देश की राजनीति हो रही है दिशाहीन : जहां घुसपैठियें की चिन्ता, शरणार्थी को नागरिकता का विरोध

सुरेश शर्मा
जब यह बात समझ में आयेगी कि नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने के बाद एकत्र हुये हिन्दू वोटों का समर्थक दल बंटवारा किस आधार पर कर पायेंगे तब इस आन्दोलन से पछतावा भी हो सकता है। लेकिन जब पता चलेगा कि इसकी प्रतिक्रिया में एक हुये हिन्दू वोटों का लाभ अकेले भाजपा को देश भर में मिलने वाला है तब जरूर इन नेताओं की छाती पर सांप लौटेगा। यह बात इसलिए नहीं उदभूत हो रही है कि देश के मुसलमान को गुमराह करके सड़कों पर आन्दोलन कराने के लिए उकसाया जा रहा है बल्कि इसलिए उठ रही है क्योंकि तीन देशों से प्रताडि़त व परेशान होकर भारत में शरण लेने वाले हिन्दूओं, सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी और इसाईयों को भारत की नागरिकता देने का विरोध हो रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि देश के अन्य राजनीतिक दलों के मन में इन पंथों के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं है? यदि सहानुभूति है भी तब भी मुसलमानों की तुलना में इतनी जरा सी क्यों है? धार्मिक आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण इस देश में पहले भी होता रहा है लेकिन वोटों के एकत्रीकरण की संभावनाएं अब पहले से अधिक होने लग गई हैं। सरकारों का गठन वोटों और उनसे जीतने वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या के आधार पर होता है। इसलिए यह समझने वाली बात है कि एक ही समुदाय के लिए इस प्रकार से खड़े होने के कारण समाजिक समरसता नहीं हो सकता है। 2018 के लोकसभा चुनाव में कुछ टीवी चैनलों की कवरेज ने साफ किया था कि प्रधानमंत्री आवास योजना या उज्जवला योजना का लाभ धार्मिक आधार पर नहीं दिया गया था सभी को समान रूप से ही दिया गया था। अटल जी ने एक बार कहा था कि साम्प्रदायिकता दुधारी तलवार की भांति है एक तरफ काटने का प्रयास करेंगे दूसरी तरफ अपने आप वार हो जायेगा।
जब अटल जी ने यह कहा था तब भी देश की राजनीति में धार्मिक धु्रवीकरण एक बड़ा फैक्टर था। उस समय भी वोट बैंक के रूप में मुसलमान एक बड़ा पक्ष होता था। जिस भी दल की ओर से इसका झुकाव हो जाता था वे सरकार बनाने की स्थिति में आ जाते थे। कांग्रेस की सरकार के वक्त भी मुसलमान और दलित वोट बड़ा आधार होते थे। जब इन समुदायों ने किसी अन्य दल की ओर रूख किया कांग्रेस का राजनीतिक धरातल कम होता चला गया। इंदिरा जी और इससे आगे राजीव गांधी तक कांग्रेस में सभी प्रकार के नेताओं का मिश्रण रहता था। जिसके कारण हिन्दू मतदाता कांग्रेस से हटना नहीं चाहता था और बाकी दलित व मुसलमान उन्हें तगड़ा समर्थन करता था। लेकिन सोनिया युग में इसमें इसायित का प्रवेश हुआ और प्रभावशाली हिन्दू नेता किनारे हो गये। इनका स्थान चर्चों के समर्थन से राजनीति में आये नेताओं ने ले लिया। यह भी महत्वपूर्ण पक्ष है कि इनमें कई बड़े नाम हुये और उन्होंने अपनी योग्यता के आधार पर अन्य समुदायों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया। आस्कर फर्नाडीस और एंटोनी ऐसे नाम रहे हैं। लेकिन जब यह स्तर मेबल रिबेलो तक आ गया उसके बाद कांग्रेस में बड़े समुदायों के प्रति नकारात्मकता आती चली गई। कांशीराम और उसके बाद मायावती ने दलित वोटों को अपने साथ खींच लिया जिससे कांग्रेस का जनाधार काफी कम हो गया। बसपा, सपा और लालू यादव की पार्टियों ने मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंधमारी की जिसका भी नुकसान कांग्रेस को ही हुआ। कांग्रेस तब बड़े राज्यों में तीसरे और चौथे पायदान की पार्टी हो गई। वह आज भी भूल सुधार नहीं कर पा रही है। इसका कारण यह है कि उसके अनुभवी नेता किनारे हैं और राहुल प्रियंका को स्थापित करने के लिए उन्हें कुचला जा रहा है।
