क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेसाध्यक्ष बनाए जाने की कोई संभावना है ?

[रामभुवन सिंह कुशवाह] कल दिल्ली से कांग्रेस के एक बड़े नेता ने मुझे से पूछा है कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने से कांग्रेस मजबूत होगी? मैंने जवाब दिया कि क्यों नहीं? वे युवा, ऊर्जावान और काफी समझदार नेता हैं और राजनीति उनके खून में है। पर क्या कमलनाथ और दिग्विजय सिंह इसके लिए राजी हो जाएंगे? उन्होने पूछा। मैने कहा कि उन्हें राजी हो जाना चाहिए फिर उनके सामने भी कोई प्रतिद्विंद्विता भी तो नहीं रहेगी। कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य ही नहीं स्व.माधव राव सिंधिया के भी वफादार रहे हैं। मेरा उनका परिचय कोई 40 साल पुराना है और तब से आज तक एक बार भी उनसे कोई बात भी नहीं हुई थी।उनका यह पूछने से जहांतक मेरी समझ में आया वे इस संभावना को भोपाल की राजनीतिक क्षेत्र में तलाशने या ख़बरीं में डालने तक रहा होगा।जबकि मैं अभी तक ज्योतिरादित्य सिंधिया को  प्रदेशाध्यक्ष बनाये जाने तक ही सीमित रख रहा था। दिल्ली के यह नेता मुझे तब से जानते हैं जब मैं ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया का संसदीय प्रतिनिधि और उनका जनसंपर्क का कार्य सम्हाल रहा था। उनके पिता श्री स्व. माधवराव सिंधिया भी तब भारतीय जनसंघ में आ गए थे। यद्यपि राजमाता जी ने विधिवत जनसंघ की सदस्यता नहीं ली थी। वे भिण्ड से जनसंघ के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ रहीं थीं। माधव राव सिंधिया उनके प्रचार में अपने साथियों के साथ भिण्ड आए तो मुझसे कहा गया कि मैं उन्हें उनके भाषण लिखकर दूँ। वे मेरे लिखित और महल से टंकित भाषण पढ़कर ही बोल रहे थे किन्तु उनका भिण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में आकर्षण बहुत ज्यादा था। चुनाव जीतकर राजमाता सिंधिया ने भी भारतीय जनसंघ की सदस्यता गृहण कर ली। 
सन 1971 में राजमाता सिंधिया पाँचवीं बार लोकसभा के लिए भिण्ड- दतिया क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के चुनाव चिन्ह से मार्च में चुनाव लड़ीं और जैसा कि स्वाभाविक था कांग्रेस के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री नरसिंहराव दीक्षित को पराजित कर भारी बहुमत से जीतीं भीं। जनवरी में उन्हें पौत्र रत्न (ज्योतिरादित्य) की प्राप्ति हुई। भिण्ड का चुनाव जीतकर उनकी खुशियाँ द्विगुणित हुईं थीं। बाद में चार साल बाद देश पर आपातकाल लगा तो राजमाता सिंधिया को मीसा में गिरफ्तार किया गया, गिरफ्तार तो माधराव सिंधिया को भी किया गया था किन्तु उन्हें जेल नहीं भेजा गया। उन्हें पहले दिन से ही पेरोल दे दी गई किन्तु उनके सभी सहयोगियों को जेल में रखा गया। उनके प्रवल सहयोगी और एडीसी महेंद्र सिंह कालूखेड़ा मेरे साथ ग्वालियर जेल में थे। बाद में उन्हें 20 सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करने और स्व. माधव राव सिंधिया के प्रयासों से रिहा कर दिया गया। 
इसके बाद राजमाता सिंधिया और माधव राव सिंधिया में मतभेद गहराते रहे और दोनों अलग अलग राजनीतिक मार्ग पर चल पड़े। आपातकाल हटने के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में माधव राव सिंधिया निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गुना-शिवपुरी से चुनाव लड़ा था। जनता पार्टी की लहर होने के बावजूद वह दूसरी बार यहां से जीते। राजमाता जी विधिवत जनता पार्टी की सदस्य बन गईं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया की एक वसीयत ने सभी को चौंका दिया था। उन्होंने अपनी वसीयत में राजघराने की संपत्ति का बंटवारा नहीं किया था, उसमें लिखा था कि मेरा बेटा मेरा अंतिम संस्कार नहीं करेगा। विजयाराजे सिंधिया अपने ही इकलौते