गांधी परिवार खुद अनिर्णय के हालात में

देश के दस बड़े राज्यों में से कांग्रेस केवल एक की सत्ता में (सुरेश शर्मा)। जब से जम्मू और कश्मीर का बंटवारा करके दो केन्द्र शासित राज्य किये गये हैं तब से देश में एक राज्य कम हो गया और दो केन्द्र शासित राज्य बढ़ गये। इस समय देश में 28 राज्य और आठ केन्द्र शासित प्रदेश हैं। इन 28 राज्यों में से कांग्रेस तीन पर अपने दम पर सरकार में है जबकि तीन राज्यों में वह सरकार में शामिल है। हालांकि दो ही केन्द्र शासित राज्यों में सरकार बनती है इसलिए उन दोनों में अब कांग्रेस सरकार में नहीं है। जबकि पहले पांडुचेरी में कांग्रेस की सरकार थी। आज भी गांधी परिवार के प्रति कांग्रेस के नेताओं की आस्थाओं में कोई कमी नहीं आई है लेकिन खुद ही गांधी परिवार अनिर्णय की स्थिति से जूझ रहा है। इसका कारण अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन माना जा रहा है केन्द्र की सरकार पर जन्म सिद्ध अधिकार मानने वाला गांधी परिवार अपने किसी भी व्यक्ति की इतनी चमक देश के सामने पेश नहीं कर पा रहा है जिससे आकर्षित होकर देश उनके पीछे चल सके। यह बात अब विपक्ष के नेता भी कहने लग गये हैं। वे गठजोड़ बना रहे हैं क्योंकि अब कांग्रेस की वापसी का इंतजार नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस की राजनीतिक हालत यह है कि वह दस बड़े राज्यों में इतनी कमजोर हो गई है कि उसकी वापसी के लिए उसे चमत्कार का सहारा लेना होगा। नरेन्द्र मोदी सरकार का काम करने का तरीका जनप्रिय रहा है। इसलिए उसे दूसरी बार भी सरकार बनाने का मौका मिला है। अबकी बार किसान आन्दोलन और महंगाई के कारण मोदी की चमक में कमी आई है। मीडिया पर छापेमारी के असर क्या होगा अभी आंकना शेष है। इसके बाद भी कांग्रेस वापसी करती हुई दिखाई नहीं दे रही है। जिन दो प्रमुख राज्यों राजस्थान और पंजाब में पार्टी सरकार में है यहां आन्तरिक संकट से जूझ रही है। वहां पर नेताओं का नियंत्रण करना उसके बूते की बात दिखाई नहीं दे रही है।

गांधी परिवार के चिराग राहुल गांधी अभी तक के प्रयासों के बाद भी कोई चमत्कार नहीं कर पाये हैं। उनकी भाषा गांधी परिवार के बारे में बनी अवधारणा के विपरीत होती जा रही है। जिसका उल्टा प्रभाव जनता में पड़ रहा है। कांग्रेस के बारे में यह अवधारणा है कि वह जो निर्णय लेती है वह देश के साथ दल को ध्यान में रखकर लेती है और उसमें अन्य दलों के प्रभाव का कोई डर नहीं होता है। अब कांग्रेस का नेतत्व जो निर्णय लेता है उसमें प्रमुख नेता को सन्तुष्ट करने के छाप तो रहती ही है अन्य दलों का सहयोग छटक न जाये यह डर भी समाया रहता है। इसलिए कांग्रेस अपना गेम नहीं खेल पा रही है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री रूप में सामने पाते ही कांग्रेस नेतृत्व की मन:स्थिति एकदम से बदल जाती है और वह अपनी बुद्धि और वाणी का नियंत्रण खो देती है। इसलिए कांग्रेस इन दिनों कमजोर होती जा रही है। इसमें दिग्विजय सिंह और उन जैसे नेता का योगदान शामिल हो जाता है तब कांग्रेस की नींव और कमजोर होती चली जाती है।

जब इस कमजोरी की बात करते हैं तब उन दस राज्यों की राजनीतिक समीक्षा जरूरी हो जाती है, जहां या तो कांग्रेस है ही नहीं है और यदि है तब झगड़े में उलझकर कमजोर हो चली है। पंजाब में स्थापित नेता को कमजोर करने के लिए भाजपा से आये नवजोत सिंह सिद्धु को मुख्यमंत्री अमरिन्द्र सिंह से ज्यादा महत्व दिया जा  रहा है। राजस्थान में इससे उलट युवा नेता के सामने वयोवृद्ध नेता अशोक गहलोत को अधिक महत्व दिया जा रहा है। जबकि यह पता है कि सचिन पायलट का आने वाले समय में अधिक प्रभाव बनना है। मध्यप्रदेश की सत्ता हाल में ही गई है। कमलनाथ जैसे योग्य नेता ने युवा व तेजतरार नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को सत्ता में भागीदारी न देकर अपनी ही सत्ता से हाथ धो लिया। हायकमान देखता रह गया और हाथ से एक राज्य चला गया। छत्तीसगढ़ शान्त है लेकिन ढ़ाई साल का फार्मूला कभी भी सिर उठा सकता है और अधिक बहुमत वाले इस राज्य में सरकार की किरकिरी हो सकती है। झारखंड में कांग्रेस पिछलग्गु है लेकिन वहां सब शान्त है। महाराष्ट्र दूसरा राज्य है जहां कांग्रेस सत्ता से लटकी हुई है। पन्द्रह साल तक सरकार चलाने के बाद इन दिनों कांग्रेस प्रदेश में चौथे नम्बर की पार्टी है। शिवसेना की सरकार में सवारी कर रही है लेकिन कोई पूछता नहीं है।

