‘टेनी’ हो या कोई और नेता पत्रकार को क्यों देता है ‘गाली’?

भोपाल (सुरेश शर्मा)। मीडिया जगत में इन दिनों एक नया नाम चर्चित हुआ है। वह है अजय मिश्रा, जिसे टेनी नाम से भी जानते हैं। ये जनाब उत्तर प्रदेश से लोकसभा के सदस्य हैं और अभी इन्हेें केन्द्र की मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री के रूप में जवाबदारी मिली है। बड़ी रंगत वाले नेता बताये जाते हैं और यूपी में योगी सरकार को ब्राह्मण विरोध का सामना करना पड़ रहा है इसलिए इन्हें केन्द्र सरकार में मंत्री बनाकर ब्राह्मण वोटों को साधने का काम किया गया था। इनके पुत्र की एक कारगुजारी ने भाजपा को बड़ा पलीता लगा दिया है। सांप के मूंह में छछुप्दर आ जाता है और उसकी जो हालत होती है वही भाजपा की हो रही है। खाये तो मरे और उगले तो अंधी तो होगी ही। यह बात टेनी को भी पता है इसलिए बेटे ने जो किया है वह तो हो ही गया लेकिन खुद भी कुछ कम नहीं हैं। वो भाई पत्रकारों को ही गाली निकाल रहे हैं। पत्रकारों ने क्या बिगाड़ा है? वे पहले भी सवाल पूछते थे आज भी पूछ रहे हैं। सवाल पूछना और खबर लिखना लोकतंत्र में उनका काम है। अब आप यह कैसे सोचने लग गये कि पत्रकार भी विधायिका की चाटूकारिता करेगा? यह भी सच है कि मीडिया संस्थानों पर सरकार का शिंकजा मीडिया कर्मियों को स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं करने दे रहा है। यह देश भर की शिकायत है, अकेले केन्द्र सरकार और यूपी सरकार भर की नहीं है।

कल की ही बात है कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी मीडिया के साथ बेअदबी कर रहे थे और वही सब टीवी मीडिया वाले लाइव दिखा रहे थे। राहुल कह रहे थे कि आपको हमारी बात तो बताना नहीं है क्योंकि आप तो सरकार की बात ही कहते हैं और यह सब मीडिया में लाइव हो रहा था। मतलब सरकार हो या विपक्ष मीडिया को गालियां निकालने के अपने-अपने तरीके अपनाता रहता है। मीडिया भी इस दौर के समाप्त होने की प्रतीक्षा करता दिख रहा है। खैर! कोई बात नहीं। मीडिया को जब भी कमजोर करने का प्रयास किया गया वह और निखार के साथ सामने आया है। आयेगा इसका भरोसा है। लेकिन यहां बात तो केन्द्रीय राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी की हो रही है। उन्हें पत्रकारों को गाली देने की क्यों जरूरत पड़ी? राजनीति में हर किसी ने ऐसी ताकत नहीं है कि वह खिसयाहट को हजम कर पाये। टेनी जैसे नये और राजनीति में अपने बाहुबल के कारण आये नेता तो कम से कम ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए भाजपा संगठन ने इस पर ध्यान देने का विचार बनाया है। न भी बनाया होगा तो जनता है, स्तंभ जनता पर ही निर्णय छोड़ता आया है।

जांच में सामने आये है कि किसानों को कुचला गया है। यह घनघोर आपत्ति की बात है। इसका निराकरण न्यायालय करेगा। अच्छा उस समय भी पत्रकार की मौत हुई थी। लेकिन तब बयानबाजी के अलावा मीडिया की ओर से अधिक प्रतिक्रिया नहीं आई थी। अब मीडिया ने गाली देने वाले नेताओं को गंभीरता से लेने का प्रयास शुरू कर दिया है। हम तो आज भी इस पक्ष के हैं मीडिया को जनसरोकार की तरफ मुड़ जाना चाहिए। राजनीति की पत्रकारिता से देश के सामने गंदगी के अलावा कुछ अधिक मिलने वाला नहीं है। राजनीति में विकास की बात शुरू हो गई और मीडिया राजनीति की बात करने लग गया, क्यों?

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