पुत्र कांग्रेस नेता रहे माधवराव सिंधिया से बेहद खफा थीं। कहा जाता था कि विजयाराजे का सार्वजनिक जीवन जितना ही प्रभावशाली और आकर्षक था, उनका व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन उतना ही मुश्किलों भरा था। राजमाता का देहांत 25 जनवरी 2001 को हो गया था। इसके बाद कुछ माह बाद ही 30 सितम्बर 2001 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में हेलीकाप्टर दुर्घटना में माधवराव सिंधिया की मौत हो गई थी। आखिर राजमाता को ऐसा क्यों लिखना पड़ा। उनके एकमात्र बेटे माधवराव सिंधिया से उनके संबंध क्यों खराब हो गए? तमाम  राजनीतिक मतभेदों के बाबजूद राजमाता सिंधिया अपने पौते ज्योतिरादित्य को बहुत प्यार करतीं थीं और उन्हें अपने पास बुला लेतीं थी। पर जब मतभेद काफी गहरा गए तो माधव राव सिंधिया ने उन्हें उनके पास भेजना बंद कर दिया। प्रचारित यह किया गया कि माँ-पुत्र के बीच मतभेद का प्रमुख कारण कोई प्रचीन मूर्ति थी जिसके दर्शन करके ही राजमाता सिंधिया भोजन करतीं थी उसे भेजने से माना करने के कारण मतभेद गहराए किन्तु मेरी अपनी जानकारी के अनुसार मतभेद का कारण यही ज्योतिरादित्य सिंधिया थे। खैर, जब दिल्ली से उन कांग्रेसी नेता से यह संकेत मिला कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा है, मैं चौक उठा। मुझे तो लगता था कि उन्हें मध्य प्रदेश का अध्यक्ष बनाए जाने पर ही कांग्रेस एकमत नहीं है और वे जब गुना जैसी परंपरागत सीट पर भी चुनाव नहीं जीत सके, तब प्रदेशाध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है? और सच पूंछा  जाए तो वे जब अपने प्रभाव क्षेत्र  ग्वालियर संभाग और जहां वे रहते हैं ग्वालियर नगर के भी नेता नहीं है। तब वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष कैसे बन सकते हैं? पर यह कांग्रेस हैं यहाँ कुछ भी हो सकता है।
पिछले विधानसभा चुनाव में ग्वालियर क्षेत्र में कांग्रेस के भाजपा से अधिक प्रत्याशी चुनाव जीते तो इसका कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया नहीं, 'नोटा' और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध अनुसूचित वर्ग का आकस्मिक हिंसक आंदोलन था जिसके कारण मोदी सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा और थोड़ा बहुत मुख्यमंत्री का बयान था जिसमें सवर्णों को चुनौती दी गई थी जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप सवर्ण मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पक्ष में तो महोल कुछ नेताओं ने मंत्रिमंडल में आने के लिए दिल्ली में खड़ा किया। और वही नेता-मंत्री  मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ महोल बना रहे हैं। वे अब तक  ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की मांग कर रहे थे। एक दो दिन से जब भोपाल में उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की मांग शुरू हुई है तो लगता है कि यह सब दिल्ली के इशारों पर ही हो रहा है। 
कुछ भी हो यह तो तो सही है कि ग्वालियर के सिंधिया समय का लाभ उठाते रहे हैं। वे भाग्य के धनी सिद्ध हुए हैं। उस वंश में महादाजी सिंधिया जैसे परम पराक्रमी योद्धा हुये जिन्होने एक समय दिल्ली को लूट लिया था और मुगल सम्राट को अपनी मुठ्ठी में कर लिया था, लेकिन वे मराठों को नाराज  नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने स्वयं की सत्ता के स्थान पर दिल्ली में  मुगलों को मदद की। उस समय महाराष्ट्र विशेषकर पुणे पेशवाओं के हाथ में आ चुका था। इस अवसर का लाभ उठाकर   भोंसले, गायकवाड़, होल्कर और सिंधिया परिवार ने अपनी अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। इनमें सतारा के राणोजी शिंदे द्वारा स्थापित सिंधिया परिवार की सत्ता सबसे कुशल साबित