधी के दम पर मोदी से पंगा लिया था वह राहुल ही भगौड़ा हो गया। आधी कांग्रेस राहुल को भगौड़ा बोल रही है मीडिया के सामने आफ द रिकार्ड। वैसे सिद्धु के उन दिनों को याद करिये जब वे भाजपा के साथ थे। उन्होंने देश को जगा दिया था। उनके मूंह से राष्ट्रवाद की बात सुनकर लोग तालियां बजाते थे। जब सिद्धु कपित के शो में बोलता था तब लोग आनंद लेते थे। लेकिन एक बार पाकिस्तान क्या गये सुर भी बदल गये और राग भी। तब से कांग्रेस उन्हें बोझ समझने लग गई। आज वे दोऊदीन से चले गये। एक बात समझने की है। राजनीति प्रसेप्शन का खेल होता है। आपके बारे में जो अवधारणा बनी हुई है और उसे जनता स्वीकार कर रही है तब उसे बढ़ाने की जरूरत है। मोदी की तरह।
वैसे राजनीति का ऐसा संस्करण देश में चल रहा है जिसका स्थायित्व अधिक दिन का नहीं है। एक समय था जब पत्रकार देश की राजनीति का आधार होते थे। महात्मा गांधी और अन्य नेता पत्रकार ही थे। इसके बाद पत्रकारों की बराबरी करने अधिवक्तागण आये।  जब नेता को कानून के सहारे की जरूरत पडऩे लग गई थी। अब सभी को भीड़ जुटाने की जरूरत है इसलिए सलेब्रेटी का दबदबा बढ़ रहा है। राजबब्बर कांग्रेस के सबसे बड़े सूबे के अध्यक्ष बनते हैं और मनोज तिवारी उस दिल्ली के अध्यक्ष होते हैं जहां से देश को संचालित करने वाली ताकतें चुनाव लड़ती रहती हैं। इसलिए सिद्धु हो इमरान एक फेज के नेता है यह हाल तो होना ही था।

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