घुसपैठियों के ड्राफ्ट पर इतना हंगामा क्यों?

सर्वोच्च न्यायलय के आदेश पर बना है एनआरसी

जब यह जानकारी आई कि असम में बंगलादेश से आये लोगों की संख्या 40 लाख के करीब है तो देश की राजनीति में तुफान आया। इससे पहले देश को भी यह नहीं मालूम था कि इस बारे में हो क्या रहा है? जब मीडिया चैनलों पर बहस शुरू हुई तब यह सामने आया कि राजीव गांधी सरकार के समय असम का समझौता हुआ था और यह तय हुआ था कि केन्द्र सरकार एक नागरिक रिजस्टर बनायेगी। उसका तरीका क्या होगा यह भी तय किया था। लेकिन सरकार राजनीतिक कारणों से ऐसा करना नहीं चाहती थी। आन्दोलन को पंचर करने के लिए समझौता किया गया था। असम में भी कांग्रेस की सरकारें ही रही थीं। लेकिन ऐसा नहीं कि उनके मुख्यमंत्रियों ने इस गंभीर विषय पर कोई पहल नहीं की। उन्हें सरकार गिराने की धमकी के कारण अपने कदम वापस लेना पड़ा। जब राजनीतिक नेतृत्व इस मामले में विफल हुआ तो  सर्वोच्च न्यायालय ने यह पहल अपने हाथ में ली। उसी की देखरेख में यह पहला ड्राफ्ट सामने आया है जिसमें 40 हजार बंगलादेशी लोग असम में घुसे हुये हैं और वे समस्या ही नहीं संकट बन चुके हैं। इस ड्राफ्ट में केवल नाम हैं किस प्रकार की कार्यवही की जायेगी इसका निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को करना है। महज ड्राफ्ट पर इतना राजनीतिक हंगामा देश के लिए चुनौती के समान है। एक समय देश को धर्मशाला नहीं बनने देने की बात करने वाले भी इस समय मुखर विरोध कर रहे हैं। तब यह सवाल उठता है कि देश के अस्तित्व को वोटों के हित के लिए चुनौती दी जा सकती है?

सवाल यह है कि क्या देश की राजनीति हिन्दू और मुसलमान को अलग करके चलेगी? सवाल यह है कि देश में अवैध रूप से रहने वालों के लिए भारतीय संविधान के हिसाब से निपटा जायेगा या धर्म के आधार पर? सवाल यह उठाया जाता है कि हिन्दू, सिख, बौद्ध और ईसाई को भी नागरिकता देने में विलम्ब नहीं किया जाता लेकिन मुसलमानों को नागरिकता देने में भेदभाव क्यों किया जाता है? यह सवाल स्वभाविक भी है। 1947 में देश का विभाजन हिन्दू और सिख के आधार पर नहीं हुआ था। न ही हिन्दू और ईसाई के आधार पर हुआ था। देश का विभाजन हिन्दू और मुसलमान के आधार पर हुआ था। गांधी जी और मौलाना आजाद की पहल पर देश भक्त मुसलमान भारत में रूक गये थे। उन्हें देश ने भी और हिन्दू समाज ने भी सर माथे पर रखा है। आज भी देश में इन दोनों समुदायों के बीच का तनाब राजनीतिक कारणों से होता है न कि समुदायों के मुद्दों के कारण। देश में मुसलमानों को जितनी स्वायत्ता दी जा रही है उतनी तो उनके बाहुलता वाले देशों में भी नहीं है। सामाजिक तनाव का राजनीतिक कारण यह है कि  तुलनात्मक विद्वेष और प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने के कारण एक दूसरे कीधार्मिक मान्यताओं के प्रति सम्मान में कमी आना है। राजनीतिक दलों ने मुस्लिम वोटों के लिए यह कहना कि साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता में नहीं आने देंगे ने विपरीत प्रतिक्रिया दी है। लेकिन इसका कभी यह मतलब नहीं निकाला गया कि ये विषय देश से बड़े हो जायेंगे?

बंगला देशी घुसपैठियों की समस्या का मामला आज का विषय नहीं है। साठ के दशक में असम के मुख्यमंत्री हुआ करते थे बिमला प्रसाद चालिहा। कांग्रेस के दिग्गज नेता थे। 1951 के बाद पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के भारत में बसने का मामला उन्होंने उठाया था। वे 1964 में विधानसभा में पाकिस्तानी घुसपैठ रोकथाम अधिनियम भी लेकर आये लेकिन उन्हें कांग्रेस के ही 20 मुस्लिम विधायकों ने धमकी दी कि यदि इस कानून बनाया गया तो उनकी सरकार को गिरा दिया जायेगा। यह प्रस्ताव पारित नहीं कराया गया। करीब 30 साल बाद कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री हितैश्वर सैकिया ने सदन में कहा था कि हमारे राज्य में बीस से तीस लाख बंगला देशी रह रहे हैं। यह घटना 10 अप्रैल 1992 की है। इस बयान क हश्र भी चालिहा के प्रस्ताव जैसा ही हुआ। अब्दुल रहिम मजुमदार जो खुद कांग्रेसी विधायक ही थे ने धमकी दी कि हम चाहें तो सैकिया सरकार को पांच मिनिट में गिरा देंगे। इसके बाद सरकार ने अधिकृत बयान जारी करके विधानसभा में कही बात का खंडन जारी किया। इसके बाद कांग्रेस ने इन घुसपैठियों को अपना वोट आधार बना लिया और सत्ता को सुख भोगना शुरू कर दिया। बोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ। राजीव गांधी की केन्द्र सरकार ने एक समझौता किया जिसमें इनके बारे में साफ प्रावधान था। लेकिन समझौता स्वीकार तो हुआ लेकिन क्रियान्वित नहीं हुआ। बोड़ों आदिवासियों के साथ हिसंक वारदातें वहां आमबात हो गई। इसलिए मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी देख-रेख में वहां की नागरिकता का परीक्षण शुरू किया। यह उसी परीक्षण का ड्राफ्ट आया है। जिसमें अकेले असम में बंगलादेशी घुसपैठियों का प्रारंभिक आंकड़ा 40 लाख आया है। लोकसभा में वामनेता इन्द्रजीत गुप्त गृहमंत्री थे उन्होंने स्वीकार किया था कि एक करोड़ के आसपाा बंगलादेशी भारत में हैं। कांग्रेस के गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने भी सदन को इसी प्रकार की जानकारी दी थी।