उन बड़े और केन्द्र की सत्ता में निर्णायक राज्यों की छानबीन करते हैं तब कांग्रेस कहीं भी दिखाई नहीं देती है। पश्चिम बंगाल में आज कांग्रेस का कोई भी विधायक नहीं है। जबकि 1977 से वह सत्ता से बाहर है। बिहार में 1990 से सरकार में नहीं हैं तब विधायकों की संख्या 19 है। उत्तर प्रदेश सबसे अधिक लोकसभा सदस्य देने वाला राज्य है। सोनिया गांधी अकेली सांसद हैं जबकि राहुल गांधी यहां की परम्परागत सीट से चुनाव हार गये। खुद प्रियंका वाड्रा यूपी की कमान संभाले हैं और कोई भी राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ समझौता करने को सामने नहीं आ रहा है। तमिलनाडु में कामराज के साथ झगड़े के बाद से वहां से कांग्रेस को चलता कर दिया गया। आज वहां सत्ता में सहभागी है लेकिन पार्टी की कोई भी ताकत नहीं है। उड़ीसा में नवीन पटनायक की चमक के सामने कोई भी राजनीतिक दल नहीं टिक पा रहा है वे 21 साल से सीएम हैं और चुनाव अभी हुए ही हैं। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार में थी लेकिन धर्म-जाति की राजनीति में फंस कर वहां सरकार में वापस नहीं हो पाई। भाजपा को रोकने का कांग्रेस के मान्य फार्मूले का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद भी वहां पर भाजपा की सरकार बनने से नहीं रोका जा सका। कांग्रेस अधिकांश बड़े राज्यों में कमजोर हो चली है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह राज्य में कांग्रेस सरकार बनाने का मौका चूक गई। कारण साफ रहा कि स्थापित नेताओं की बजाए मोदी विरोधी आन्दोलन में सहभागिता निभाने वाले तीन-चार युवा आन्दोलनकारियों को कांग्रेस की अगुवाई करने का मौका थमा दिया। इसका प्रभाव गुजरात की जनता पर विपरीत पड़ा और वहां सरकार बनते-बनते रह गई। बाद में तो वहां पार्टी अपने विधायकों को भी नहीं संभाल पाई। ऐसा ही प्रयोग अब पंजाब में किया जा रहा है। जबकि यहां किसान आन्दोलन के कारण कांग्रेस की वापसी की संभावना दिखाई दे रही है। लेकिन यह राजनीतिक झगड़ा और केन्द्रीय नेतृत्व की अनिर्णय या गलत निर्णय की स्थिति ने पंजाब में आम आदमी पार्टी की संभावना को अधिक बल प्रदान किया है। अकाली दल तो भाजपा से दूर जाकर ही कमजोर हो गया। जिन किसानों को लेकर अकाली दल भाजपा से परे हुआ था वे किसान भी उस पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं।

पूरे देश के विश£ेषण के बाद एक और बात खास है। कांग्रेस के प्रादेशिक  नेता आज भी गांधी परिवार पर पहले की भांति अटूट विश्वास रखते हैं। वे उनके लिए ब्लांइड खेलने को तैयार हैं। लेकिन कमजोरी गांधी परिवार में ही आई है। राहुल गांधी सभी प्रयासों और प्रयोगों के बाद भी नेता बनने और कांग्रेस का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं आ पाये। वे मोदी विरोध में गांधी परिवार की प्रतिष्ठा के अनुकूल अपने विचार और भाषा को बचाये नहीं रख पाये। श्रीमती प्रियंका वाड्रा भी कोई कमाल नहीं दिखा पाई। यही कारण है कि इस उम्र में श्रीमती सोनिया गांधी को कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनना पड़ रहा है। पूरे देश से राहुल गांधी को कमान सौंपने की मांग उठती है लेकिन हायकमान के पास जाने के बाद वह थम सी जाती है। कारण यह है कि राहुल गांधी चुनाव जिताने की क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस की वापसी की कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही है। वैसे भी कांग्रेस का संगठन कमजोर हो गया और उसके स्थापित नेता तक यह मान बैठे हैं कि मोदी के सामने उनका नेतृत्व कोई चमत्कार दिखाने जैसी स्थिति में नहीं है। ऐसे में कांग्रेस के उठने की संभावना तत्काल दिखाई नहीं दे रही है। यह बात अन्य विपक्षी दल भी कह रहे हैं। उनकी ओर से आवाज आ रही है कि कांग्रेस के उठने तक हम इंतजार नहीं कर सकते हैं। यही कारण है कि गैर कांग्रेसी समूह बनने की दिशा में बात हो रही है।
                            संवाद इंडिया

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