देर आयत, दुरूस्त आयत : काँग्रेस के सिर से ‘वंशवादÓ का कलंक मिटा देना चाहते है राहुल…!

ओमप्रकाश मेहता
ऐसा लगता है लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार ने राहुल गांधी की कार्यशैली को एक नई दिशा दी है, इसकी झलक चुनाव परिणामों के बाद राहुल की अध्यक्ष पद से इस्तीफे की जिद और पुत्र प्रेम में आबद्ध वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को सीख देने व कांग्रेस को गांधी-नेहरू परिवार से अलग अध्यक्ष देने के उनके कथन से परिलक्षित है। क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री जी से लेकर अन्य सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा कांग्रेस को ''पारिवारिक पार्टी'' कहा गया, उससे राहुल काफी व्यथित है। अब राहुल चाहते है कि कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार से मुक्ति पाकर 'वंशवाद' के कलंक से मुक्त हो, तथा यह जन-जन की पार्टी बने, अब आज की स्थिति में राहुल के इन विचारों को कांग्रेस में कितना स्थान मिलता है, यह तो फिलहाल कहना मुश्किल है, किंतु इसी परिवार के एक युवा मुखिया के दिल-दिमाग में आए ये विचार यह स्पष्ट अवश्य करते है कि राहुल कांग्रेस के वास्तविक हितचिंतक है और अब कांग्रेस की वरिष्ठ पीढ़ी में कोई भी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है, चाहे वे प्रणव मुखर्जी हो या डॉ. मनमोहन सिंह या कि शीला दीक्षित, इसलिए आज की युवा पीढ़ी में से ही ऐसा एक सक्षाम युवा खोजना पड़ेगा, जो नेहरू गांधी की इस विरासत को पुष्पित-पल्लवित कर सके और इस दल की पुरानी गरिमा लौटा सके, फिर वह चाहे ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या सचिन पॉयलट। किंतु यह सही है कि सुविचार चोंट खाने के बाद ही आता है और वह राहुल जी के दिल-दिमाग पर छा गया है।
इस तरह कांग्रेस की इस हार को यदि पार्टी के भविष्य के हिसाब से 'वरदान' माना जाए तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि अब अकेले राहुल जी के विचार में ही नहीं, हर सच्चे कांग्रेसी के दिल-दिमाग में यह भावना कुलांचे मार रही है कि पार्टी को नवजीवन देने का यही सही वक्त है। इस दिशा में कांग्रेस को भाजपा को 'गुरू' मान लेना चाहिए, क्योंकि लोकसभा में मात्र दो सदस्यों के बुरे समय से बाहर निकलकर आज वह 303 सदस्यों के 'अच्छे दिनों' तक पहुंची है और इस दौरान भाजपा किस दुष्काल से गुजरी यह किसी से भी छिपा नहीं है, मोदी जैसा एक भगीरथ आया जिसने भाजपा के नाले को गंगा में बदल दिया।
फिर जहां तक कांग्र्रेस के दौर का सवाल है, उसे इन दिनों सिर्फ आत्मचिंतन की नहीं बल्कि पुनर्निमाण के दौर की आवश्यकता है, जो उसके मूलभूत ढ़ांचे को बदलकर उसे सही रास्ते पर खड़ा कर दे। किंतु इस पथ तक पहुंचने के लिए पार्टी नेतृत्व को उन बड़बोले नेताओं को दूर रखना होगा, जो इसी पार्टी को अपने वाणी के तीक्ष्ण बाणों से हर समय बेधने के प्रयास में रहते है और पुराने घावों में नमक भरने का प्रयास करते रहते है, मेरा इशारा आप समझ ही गए होंगे, जी, सही समझा सैम पित्रौदा और मणीशंकर अय्यर जैसे नेताओं से। क्योंकि सैम पित्रौदा के ''हुआ तो हुआ'' ने जितना पार्टी को नुक्सान पहुंचाया उतना नरेन्द्र मोदी जी के 'नामदार' ने भी नहीं पहुंचाया। फिर सबसे बड़े खेद की बात यह है कि राहुल जी को भी 'सब कुछ' लुट जाने के बाद अब यह समझ में आ रहा है कि कौन पार्टी के हित में है और कौन नहीं? यहां यदि यह कहा जाए कि राहुल जी की अपनी टीम के सदस्यों सर्वश्री निखिल अल्वा, अलंकार सवाई, कौशल विद्यार्थी, के. राजू तथा सैम पित्रौदा का पार्टी की हार में सर्वाधिक योगदान रहा तो कतई गलत नहीं होगा।
किंतु ''देर आये दुरूस्त आये'' की तर्ज पर यह बड़ी ठोंकर लगने के बाद भी यदि पार्टी सम्भल जाती है, अपनी बुराईयां खोजकर उन्हें दूर करने का प्रयास करती है तो वास्तव में ये चुनाव और इनके परिणाम पार्टी के लिए संजीवनी सिद्ध हो सकते है। ….. और अब राहुल ने जो ठान लिया है, वे उसे करके रहेंगे। राहुल अब विकासखण्ड स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी में फैरबदल चाहते है, ''पूरे घर के बदल डालूंगा'' की तर्ज पर उन्होंने सत्ता वाले राज्यों व अन्य राज्यों की इकाईयों में व्यापक रूप से फैरबदल का फैसला ले लिया है, साथ ही राहुल जी पार्टी पर चुनाव प्रचार के दौरान लगे सभी कलंकों को मिटाकर अगले चुनावों तक पार्टी को नए रूप में पेश करना चाहते है। क्योंकि अब पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, जो भी मिलेगा वही इसकी उपलब्धि होगी।

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