असम के बाद सबसे अधिक आबादी बंगलादेशियों की बंगाल में होने का अनुमान लगाया जा रहा है। देश भर से ऐसी मांग उठने लग गई है कि अन्य राज्यों में भी ऐसे ही रजिस्टर बनाये जायें और देश की नागरिकता और घुसपैठियों की जानकारी एकत्र की जाये। इस प्रकार की मांग को सर्वोच्च न्यायालय कैसे अस्वीकार करेगा यह बड़ी बात है? और स्वीकार कर लिया तो देश के राजनीतिक हालात कैसे होंगे इसका अब अनुमान लगाया जा सकता है। किसी देश की नागरिकता को अपना बड़ा महत्व होता है। क्या भारत को छोड़कर कोई भी ऐसा हो सकता है जिसमें बिना नागरिकता के उनमें रहा जा सकता है? बिना विजा के वहां जाकर कोई कितने दिन तक रह सकता है? उसे वोट का अधिकार मिल सकता है? उनके चुनाव लडऩे का अधिकार मिल सकता है? मुझे लगता है कि कोई भी समझदार व्यक्ति यही कहेगा कि ऐसा नहीं हो सकता? फिर यह सब भारत में कैसे हो सकता है?

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और निगरानी पर हुये सभी प्रयासों पर राजनीतिक दलों की ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया को मायने क्या हो सकता है? क्या ये राजनीतिक दल नहीं चाहते कि भारत की नागरिकता का सम्मान हो? क्या ये दल ऐसा भी नहीं चाहते की नागरिकता की जो प्रक्रिया संविधान ने बनाई है उसे क्रियान्वित न किया जाये। क्या देश की चारदिवारी ही न हो, कोई कहीं से भी आ जाये और यहां रहने लग जाये। क्या वोट बैंक के लाभ के लिए हम राजनीतिक दल देश के हितों के साथ सौदा करने से नहीं चूकने वाले हैं? यही सवाल इस समय देश के जनमानस में तैर रहे हैं। सबसे अधिक समय तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने ड्राफ्ट आने पर अपनी पहली प्रतिक्रिया वही दी थी जो गैर भाजपा राजनीतिक दलों ने दी थी। लेकिन वह अब संभल रही है। मतलब राजनीति में आग लगा दी और अब घी डालने देने के लिए अन्य दलों को आगे कर दिया। सबसे अधिक उग्र प्रतिक्रिया ममता बनर्जी की आई। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। असम के बाद सबसे अधिक घुसपैठियें उन्हीं के राज्य में हें। वे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं। उन्हें सबसे अधिक खतरा महसूस हो रहा है कि यदि आने वाले चुनाव से पहले इन घुसपैठियों को मतदाता सूची से प्रथक कर दिया गया तो उनकी कुर्सी का क्या होगा? अपनी कुर्सी के लिए देश की चूलें हिलाने में उन्हें कोई परहेज नहीं है। मीडिया ने इस मामले में देश का पक्ष लिया है। उन्होंने ऐसे नेताओं से तीखे सवाल किये हैं? सरकार की ओर से यह बयान आया है कि इसय ड्राफ्ट में उसकी कोई भूमिका नहीं है यह सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय अभी मौन है। वह समय पर अपनी बात कहेगा। यह संभव है कि उसकी बात में सभी पक्षों के जवाब समाहित होंगे। लेकिन देश के लिए सबसे अधिक चिन्ता का विषय यह होना चाहिए कि देशहित के मुद्दों पर राजनीतिक दल नीचले स्तर पर जाकर राजनीति करते हैं। ऐसे दलों को बेनकाब करना चाहिए। जब तक इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का अन्तिम आदेश नहीं आ जाये तब तक नेताओं को बोलने की इजाजत क्यों देना चाहिए? जिन्होंने अपनी पीढिय़ां भारत में बिता दी उनके बारे में सर्वोच्च न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए। जिन दलों की दिक्कत है वे सर्वोच्च न्यायालय को अपनी बात कहें। यह तो देशं स्वीकार नहीं कर सकता है कि कोई भारत को धर्मशाला मानकर घुस आये और भारतीय संसाधनों का दोहन कर ले। ऐसे दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और मानसिकता को भी पढऩे, समझने की जरूरत है। पहले तो यह अभी ड्राफ्ट है इस पर इतना हंगामा नहीं होना चाहिए। सही नागरिक भारत में ही रहें इसकी चिन्ता करना चाहिए।

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