‘दुश्मनी’ और प्रतिशोध तक क्यों पहुंचा ‘किसान’?

भोपाल (सुरेश शर्मा)। किसी भी आन्दोलन में विरोध का स्तर इतने आगे तक पहुंच सकता है कि घेराव के बाद व्यक्ति को अन्दर हीे रोक ले और उसके दैनिक प्रोग्राम को प्रभावित करे। एक बार मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी का उनके विधानसभा वाले कक्ष में ही घेराव कर लिया था और उन्हें निकलने नहीं दिया गया था। इसलिए हरियाणा और पंजाब में भाजपा नेताओं का घेराव और उन्हें उनके घरों में बंधक बनाने या बाहर नहीं निकलने देने का प्रयोग नया नहीं है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पंजाब में जो हुआ वह आन्दोलन के समाप्त होने के बाद का घटनाक्रम है और जब सरकार किसानों के प्रति सम्मान भी दिखा रही है और उनकी मांगों को उचित न मानते हुए भी स्वीकार कर चुकी है। यह चुनाव के कारण हुआ हो, यह भी हो सकता है और नये सुधारों के साथ बिलों की फिर से वापसी सहमति के लिए भी हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह कैसे निकाला जा सकता है कि किसान प्रधानमंत्री की जीवन सुरक्षा में ही सेंधमारी कर दें। इसके पीछे के कारणों पर जब भी नजर डालते हैं तब कुछ बातें खास दिखाई देती हैं। मसलन इन किसानों का नाम लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और दल या दलों ने प्रधानमंत्री को घेरने का आयोजन किया हो। जिसका प्रमाण पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा प्रियंका वाड्रा को रिपोर्ट करने जैसे बयान से उजागर होता है।

यह भी सभी को पता है कि कृषि सुधार बिलों पर विरोध का आयोजन पंजाब से शुरू हुआ था। तब कैप्टन अमरिन्द्र सिंह मुख्यमंत्री थे और राहुल गांधी ट्रेक्टर पर सोफा लगाकर आन्दोलन शुरू कराने आये थे। बिलों की कोई कमी सामने नहीं लाने के कारण आन्दोलन अंधा हो गया था और समूचा विपक्ष भी आख्ंा बंद करके किसानों के साथ महज इसलिए खड़ा हो रहा था क्योंकि उसे मोदी का विरोध करना था। इसका प्रमाण राज्यसभा में कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर के भाषण से प्रमाणित होता है जिसमें उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी थी कि बिल की कोई भी कमी वह गिनाये। तब विपक्ष एक भी कमी नहीं बता पाया था। तब किसान इतने गुस्से में क्यों हैं? इस गंभीर सवाल पर काफी मशक्कत करने के बाद यह तथ्य सबसे अधिक बार सामने आया कि सरकार ने किसानों नेताओं के साथ ग्यारह बार बात करके के बाद फिर उन्हें कोई भाव नहीं दिया। इस स्थिति से किसान नहीं किसान कौम को अपनी अनदेखी का अपमान महसूस हुआ। जिन क्षेत्रों में खासकर हरियाणा और पंजाब में जिस प्रकार का विरोध सामने आ रहा है यह वहां के लोगों की तासीर का विषय है।

यहां एक और बात ध्यान में रखने की लगती है। केन्द्र सरकार द्वारा मांग मान लेने के बाद किसान कौम में गौरव की अनुभूति हुई है और मोदी को गिरा लिया वाला भाव लेकर इन दोनों राज्यों में खुशी बनी है। ऐसी स्थिति में पंजाब में किसानों के नाम पर रास्ता रोका गया वह किसानों की ओर से न होकर राजनीति से प्रेरित हो सकता है इसकी संभावना अधिक है। कांग्रेस द्वारा की जा रही बयानबाजी इसका प्रमाण हैं। किसान नेताओं के जहन में यह बात भी है कि राजनीति वे करने निकले थे लेकिन राजनीति के भंवर में जाकर फंस गये। इसलिए गुस्सा अपनी जगह है लेकिन किसान मोदी के साथ प्रतिशोध नहीं ले सकता है यह सब राजनीति का करा धरा है और बदनाम किसानों को किया जा रहा है।

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