‘जाति’ बेस ही है तो जाति गणना से क्या ‘डरना’

भोपाल (सुरेश शर्मा)। केन्द्र की सरकार चाहती है कि जाति आधारित जनगणना नहीं हो। इसमें संसाधन अधिक लगते हैं और देश में विभाजन जैसे हालात बनते हैं। सरकार यह भी सोचती है कि ऐसी गणना होने के बाद देश में जातियों की मांगे बढ़ेंगी और सरकार के सामने परेशानी आएगी। दूसरी तरफ जातिगत राजनीति करने वाले दल अपने राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर सरकार से जातिगत गणना करवाने का आग्रह कर रहे हैं। इससे उन्हें डाटा मिल जाएगा और जातियों की भावना भडक़ा कर वे अपना राजनीतिक उल्लु सिद्ध करने में कामयाब हो जाएंगे। इस राजनीतिक मांग और उसके स्वीकार करने के संशय में देश की सरकार और विरोधी दल जूझ रहे हैं। बिहार में चूंकि जातिगत राजनीति होती है इसलिए उसका असर दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ मिलकर सरकार का सहयोग करने वाले नीतीश कुमार भी जातिगत जनगणना के पक्ष में आकर बिहार के सभी राजनीतिक दलों के साथ मोदी को ज्ञापन देते हैं। ऐसे में जातिगत गणना को लेकर मंथन करना जरूरी हो गया है। इसको हम ठीक उसी प्रकार से कह रहे हैं जैसे धारा 370 हटाने से पहले कश्मीर को लेकर कहते थे। कश्मीर हमारा अभिभज्य अंग है लेकिन संशय हर बार व्यक्त करते थे। इसी प्रकार जातियां समाप्त करने की बात की जाती है और सभी काम जाति आधारित ही होता है।

जब बच्चा स्कूल में प्रवेश करता है तब उसकी जाति का उल्लेख दाखिले में होता है। क्यों? इसलिए कि यदि वह वाजिफा पाने की पत्रता रखता है तो पता चल जाए। वजिफा जाति आधार पर मिलता है गरीबी और अन्य मैरिट उसके लिए वजह नहीं हैं। इसलिए जब बेस ही इस प्रकार का तैयार है तब जातिगत गणना न करने भर से कितना लाभ हो पाएगा। आरक्षण जातियों के आधार पर मिल रहा है। ओबीसी में रोज नई जातियों को जोड़ा जा रहा है और उसको राजनीतिक लाभ के लिए प्रचारित भी किया जाता है इसलिए यह कहना कि  जातिगत गणना से जाति विभेद कम किया जा सकता है तब कितना सही है? राजनीतिक दल आज भी टिकिट जातिगत समीकरणों के आधार पर देते हैं तब क्या? मंत्री और मुख्यमंत्री जातिगत आधार पर बनते रोज देख रहे हैं तब वर्गभेद को रोकने का मार्ग कहां से निकलेगा? जिस देश की राजनीति जाति की गंदगी से सरोबार हो वहां जातिगत गणना न कराने का गंगाजल कितना काम आएगा? इसलिए या तो ठोस कदम उठाए जाए या फिर इस बात को मान लिया जाए कि जाति आधारित गणना होगी।

भगवान मनु ने जातियां कर्म के आधार पर बनाई गई थी। आज कर्म के आधार पर जातियां बदल रही हैं। डाक्टर, डाक्टर से शादी करता है मतलब नई जाति बन गई। आइएएस-आइपीएस आपस में शादी करते हैं मतलब यह दूसरी जाति हो रही है। पहले भी जातियां शादी-विवाह से अतिरिक्त किस काम आती थी? समीकरण बदलने में ध्यान देंगे तो जातियां अपने आप खत्म हो जाएगी। लेकिन जब आरक्षण का प्रावधान राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ाया जा रहा है और पद्दोनति में आरक्षण देकर जहर फैलाया जा रहा है तब गणना जैसा छोटा सा विषय कैसे इस विवाद का हल करवा सकता है? यह राजनीतिक लड़ाई है उसे राजनीतिक रूप से लडि़ए डरना क्यों चाहिए?

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