हुई। मराठों की शक्ति को 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने पानीपत के तीसरे युद्ध में ध्वस्त कर दिया था। तबसे टूटते बिखरते मराठे तीन बार ईस्ट इंडिया कंपनी से टकरा चुके थे। लॉर्ड क्लाईव द्वारा 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद स्थापित ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता को वॉरेन हेस्टिंग, कार्नवालिस और लॉर्ड वेलस्ली ने लगातार आगे बढ़ाया। बाद में सिंधिया ने अंग्रेजों से संधि कर ली और ग्वालियर को अंग्रेजों के अधीन रहकर राजधानी बनाई। अंग्रेजों के अधीन रहते हुये भी सिन्धिया पुणे के पेशवाओं की  वफादारी में बने रहे। यदि ऐसा न होता तो होल्कर उन्हें शांति से राज्य न करने देते और गोहद के गुर्जर सिंधिया से ज्यादा शक्तिशाली थे तथा ग्वालियर राज्य की स्थापना भी पहले कच्छवाहों राजाओं ने की थी और बाद में उसे तोमरों को दे दिया गया था। 
भारतीय इतिहास में ग्वालियर के सिंधिया ने अपनी दोहरी राजनीति का प्रमाण कई बार दिया। पहली बार जब उन्होने मुगलों की मदद करते हुये पेशवाओं के साथ वफादारी सिद्ध करते रहे। फिर मुगलों, पेशवाओं का साथ देते हुये अंग्रेजों से मिल गए। तीसरी बार  जब 1857 में झाँसी की महारानी लक्ष्मी बाई जब ग्वालियर आईं तो महाराजा आगरा भाग खड़े हये और जब अंग्रेज पुन: जीत गए तो अंग्रेजों की वफादारी दिखाकर पुन: सत्तासीन हो गए। चौथी बार अंग्रेजों के अधीन रहते हुये  और उनका साथ देते हुये स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष कर रहें तात्या टोपे आदि की  मदद करते रहे। झाँसी की रानी को करीब एक सप्ताह मुरार की छावनीं में पनाह देकर, पाँचवीं बार रानी ने जब ग्वालियर किले पर जब कब्जा कर लिया तो स्वयं भाग कर और रानी को ग्वालियर पर कब्जा हो जाने दिया। पर जब अंग्रेजों का ग्वालियर पर कब्जा हो गया तो फिर अपनी वफादारी के आधार पर राजा बनने में सफल हो गए। सातवीं पर अंतिम  बार नहीं, तो दिलचस्प प्रसंग तब आया जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन करते हुये देशव्यापी दौरे के अंतर्गत  ग्वालियर जाने का कार्यक्रम बनाया तो तत्कालीन सिंधिया राजा ने अपने सचिव के साथ 20 लाख रुपए भेजकर उनसे अनुरोध किया कि वे ग्वालियर न आवें क्योंकि तब वे उनका स्वागत नहीं कर पाएंगे और स्वागत किया तो अंग्रेज नाराज हो जावेंगे। जैसाकि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा , गांधी जी ने 'चतुर बनिए' का परिचय देते हुये ग्वालियर का अपना दौरा स्थगित कर दिया। 
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस महासचिव पद से तयगपत्र दे दिया है पर जब उनके त्यागपत्र की खबर, खबरों की दुनियाँ में आई तो  ट्वीट कर जानकारी दी कि इस्तीफा तो उन्होने दस दिन पहले ही दे दिया था। उनका कांग्रेस के अध्यक्ष बनाने का संकेत तब मिला जब पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमीरिंदर सिंह ने किसी युवा को अध्यक्ष बनाने की जरूरत बताते हुये बयान दिया। उसके बाद ग्वालियर की कांग्रेस के समर्थक लोगों ने भोपाल में कांग्रेस कार्यालय के आसपास उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की मांग के पोस्टर लगाने शुरू कर दिये हैं। राहुल गांधी को लगता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके लिए वफादार 'केयर टेकर' की भूमिका अच्छी तरह से निभा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस के बाकी नेताओं की प्रतिक्रिया  का इंतजार करना पड़ेगा। पूरे देश की तो छोडि़ए स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ और परंपरागत प्रतिद्वंद्वी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के व्यवहार को देखना होगा।

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