‘दमोह’ उपचुनाव परिणाम में छुपे हैं कई ‘संदेश’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। सभी तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि बंगाल में भाजपा तीन आंकड़ों में पुहंच पाती यदि कोरोना को सलीके से नियंत्रित कर लिया जाता। इसी प्रकार की बात मध्यप्रदेश के एक मात्र दमोह उपचुनाव के लिए भी कही जा रही है। यदि शिवराज सरकार कोरोना के इस काल में आक्सीजन की कमी नहीं होने देती तो दमोह में इस प्रकार की हार का सामना नहीं करना पड़ता। सरकार निर्णय तो सही लेती है लेकिन देरी से लेती है। अब पत्रकारों को कोरोना वारियर्स घोषित किया गया है जब प्रदेश में सक्रिय पत्रकारों के मरने की संख्या बहुत हो गई। यदि ऐसा पहले ही कर लिया जाता तो आक्रोश की दिशा कुछ और ही होती। लेकिन केवल कोरोना नियंत्रण ही दमोह उपचुनाव में हार या जीत का आधार नहीं है। तेजी से हुआ दलबदल भी एक बड़ा कारण है। जब कमलनाथ सरकार प्रदेश की जनता से किये वादे पूरे करने की बजाये बहाने तलाशने लग गई। जब नाथ सरकार विरोध का ताकत से दबाने लग गई। जब सरकार विध्वंस की ओर अग्रसर होने लग गई तब विधायकों का दलबदल शिवराज व भाजपा के खिलाफ नहीं गया था। लेकिन राहुल लोधी तक आते-आते वह विरोध बन गया था क्योंकि राहुल के दल बदलने को सही ठहरा नहीं सकते थे। इसलिए हराने का मानस बना लिया था।

यह उपचुनाव कांग्रेस के जीत के कारण चर्चा में नहीं आया है। यह भाजपा की हार के कारण चर्चा में आया है। अभी तक यह फार्मूला देखने में आता था कि जीतने वाला व्यक्ति ही प्रत्याशी बनेगा लेकिन ऐसा पहली बार देखने में आया कि जीतने वाला नेता होते हुये भी हारने वाले दलबदलु घोड़े पर दाव लगाया गया। क्योंकि सरकार और संगठन की नाक का सवाल था। दलबदल की एक शर्त यह भी थी कि टिकिट आपको ही दी जायेगी। हालांकि विपक्षी दल कांग्रेस ने खरीद-फरोख्त का आरोप भी लगाया जिसे जनता ने कितना स्वीकार किया यह अभी तय नहीं हो पाया है। दमोह की सबसे खास बात यह थी कि जनता के सामने भाजपा सलीके से नहीं रख पाई कि उसे राहुल की जरूरत क्यों थी और वह उसे जीताने के लिए क्यों मेहनत कर रही है? बात इतने से भी नहीं बन रही है। इस चुनाव में भाजपा संगठन और सरकार के बीच में तनातनी भी दिखाई दी। सरकार की बेरूखी और संगठन की अधिक दिलचस्पी दिखाई देने से टकराहट भी दिखाई दी। इसका असर परिणाम पर दिखाई दिया है। वैसे भी जनता के मन मेंं यह भाव आ गया था कि सरकार की उड़ान को कुछ थामना चाहिए।

जैसा कि दमोह परिणाम से साफ है कि यह भाजपा की हार है। इसे कांग्रेस की तकनीकी जीत तो कहा जा रहा है लेकिन उसने भाजपा को हराया है यह कोई भी नहीं कह रहा है। कांग्रेस के प्रयासों को चुनाव जीतने के लायक नहीं माना जा सकता है। इसके बाद भी जो जीता वही सिकन्दर। कांग्रेस ने प्रदेश में राजनीतिक वातावरण को बदलने का प्रयास किया है। यह हवा कितने दिन तक बनी रहेगी इसका अनुमान तो अभी नहीं लगाया जा सकता है लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस को कमजोर मानने की भूल नहीं करना चाहिए। भाजपा का संगठन इस हार को कैसे लेता इस पर सबकी नजर टिकी हुई है।

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