गुटबाजी और अविश्वास के उलझ गये कमलनाथ

विशेष प्रतिनिधि
भोपाल। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को प्रदेश की राजनीति का कड़वा अनुभव हुआ है। वह उनकी जुबान पर आता भी है और उसको संभालने के लिए उन्हें तिकड़म भी करना पड़ती हैं। प्रदेश की सरकार गंवाने के बाद उनका विश्वास डगमगा रहा है जबकि वे अपने काम की समीक्षा पता नहीं कर रहे हैं या नहीं। लेकिन यह जरूर कहा जा रहा है कि कमलनाथ जिस व्यक्ति का नाम है वह प्रदेश में अपना जलवा नहीं दिखा पाया। न तो गुटबाजी को ही संभाल कर पाये और न ही कार्यकर्ताओं और नेताओं में विश्वास ही जगा पाये। अब यह कमी उन्हें विधानसभा के उपचुनावों में भारी भी पड़ सकती है

मध्यप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की क्षत्रप पालिसी कामयाब ही रही है। लेकिन बाद के कालखंड में वह कांग्रेस को ग्रास बनाकर खाने का उपक्रम भी बनती दिखी है। क्षत्रपों के सामने छोटे नेता खड़े किये गये और वे क्षत्रपों को नुकसान पहुंचाते रहे जिससे कांग्रेस की विजय यात्रा प्रभावित होती गई। इसी बीच में शिवराज जैसा विनम्र और आम आदमी का प्रतिनिधि प्रदेश का मुखिया हो गया जिसने कांग्रेस के सभी समीकरण बिगाड़ दिये। कांग्रेस के ही नहीं भाजपा में भी अपने सारे विकल्प समाप्त कर दिये। ऐसे में कमलनाथ जैसा दिग्गज ही उनका मुकाबला कर सकता था। विधानसभा के आम चुनाव में नाथ ने अपने अनुभव को परोसा और भुनाया भी। लेकिन सरकार में आने के बाद फैसले करने और बदलने के कारण उनकी छवि को धक्का लगा। उनको 'यूटर्नÓ लेने वाले नेता के रूप में पहचाना जाने लग गया था। यह किनारे का बहुमत या सहयोगियों का दबाव या फिर ताकतवर विपक्ष के कारण ही क्यों न हुआ हो? लेकिन नाथ की जो छवि थी उसको वे जिस प्रकार चुनाव में भुना पाये थे वह सरकार चलाने में काम नहीं आई। युवाओं को मंत्री बनाना और अनुभवी नेताओं को दरकिनार करना भी कांग्रेस में असंतोष का बड़ा कारण बन गया। अनुभवी नेताओं की बड़ी फौज विरोध में उतरने लगी उसकी भी अनदेखी की गई। कारण यह बताया जा रहा है कि उनके आंख-कान ही अंधे और बहरे हो गये थे। आरोप लगने लगे थे कि वे पूंजी निवेश को उगाहने में लग गये हैं। इसलिए कमलनाथ की सरकार जाने के अनुमान लगने लग गये थे।

सिंधिया की अनदेखी तो चल सकती थी लेकिन उन्हें चुनौती देने तक की स्थिति से कमलनाथ की सरकार चली गई। इसलिए प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी ने ही अपनी पन्द्रह साल में आई सरकार को गिराने की भूमिका निभाई। भाजपा नेता कहा करते थे कि सरकार तो गिरना ही है लेकिन अपना बोझ जिस दिन कमलनाथ नहीं संभाल पाये उसी दिन यह सरकार गिर जायेगी। और आखिर में वही हुआ और कमलनाथ सरकार भरभरा कर गिर गई।

कमलनाथ सरकार के गिरने में एक और बात सामने आई। जिस नेता को अनुभव का खजाना माना जाता था उन्हें बेसिक अनुभव भी नहीं है यही तथ्य सामने आया। राज्यपाल के फ्लोर टेस्ट की बात को न मानने का जो तरीका अपनाया गया उसको सर्वोच्च न्यायालय ने भी नहीं स्वीकारा। मतलब यह कि राज्यपाल की बात मानकर सरकार कराना सहानुभूति का कारण बनता लेकिन राज्यपाल से टकरा कर जो वातावरण कमलनाथ ने बनाया उसे ममता बनर्जी के स्तर का माना जा रहा है। इससे उनके सलाहकारों को अधिक दोषी माना जाना चाहिए। दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज और विवेक तन्खा जैसे सुप्रसिद्ध वकीलों की योग्यता पर भी सवाल उठने लग गये हैं। ये किसके लिए काम कर रहे थे। आखिरकार कमलनाथ ने यह सब कह ही दिया। उन्होंने दिग्विजय सिंह को कथित रूप से अविश्वसनीय कहा और बाद में अपने बयान पर सफाई भी दी। लेकिन तीर तो छूट ही चुका था। अब विवेक तन्खा को कितना विश्वासनीय कमलनाथ मानते हैं यह देखना शेष है। यही सब उपचुनावों में कांग्रेस की ताकत का आधार होगा। युवा नेताओं की ताकत तभी बनेगी जब वे जनता में अपनी समझ से विश्वास जीतेंगे। लेकिन लफ्फबाजी और आरोपों में लगे युवा नेता यह सब कर नहीं पा रहे हैं। तभी तो कमलनाथ और उनकी कांग्रेस गुटाबजी और अविश्वास के संकट से ग्रस्त है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button