‘टारगेट’ क्लिंग पर मुस्लिम वोट पाने वालों से ‘सवाल’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। वो बात अलग होगी जब देश का राजनीतिक माहौल हिन्दू अत्याचार पर मौन रहने की इजाजत देता होगा। ऐसा भी होता होगा कि मीडिया और कतिपय लेखकों की नजर में कश्मीर का पलायन बड़ा विषय नहीं होता होगा। जो भाषा पाकिस्तान से जेहाद के लिए उठती थी उसका विरोध करने की ताकत मुस्लिम वोटों के खिसक जाने के डर से नहीं होती होगी। लेकिन आज उन लोगों के मूंह में दही क्यों जम गया है जो छोटी सी घटना पर मोमबत्ती लेकर शाम को नारे लगाते सडक़ों पर दिखाई दे जाया करते थे! जिन्हें भारत रहने के लायक नहीं रहता था उनमें इतनी नालायकी क्यों आ गई कि कश्मीर का टारगेट किलिंग उन्हें दिखाई ही नहीं दे रहा है! जो दिल्ली के निजी स्कूलों में अल्पसंख्यकों की फीस कोरोना के कारण वापस दिलाने और सरकारी खजाने से देने का आदेश दे रहे हैं वे चुप क्यों हैं? क्या अन्ना आन्दोलन के बाद इसी नई राजनीतिक संस्कृति की बात कही गई थी? जिन राजनीतिक दलों की दुकान मुस्लिम वोटों के कारण ही जमी हुई है वे क्या अपने समर्थकों को कहेंगे कि वे कश्मीर में पंडितों को टारगेट करके मारना बंद करें। सभी क्षेत्रों में मौन है? जिनकी आवाज अख्लाक के लिए गज भर की हो जाती थी उनकी आवाज कश्मीर के हिन्दूओं की टारगेट हत्या पर लडखड़ाती हुई भी नहीं सुनाई दे रही है।

यदि ये सब बोलते तो 1990 का पलायन नहीं होता। ये सब तो यह बताने में गौरव महसूस करते हैं कि केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार थी। इस प्रकार का माहौल एक दिन में तैयार नहीं होता। आज जब टारगेट किलिंग की घटनाएं हो रही हैं इन्हें भी एक दिन की रणनीति न मानकर यह समझना होगा कि यह मोदी सरकार आने के बाद से आतंकवादियों को चुन-चुन कर मारने की घटना का बदला है। तब सरकार से उम्मीद अधिक होना चाहिए कि चुन-चुन कर मारते समय इस प्रकार का अंदेशा तो हुआ ही होगा। तब रणनीति भी बनी होगी। अमित शाह की बैठक में उसी पर चर्चा हुई होगी ऐसा मान कर विश्वास कर सकते हैं। जिस सरकार में सर्जिकल और एयर स्ट्राइक करने की क्षमता है वह टारगेट किलिंग का रास्ता भी निकाल लेगी। लेकिन कब? सवाल तो उठेंगे ही। उठ भी रहे हैं। यह देश मान रहा है कि अमित शाह और मोदी के होते हुए गुंडे और आतंकवादी सरकार के नाक में दम नहीं कर सकते? लेकिन जनता में यह धारणा नहीं बनने देना चाहिए कि सरकार तो नाक के बारे में सोच ही नहीं रही है। भाजपा अध्यक्ष नड्डा ने भोपाल में कहा था आतंकियों की गोली की आवाज थमने से पहले उनकी सांस थम जाती है। सार्थक करना होगा।

सरकार का इंतजार है लेकिन जो मुस्लिम वोटों के हकदार है उन्हें अपने मतदाताओं को समझाना होगा कि आखिर कश्मीर को भारत से परे न माने। कश्मीर में एक हिन्दू की टारगेट हत्या होती है तब देश के 90 करोड़ हिन्दूओं में मातम होता है। यह धर्य की परीक्षा है। गंगा जमुनी तहजीब को चुनौती है। सब मिलकर इस परीक्षा में पास हों। इसलिए जिनको दही जम गया है, जो मोदी की आलोचना में अंधे हो गये हैं, जिनको भारत रहने लायक नहीं लगता था वे कश्मीर को रहने लायक बनाने में आवाज उठायें। अन्यथा की चिंता कर लें चाहे अन्यथा सरकार की तरफ से ही क्यों न आये!

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