भाजपा की राजनीति का आधार ही हिन्दू समर्थन पाना रहा है। यह उसकी विचारधारा भी रही है और उसके पास िवकल्प भी यही है। लेकिन जहां भी भाजपा की सरकारें रही हैं वहां पर उसकी कार्यप्रणाली भेदभाव पूर्ण नहीं रही, जिसको वह प्रचारित करके भी अन्य पक्षों को बताने का प्रयास करती रही है कि हम पूरे देश को साथ लेकर चलना चाहते हैं। गुजरात में जो हुआ उसका भाजपा के बड़े नेताओं ने समर्थन नहीं किया। अटल जी ने उसे राजधर्म का पालन न करना बताया था। इस घटना के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। इस्लामिक तानाशाही के विरूद्ध खड़ा होना गुजरात की घटना के बाद से समझ में आया। यहीं से भाजपा का विसतार होना शुरू हुआ। राममंदिर के लिए आडवाणी का आन्दोलन इसका राजनीतिक स्वरूप बनकर उभर ही रहा था। राम मंदिर के आन्दोलन से हिन्दू मतदाताओं को एक साथ वोट देने की तरफ आकर्षित करना शुरू कर दिया था। गैर भाजपा-शिवसेना दलों का समाज के सामने यह प्रदर्शन भी समझ में आने लग गया कि ये  दल मुस्लिम वोटों के लिए हिन्दूओं की प्रगति तक से मूंह मोडऩे की हद तक जा रहे हैं। मनमोहन सरकार में उनका यह कहना कि भारत की संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है आदि ने हिन्दूओंं को भारत के नागरिक औार स्वामी होने की मानसिकता से निकाल कर वोट बैंक की ताकत को समझने के लिए विवश किया। यहीं से देश की राजनीति की दिशा बदलने लगी और 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार का उदय हुआ। 2018 में इसके अधिक ताकत के साथ फिर से काबिज होने का डर कुछ दलों में इतना अधिक कर रहा है कि उनकी राजनीतिक सोच को ही धराशाही कर रहा है।
यहीं से नागरिकता कानून का विरोध और उसमें मुस्लिम समाज को हिंसा तक विरोध कराने की दिशा में ले जाने का कारण बन रहा है। जिस कानून का विरोध हो रहा है उसमें किसी भी समुदाय के विरोध में कुछ नहीं है। लेकिन गैर भाजपा दल उसमें संभावनाओं के आधार पर आशंका पैदा करवा रहे हैं। जिसका कोई कारण नहीं है। मुस्लिम बुद्धिजीवी भी अपने समाज को इस बात को लेकर गुमराह कर रहे हैं कि उनकी नागरिकता के लिए उनसे प्रमाण मांगे जा रहे हैं तबकि सच यह है कि जब भी एनआरसी की प्रक्रिया शुरू होगी तब समस्या केवल उन लोगों के सामने आयेगी जो किसी अन्य देश से घुसपैठ करके भारत में आये हैं। जिन्होंने अपने आप को शरणार्थी बताया है तथा प्रशासन को इसकी सूचना दी है उनके लिए कोई परेशानी नहीं है। लेकिन यह विचार करने की बात है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को ही गुमराह क्यों कर लिया जाता है? वे आतंकवादियों के संरक्षण के लिए कश्मीर में पत्थर चलाने के लिए निकल आते हैं और प्रताडि़त हिन्दूओं को नागरिकता देने के कानून के खिलाफ भी उनके हाथ में पत्थर थमा दिये जाते हैं? वे उनका उपयोग करने में कोई ग्लानी महसूस नहीं करते हैं। हमें पूरे की स्थिति को केवल देखना भर चाहिए कि आखिर वे कौन से कारण हैं कि एक समय लगभग पूरे विश्व की धार्मिक सत्ता इस्लाम के हाथ में थी और आज वह सत्ता आतंक का पर्याय बनती जा रही है? इसायित ने उससे सत्ता को छीनना शुरू कर दिया है। हिन्दूओं का धार्मिक सत्ता में बड़ा रोल रहा है लेकिन जब से धर्मुगुरूओं ने इसकी बजाये राजनीतिक सत्ता को आशीर्वाद देने की ओर अधिक ध्यान दिया है तब से यह सत्ता कमजोर हो गई और हिन्दू संगठनों के हाथों में चली गई। विश्व के किसी भी देश में अल्पसंख्कों की प्रतिष्ठा ऐसी नहीं है जैसी भारत के अल्पसंख्यकों की है। कई बार तो इस्लामिक देशों के लेखक भारत के अल्पसंख्यकों के प्रति ईर्शा करते हुये लिखते इिखाई देते हैं। भारत से विभाजित होकर अगल बने देशों खासकर पाकिस्तान में तो भारतीय मुसलमानों को भाग्यशाली कहा जाता है। इसलिए भारतीय मुसलमानों को भी विचार करना चाहिए कि जहां उन्हें पूर्ण सम्मान है वहां वे विकास की प्रतिस्पर्धा करें यह तो ठीक है उन्हें प्रताडि़त हिन्दूओं को नागरिकता देने का विरोध किसी और के राजनीतिक फायदे के लिए नहीं करना चाहिए। इस आन्दोलन से यही संदेश जा रहा है।

संवाद इंडिया

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